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सशक्त आर्थिक विशेषज्ञों का दल तैयार करे मोदी सरकार

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  August 06, 2017

रघुराम राजन ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर का तीन साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद पिछले साल सितंबर में पद छोड़ दिया। परंतु इसके तीन महीने पहले ही उन्होंने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि वह अमेरिका में अध्यापन की दुनिया में वापस जा रहे हैं। अरविंद पानगडिय़ा ने भी 1 अगस्त को नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय वापस जाने की घोषणा की। पानगडिय़ा तकरीबन तीन वर्ष से कुछ कम वक्त तक मोदी सरकार के साथ रहे। इन दोनों विदाइयों में क्या समानता रही? दोनों विद्वान हैं और विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा एशियाई विकास बैंक जैसे बहुराष्ट्रीय संस्थानों में कुछ वक्त बिता चुके थे। दोनों भारत सरकार को छोडऩे का चकित करने वाला निर्णय लेकर वापस शैक्षणिक जगत में गए। 

 
राजन के पास भी कार्यकाल विस्तार का विकल्प था। लेकिन इस विस्तार को लेकर विवाद के चलते उन्होंने वापस जाने का निर्णय किया। पानगडिय़ा का कार्यकाल तो प्रधानमंत्री के साथ और उनके समान था लेकिन उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया क्योंकि अगर वह इस माह  के बाद पद पर बने रहते तो वह बतौर प्रोफेसर स्थायी नौकरी गंवा देते। उनके विश्वविद्यालय ने उनका अवकाश बढ़ाने से इनकार कर दिया था। पानगडिय़ा को स्थायी नौकरी और आयोग के सीमित कार्यकाल में चयन करना था। उन्होंने स्थायी रोजगार चुना। 
 
लेकिन दोनों के पद छोडऩे में जो असमानता है वह भी ध्यान देने लायक है। पहली बात, संप्रग सरकार ने राजन को नियुक्त किया था और मोदी सरकार ने उन्हें पद पर बनाए रखा। जबकि पानगडिय़ा को मोदी सरकार ने ही नियुक्त किया था। दूसरा, राजन सरकार की नीतियों पर टिप्पणी करते रहते थे जो उनके दायरे के बाहर होने के नाते विवादित होती थीं। पानगडिय़ा अविवादित रहे। हालांकि उनके कुछ नीतिगत पत्रों ने संघ परिवार को नाराज किया। तीसरी बात, राजन के विपरीत वह चर्चा से दूर रहे। अकादमिक जगत के प्रशिक्षित अर्थशास्त्रियों को सरकारी नौकरी की अपेक्षा के अनुरूप खुद को ढालने में वक्त लगता है। कुछ के लिए यह बदलाव आसान होता है तो अन्य के साथ विवाद जुड़ जाते हैं। 
 
सरकार के पास इसके सिवा कोई विकल्प भी नहीं दिख रहा कि वह देश या विदेश के शीर्ष विश्वविद्यालयों के अर्थशास्त्रियों को अपने साथ जोड़े। बहुत कम सरकारी नौकरशाह आर्थिक नीति सलाहकार या आर्थिक नीति प्रशासक की भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में सरकार को विदेशी विश्वविद्यालयों की बाट जोहनी ही होती है। फिर चाहे अरविंद पानगडिय़ा हों, अरविंद सुब्रमण्यन (मुख्य आर्थिक सलाहकार) हों या विरल आचार्य (आरबीआई के डिप्टी गवर्नर), मोदी सरकार से जुडऩे के पहले सभी अमेरिकी संस्थानों में पढ़ा रहे थे। पानगडिय़ा जा चुके हैं, सुब्रमण्यन का कार्यकाल अगले महीने पूरा हो रहा है और आचार्य ने अपना कार्यकाल गत दिसंबर में ही शुरू किया है। सरकार मौजूदा हालात में प्रतिभाओं को जोड़कर रखने के लिए क्या करेगी? 
पहली बात, सरकार को अर्थशास्त्रियों को अनुबंधित करने के पहले अनुबंध की शर्तें आदि दुरुस्त करनी चाहिए। इस क्रम में सरकार को अर्थशास्त्रियों का कार्यकाल तय करना चाहिए और सेवा विस्तार के मुद्दों को स्पष्टï करना चाहिए। दूसरा, सरकार को अतीत से सबक लेना चाहिए। सरकार के भीतर प्रतिभाओं को निखारने से बेहतर कुछ नहीं। खासतौर पर ऐसे विशेषज्ञों को जिन्हें सिविल सेवा से सरकार में न लाया जा सकता हो।
 
करीब 25 वर्ष पहले केंद्र सरकार के अहम आर्थिक मंत्रालयों और अन्य विभागों में ऐसे ही विशिष्टï और सक्षम आर्थिक सलाहकार हुआ करते थे। इनमें विमल जालान, मोंटेक सिंह आहलूवालिया, शंकर आचार्य, विजय केलकर, राकेश मोहन, दीपक नैयर और नितिन देसाई शामिल हैं। इनमें से कोई भी आयातित नहीं था। ये सभी लंबे समय से सरकार से जुड़े रहे और धीरे-धीरे निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन गए। इसका लाभ आगामी कई दशकों तक कई सरकारों को मिला। 
 
दुर्भाग्य की बात है कि सरकार की विशेष प्रतिभाओं को तराशने और संवारने का काम सन 1980 के दशक के आखिर से बंद कर दिया गया। परिणामस्वरूप उपरोक्त अधिकारियों के सेवानिवृत्त होते जाने के चलते बीते डेढ़ दशक से सरकार को आर्थिक मामलों के ऐसे विशेषज्ञों की सेवाओं का कोई लाभ नहीं मिल सका। इसी तरह आर्थिक मामलों के मंत्रालयों में नई प्रतिभाओं को पहचानने का काम कठिन होता गया। हां, कौशिक बसु, रघुराम राजन और अरविंद पानगडिय़ा जैसे लोग हैं लेकिन वे व्यवस्था में टिकते नहीं हैं। अब वक्त है कि मोदी सरकार को अर्थशास्त्रियों की टीम तैयार करने का प्रयास शुरू करना चाहिए। अधिकारियों को विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और संगठनों में प्रशिक्षित करना भी एक पहलू है। इसके लिए इंडियन इकनॉमिक सर्विस में शामिल होने वाले अधिकारियों के उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है। इन प्रतिभाशाली अधिकारियों पर करीबी नजर रखनी चाहिए। सरकार के पास विशिष्टï अर्थशास्त्रियों की तादाद बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि विभिन्न चरणों में पेशेवर अर्थशास्त्रियों को भर्ती करना चाहिए। सरकार इस विशाल पूल में से बेहतरीन का चयन आर्थिक मंत्रालयों की जरूरत के मुताबिक किया जा सकता है। सरकार को यह याद रखना चाहिए कि ऐसी प्रतिभाएं देश में मौजूद कई आर्थिक नीति संबंधी थिंक टैंक और शीर्ष अकादमिक संस्थानों से भी हासिल की जा सकती हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों से शीर्ष आर्थिक प्रोफेसरों को बुलाना अल्पावधि के लक्ष्य को पूरा करने में मददगार साबित हो सकता है। लेकिन केवल उतना करना ही पर्याप्त नहीं है। यह बात सरकार के भीतर मजबूत आर्थिक विशेषज्ञों की टीम तैयार करने का विकल्प नहीं हो सकती। 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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