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जीएसटी के बाद पेशेवरों के लिए बढ़ी चुनौती

तिनेश भसीन और जाह्नवी भाटिया /  August 06, 2017

पेशेवर और फ्रीलांसर नए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संभवतया सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। बहुत से पेशेवरों को ज्यादा कार्यशील पूंजी की जरूरत होगी और उन्हें विभिन्न राज्यों में पंजीकरण की जरूरत पड़ सकती है। ऑनलाइन कारोबार करने वाले बहुत से लोग इस ऊहापोह में हैं कि वे नई कर प्रणाली के दायरे में आएंगे या नहीं। केपीएमजी में साझेदार एवं प्रमुख (अप्रत्यक्ष कर) सचिन मेनन कहते हैं, 'जो लोग जीएसटी के तहत आते हैं, उन्हें मासिक रिटर्न भरना होगा। बिल निपटान में करीब 60 से 90 दिन का समय लगता है। सेवा प्रदाताओं के लिए समय और ज्यादा हो सकता है। इसका मतलब है कि पेशेवरों या फ्रीलांसरों को पहले अपनी जेब से करों का भुगतान करना होगा और फिर ग्राहकों से भुगतान मिलने का इंतजार करना होगा।' कर की दर भी काफी ऊंची है। पेशेवरों को जीएसटी के तहत 18 फीसदी कर का भुगतान करना होगा, जो पहले 15 फीसदी था।

 
अगर पेशेवर और फ्रीलांसर उन लोगों को बिल दे रहे हैं, जो जीएसटी के दायरे में नहीं आते हैं तो पूंजी की जरूरत और ज्यादा होगी। ऐसे मामलों में लोगों को रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म (आरसीएम) पद्धति के जरिये जीएसटी का भुगतान करना होगा। अगर ग्राहक ने जीएसटी में पंजीकरण नहीं करा रखा है तो व्यक्ति को खुद के नाम बिल बनाना होगा और निर्धारित कर का भुगतान करना होगा। मेकमाईरिटन्र्स डॉट कॉम के मुख्य परिचालन अधिकारी वरुण आडवाणी कहते हैं, 'इससे पेशेवरों और फ्रीलांसरों को ज्यादा उधारी लेनी पड़ सकती है।'
 
अनुपालना में परेशानी 
 
जीएसटी लागू होने से पहले कोई व्यक्ति कारोबार से संबंधित खर्चों जैसे स्टेशनरी, कार्यालय से संबंधित मरम्मत आदि के लिए आयकर भरते समय छूट ले सकते थे। अब अगर आप ऐसे किसी खर्च के लिए छूट लेना चाहते हैं तो आपको जीएसटी में पंजीकृत दुकानदार या सेवा प्रदाता से खरीद या मरम्मत करानी होगी। अगर वे जीएसटी प्रणाली में पंजीकृत नहीं हैं तो आपको रिवर्स चार्ज प्रणाली की जरूरत होगी। 
 
टैक्समैन डॉट कॉम के वरिष्ठ सलाहकार वीएस दाते कहते हैं, 'यह जीएसटी प्रणाली में सबसे बड़ी दिक्कत है, जिसका सामना पेशेवरों और सेवा प्रदाताओं को करना पड़ रहा है। उन्हें मामूली खर्चों पर भी क्रेडिट का दावा करने के लिए अपनी पूंजी फंसानी होगी।' हालांकि कुछ राहत दी गई हैं। रोजाना 5,000 रुपये तक के लेनदेन को इन प्रावधानों से मुक्त रखा गया है। इस तरह किसी व्यक्ति को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका कार्यालय से संबंधित दैनिक खर्च 5,000 रुपये से कम ही रहे।
 
क्रेडिट का दावा करना मुश्किल 
 
जीएसटी उपभोग आधारित कर है। यह उस जगह लगाया जाता है, जहां उत्पादों एवं सेवाओं की खपत होती है और उस राज्य को मिलता है। अगर सेवाओं के आपूर्तिकर्ता और प्राप्तकर्ता एक ही राज्य में हैं तो यह लेनदेन आसान है। आपूर्तिकर्ता सेंट्रल जीएसटी (सीजीएसटी) और राज्य जीएसटी (एसजीएसटी) की कटौती करेंगे क्योंकि यह एक राज्य के अंदर होने वाला लेनदेन है। लेकिन अगर आपूर्तिकर्ता और प्राप्तकर्ता अलग-अलग राज्यों में हैं तो आपूर्तिकर्ता को इंटीग्रेटेड जीएसटी (आईजीएसटी) की कटौती करनी होगी। यह पूरा कर तब केंद्र के पास जाएगा और फिर राज्यों को मिलेगा। जीएसटी के तहत सालाना 20 लाख रुपये से कम कारोबार वाले पेशेवर और फ्रीलांसर कर मुक्त हैं। लेकिन यह नियम उसी स्थिति में लागू होता है, जब सेवाएं एक ही राज्य में मुहैया कराई जाती हैं। अगर सेवाएं अंतरराज्यीय यानी एक से अधिक राज्यों में हैं और आपूर्तिकर्ता चुकाए गए कर के लिए क्रेडिट का दावा करना चाहता है तो उसे जीएसटी के लिए पंजीकरण कराना ही होगा, भले ही उसका कारोबार कितना भी हो। मेनन कहते हैं, 'जिनका कारोबार कम है, उन पर यह अतिरिक्त बोझ है।'
 
जीएसटी कर को दो भागों में बांटा गया है। इसलिए किसी राज्य विशेष में पंजीकृत न होने की स्थिति में पेशेवर और फ्रीलांसर कर चुकाने के बावजूद कई मौकों पर क्रेडिट का दाव भी नहीं कर सकेंगे। माना कि मुंबई का कोई व्यक्ति बैठकों के लिए बेंगलूरु जाता है। उसके वहां रहने का खर्च आता है। होटल के बिल में सीजीएसटी और एसजीएसटी शामिल होंगे। इस चुकाए गए टैक्स के क्रेडिट का दावा करने के लिए उस पेशेवर को उस राज्य में जीएसटी पंजीकरण कराना होगा। अन्यथा वह सीजीएसटी के क्रेडिट का ही दावा कर सकेगा, सीजीएसटी के क्रेडिट का दावा नहीं कर पाएगा।
 
आरएसएम एस्ट्यूट कंसल्टिंग ग्रुप के संस्थापक सुरेश सुराणा कहते हैं, 'इसका एक हल यह है कि ग्राहक ठहरने का भुगतान करे। अन्यथा उस व्यक्ति को क्रेडिट का दावा करने के लिए उस राज्य में अलग जीएसटी पंजीकरण कराना होगा।' बहुत से पेेशेवरों और फ्रीलांसरों को यह गलत सलाह भी दी जा रही है कि अगर वे यात्रा करके अलग राज्य में ग्राहक के कार्यालय में अपनी सेवाएं देते हैं तो उन्हें वहां पंजीकरण कराना होगा। इसकी वजह यह है कि सेवा अलग राज्य में दी जा रही है। दाते कहते हैं, 'विशेषज्ञों के बीच यह विवाद का यह बिंदु रहा है, लेकिन यह सही नहीं है। ग्राहक के राज्य में जाने के बावजूद एक पेशेवर अपने राज्य से बिल जारी कर सकता है।'
 
ऑनलाइन सेवा: स्पष्ट नहीं
 
जो लोग विज्ञापन राजस्व के लिए ब्लॉग या वीडिया चैनल चलाते हैं, उन्हें साइन अप करना होता है। इसमें एक बिचौलिया या मध्यस्थ भी होता है, जो ऐसे ब्लॉगरों के ऑनलाइन पोर्टलों के लिए विभिन्न कंपनियों से विज्ञापन हासिल करता है। ऐसे मामलों में अभी यह साफ नहीं है कि ब्लॉगर या वीडिया चैनल का मालिक विज्ञापन देने वाले बिचौलिये से किस तरह जीएसटी वसूल करेगा। क्लियरटैक्स डॉट कॉम के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी अर्चित गुप्ता ने कहा, 'इसमें बिचौलिये की भौगोलिक स्थिति बहुत अहम है। अगर बिचौलिया देश के बाहर रहता है तो ऐसी सेवाएं निर्यात के दायरे में आ सकती हैं। इसलिए इस पर कोई कर नहीं लगेगा। अगर बिचौलिया भारत में रहता है, लेकिन दूसरे राज्य में रहता है तो ब्लॉगर को बिल जारी करने और आईजीएसटी वसूलने की जरूरत पड़ सकती है।' गुप्ता का कहना है कि सरकार को ऐसे लेनदेन में जीएसटी को लेकर स्थिति साफ करनी चाहिए।
 
बहुत से फ्रीलांसर कई वेबसाइट जैसे फ्रीलांंसर डॉट कॉम, एलांस डॉट कॉम आदि से काम लेते है। ये वेबसाइट उन्हें ग्राहकों से जोड़ती हैं और भुगतान उनके प्लेटफॉर्म पर किया जाता है। ऐसे मॉडल को जीएसटी के तहत ई-कॉमर्स के तहत रखा गया है। पहले सरकार ने कहा था कि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कराने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीएसटी के लिए पंजीकरण कराना अनिवार्य है। गुप्ता कहते हैं, 'इस प्रावधान को अभी टाला हुआ है। सरकार आगे स्पष्टीकरण जारी कर सकती है। फ्रीलांसर इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर उनका कारोबार 2 से 3 लाख रुपये भी रहा तो क्या उन्हें जीएसटी के लिए पंजीकरण करना होगा?'
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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