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समाचार मीडिया को अपने भीतर झांकने का वक्त

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  August 07, 2017

इस साल की शुरुआत में ऑल्टन्यूज डॉट इन वेबसाइट की शुरुआत करने वाले प्रतीक सिन्हा एक अलग तरह के तकनीकी विशेषज्ञ हैं। उनकी वेबसाइट सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली फर्जी खबरों, वीडियो, तस्वीरों और दुष्प्रचार की पड़ताल करने की कोशिश करती है। पिछले कुछ महीनों में यह फर्जी खबरों पर कुठाराघात करने वाले प्रभावी मंच के तौर पर उभरा है।

 
जब जयपुर में आयोजित 'टॉक जर्नलिज्म' परिचर्चा में मेरी मुलाकात प्रतीक सिन्हा से हुई तो मैंने इस अवसर का लाभ उठाते हुए उनके बारे में अधिक जानकारी जुटाने की कोशिश की। इस कार्यक्रम के आयोजन स्थल फेयरमॉन्ट की लॉबी में बैठकर हम दोनों ने चाय की चुस्कियों के साथ बात की। हालांकि वहां विधिवत वार्तालाप कर पाना मुमकिन नहीं था। दर्जनों बार वरिष्ठ पत्रकारों, ऑनलाइन पोर्टल के संपादकों, लेखकों और कुछ कारोबारी हस्तियों ने भी करीब आधे घंटे की हमारी बातचीत में खलल डाला। इनमें से कुछ लोग उस कार्यक्रम में वक्ता के तौर पर शामिल होने आए थे तो कुछ लोग केवल श्रोता थे। उनमें से हर कोई सिन्हा को पहचान रहा था, उनसे हाथ मिला रहा था और उनके काम की जमकर तारीफ कर रहा था। इससे पहले मुझे केवल फिल्मी सितारों या बड़े निर्देशकों के साक्षात्कार के दौरान ही बार-बार व्यवधान का सामना करना पड़ा था। साफ है कि सिन्हा आज के दौर में पत्रकारिता समुदाय के बीच एक रॉकस्टार जैसा रुतबा हासिल कर चुके हैं। 
 
पहले तीन व्यवधानों के बाद मैंने तो सिन्हा के साथ विधिवत बातचीत की उम्मीद ही छोड़ दी। उसके बाद मैं आराम से बैठकर यह देखती रही कि लोग सिन्हा को देखकर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं? स्पष्ट रूप से फर्जी खबरें आज के दौर में पत्रकारिता, लोकतंत्र और भारत के लिए एक बड़ी चिंता बनकर उभरी हैं। फर्जी खबरों का सच उजागर करने के लिए किसी व्यक्ति के सामने आने से सबसे ज्यादा राहत महसूस करने वाले लोग पत्रकारिता बिरादरी के ही हैं। हमारी बातचीत के अगले दिन सिन्हा ने फर्जी खबरों का भंडाफोड़ करने में लगे दो अन्य दिग्गजों- बूम के जेंसी जैकब और एसएम होक्सस्लेयर के पंकज जैन के साथ एक सत्र में शिरकत की तो उन्हें सुनने के लिए पूरा हॉल खचाखच भर गया था। हालत यह थी कि बहुतेरे लोगों के बैठने के लिए जगह ही नहीं बची थी। उस चर्चा का हासिल क्या रहा? फर्जी खबरों की पहचान के कुछ चिह्नï देखे जा सकते हैं। जैसे सामान्यत: गलत वीडियो या तस्वीरों के जरिये भावनाओं को भड़काने की कोशिश की जाती है, इस तरह की पोस्ट अक्सर खराब ढंग से लिखी होती हैं, उन पर खराब विज्ञापन (पोर्न) नजर आते हैं, उस वेबसाइट पर 'हमारे बारे में' जैसा कोई खंड नहीं होता है और न ही किसी खबर में कोई संदर्भ या उद्धरण ही होता है। 
 
इन बिंदुओं के उठने से ऐसा लगा कि टॉक जर्नलिज्म कार्यक्रम सही मुद्दों को उठाने के अपने मकसद में सफल रहा है। यह सिलसिला तीन दिनों तक चला। चर्चा में देश के पूर्वोत्तर इलाके, हिंदी, मराठी और उर्दू मीडिया से लेकर ऑनलाइन एवं ऑफलाइन मीडिया, टेलीविजन से लेकर प्रिंट मीडिया तक के पत्रकार शामिल थे। इस परिचर्चा के विषय भी कुछ ऐसे ही चुने गए थे जिनसे एक पेशेवर पत्रकार होने के नाते हमारा वास्ता अक्सर पड़ता है। परिचर्चा में मीडिया में गहराते भ्रम, ध्रुवीकरण, क्षेत्रीय विभेद और मानहानि के आरोपों का मुकाबला करने जैसे मुद्दों पर प्रमुखता से चर्चा की गई।
 
फर्जी खबरों के अलावा एक उर्दू रिपोर्टर की जिंदगी के बारे में वरिष्ठ पत्रकार शकील हसन शम्सी का दिया व्याख्यान भी काफी सारगर्भित एवं रोचक लगा। उर्दू अखबार 'डेली इंकलाब' के संपादक (उत्तर) शम्सी ने एक भाषा को धर्म विशेष से जोड़ दिए जाने के चलते होने वाली दुश्वारियों का जिक्र करते हुए कहा कि यह धारणा उस भाषा के इस्तेमाल, लेखन एवं पाठन के तौर-तरीकों पर भी किस तरह असर डालती है। उर्दू को इस सोच के चलते काफी नुकसान उठाना पड़ा है। 
 
इस कार्यक्रम में ऑफलाइन समाचार मीडिया, समाचार टेलीविजन और समाचारपत्र मालिकों की अधिक मौजूदगी न होना मुझे अखरा। उनकी सीमित मौजूदगी से यह नहीं पता चल पाया कि वे विकासशील पत्रकारों के बारे में क्या सोच रखते हैं? इसके अलावा पत्रकारिता को बीमार बना रहीं समस्याओं के समाधान के बारे में भी कम ही सुनने को मिला। मसलन, भारत में पत्रकारिता के प्रशिक्षण स्तर में बढ़ता छिद्र इसकी गुणवत्ता में कमी को बयां कर रहा है। समाचार चैनल इसके लिए अधिक दोषी हैं। समाचार चैनलों पर आपको कई उदाहरण दिख जाएंगे जिनमें किसी घटना को खराब ढंग से रिपोर्ट किया गया हो, एकतरफा झुकाव नजर आता हो और पत्रकारिता के मानदंडों का थोड़ा भी ख्याल नहीं रहा गया होता है। लेकिन समाचारपत्र भी अपने रिपोर्टरों, संपादकों और अन्य मीडियाकर्मियों के प्रशिक्षण पर पर्याप्त धन खर्च करने के मामले में काफी भयावह रहे हैं। 
 
प्रिंट पत्रकार के तौर पर अपने 24 साल के करियर में मैंने प्रशिक्षण या फेलोशिप के लिए जो भी कोशिशें कीं वे मेरी अपनी पहल पर की गई थीं। जिन अखबारों या पत्रिकाओं में मैंने काम किया उनमें से किसी ने भी मेरे या मेरे सहयोगियों के प्रशिक्षण में न तो निवेश किया और न ही कोई सुझाव दिया। ऐसे में पेशेवर पत्रकारों के लिए डाटा, तकनीक, लेखन, संपादन या पत्रकारीय संगठन से जुड़ी किसी भी गतिविधि से संबंधित व्यावहारिक सूत्र देने वाली कार्यशाला बढिय़ा साबित होगी। लेकिन टॉक जर्नलिज्म जैसा कार्यक्रम समाचार उद्योग को अपने बारे में बात करने और आत्म-विश्लेषण के लिए बाध्य करता है। अगर भारतीय समाचार मीडिया को बेहतर काम करना है और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए सही संसाधन मुहैया कराना है तो इस तरह के कई अन्य मंचों की जरूरत है।
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