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डेरिवेटिव में देर तक कारोबार! सेबी तलाश रहा समय बढ़ाने की संभावनाएं

समी मोडक / मुंबई 08 07, 2017

बदलेंगे नियम ...

निवेशकों को निवेश फैसले लेने में मिलेगी मदद
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगी भारत की प्रतिस्पर्धा
डेरिवेटिव में नकद कारोबार से 15 गुना ज्यादा कारोबार

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) डेरिवेटिव बाजार में कारोबारी समय बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है। इस बात पर विचार किया जा रहा है कि सूचकांक वायदा का कारोबार नकदी खंड का कारोबार बंद होने के बाद भी जारी रखा जा सकता है या नहीं। इस कदम से निवेशकों को कारोबार बंद होने के बाद आने वाली खबरों के संदर्भ में निवेश फैसले लेने में मदद मिलेगी।

इस समय कई विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों में निवेश या हेजिंग के लिए सिंगापुर स्टॉक एक्सचेंज (एसजीएक्स) और शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज (सीएमई) जैसे वैश्विक बाजारों का इस्तेमाल करते हैं। ये विदेशी बाजार लगभग चौबीसों घंटे भारतीय शेयरों में सौदों की पेशकश करते हैं।

नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी में सीनियर फेलो अजय शाह ने कहा कि डेरिवेटिव बाजार का समय बढ़ाना अच्छी बात है। बाजार तब तक खुला रहना चाहिए तब तक ग्राहक चाहें। करीब एक दशक पहले डेरिवेटिव में सारा कारोबार भारत में होता था लेकिन अब आधा कारोबार विदेशों में चला गया है। सूचकांक, मुद्रा और ब्याज दर डेरिवेटिव जैसे सभी क्षेत्रों का कारोबार विदेश में हो रहा है। यह एक बड़ी समस्या है।

भारत ने वर्ष 2000 में डेरिवेटिव कारोबार की इजाजत दी थी। तबसे शेयर बाजार में नकदी और वायदा विकल्प के कारोबार के समय साथ-साथ ही चलते आ रहे हैं। पिछले महीने सेबी ने इक्विटी डेरिवेटिव बाजार की समीक्षा की और इस सिलसिले में एक चर्चा पत्र जारी किया। सूत्रों के अनुसार सेबी को एक सुझाव यह मिला कि डेरिवेटिव में खासतौर पर सूचकांक वायदा में कारोबार को अलग किया जा सकता है और नकद बाजार के समय के बाद भी इसकी इजाजत दी जा सकती है। 

इस समय देश में सबसे अधिक कारोबार वाले निफ्टी वायदा के सौदे एनएसई से ज्यादा विदेशी बाजारों में होते हैं। बाजार के जानकारों का कहना है कि कारोबार की अवधि बढ़ाने से भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इसके अलावा कर और बाजार तक पहुंच दूसरे अहम कारक हैं। बाजार से जुड़े लोगों के अनुसार सिंगापुर और दुबई ज्यादा कर अनुकूल केंद्र हैं क्योंकि वहां भारत की तरह न तो प्रतिभूतियों पर एसटीटी लगता है और न ही कोई स्टांप शुल्क।

ज्यादा लागत ढांचे के बावजूद भारतीय डेरिवेटिव बाजार बहुत कम समय में तेजी से विकसित होने में सफल रहा है। विशेषज्ञों की राय में सेबी को इस बढ़ोतरी को बरकरार रखने के लिए कदम उठाने चाहिए। आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर जे आर वर्मा ने हाल में अपने एक ब्लॉग में लिखा है कि भारतीय  इक्विटी डेरिवेटिव बाजार देश में वित्तीय बाजार विकास की सफल घटनाओं में से एक है। इस पर शोध किए जाने की जरूरत है जिससे कि 25 साल सुधार के बाद भी पूरी तरह विकसित न होने वाले दूसरे क्षेत्रों की बढ़ोतरी के लिए इसकी मदद ली जा सके।

सेबी ने अपने परिचर्चा पत्र में दो मुख्य चिंताएं जताई हैं। उसकी मुख्य चिंता यह है कि क्या छोटे निवेशक  जोखिम को समझे बगैर डेरिवेटिव बाजार में कूद रहे हैं। उसने यह भी सवाल उठाया है कि डेरिवेटिव बाजार में नकद कारोबार की तुलना में बहुत ज्यादा कारोबार तो नहीं हो रहा है। इस समय डेरिवेटिव में नकद कारोबार से 15 गुना ज्यादा कारोबार हो रहा है। ब्रोकरों का कहना है कि जोखिम खुलासे से संबंधित दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने का नियम अच्छा है और इसको आसान बनाया जा सकता है। उनका कहना है कि वे अपने ग्राहकों की वित्तीय जानकारी यह जानने के लिए लेते हैं कि डेरिवेटिव कारोबार में जोखिम लेने की उनकी क्षमता है या नहीं। 
Keyword: नियम, निवेशक, निवेश, अंतरराष्ट्रीय, भारत, प्रतिस्पर्धा, डेरिवेटिव, सेबी, वायदा, एसजीएक्स,
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