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भ्रष्टाचार से निपटने को तैयार होता देश

अशोक लाहिड़ी /  August 04, 2017

भ्रष्ट राजनेताओं को लेकर सहिष्णुता कम हो रही है लेकिन अब भी वे चुनाव जीतने में कामयाब हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अशोक लाहिड़ी

 
यह समसामयिक ही है। बुधवार 26 जुलाई को बिहार में जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी सरकार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर जो राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद के बेटे हैं, भ्रष्टाचार के आरोप थे। नीतीश का कहना है कि वह सरकार चलाने में असहज थे। दो दिन बाद शुक्रवार 28 जुलाई को पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के आरोप में पद के अयोग्य घोषित कर दिया। इस फैसले के बाद शरीफ को इस्तीफा देना पड़ा। 
 
दक्षिण एशिया की तमाम अन्य बड़ी घटनाओं की तरह इन घटनाओं में भी षडयंत्र सूंघा जा रहा है। बिहार के मामले में नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से हाथ मिला लिया और 24 घंटे के भीतर दोबारा सरकार बना ली। इसके साथ ही इन अटकलों को बल मिला कि सीबीआई ने लालू प्रसाद के परिवार के भ्रष्टाचार के आरोपों की फाइल खोली ही इसलिए है ताकि जदयू-राजद सरकार को अस्थिर किया जा सके। 
 
शरीफ के मामले में कुछ लोगों का कहना है कि वहां की सेना असैनिक शासन के खिलाफ है। उसने 30 साल तक देश पर शासन किया है। जब भी कोई असैन्य सरकार लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में आती है तो सेना उसका कार्यकाल पूरा होने के पहले उसे अस्थिर कर देती है। शरीफ को हटाया जाना एक तरह का विधिक तख्तापलट है जिसे पनामा पेपर्स के बहाने वहां की सेना ने अंजाम दिया है। बहरहाल इन षडयंत्र सूंघते सिद्घांतों के इतर बिहार और पाकिस्तान की घटनाओं को दक्षिण एशियाई लोकतंत्र खासतौर पर भारत से निकले इस संकेत के रूप में देखा जा सकता है कि यहां उच्च पदस्थ लोगों के भ्रष्टाचार का विरोध हो रहा है। 
 
लोकतांत्रिक संस्थानों और राजनीति में भ्रष्टाचार की पहचान आसान हुई है और सामने आ रही है। वहीं नागरिक और राजनीतिक विपक्ष इसे अहम मुद्दा बनाते हैं और इससे निजात के लिए न्यायिक रास्ता लेते हैं। शायद नीतीश कुमार को यह भय सता रहा था कि भ्रष्टï माने जाने वालों के साथ का गठजोड़ उनको चुनावी मुश्किल में डालेगा। यह बात ध्यान देने लायक है कि उच्च पदस्थ लोगों में भ्रष्टाचार आजादी के बाद से ही देश में  आम बहस का हिस्सा है। भारत पर नजर रखने वाले वरिष्ठï विद्वान स्टैनली कोचानेक ने कहा था, 'दुनिया में कहीं भी भ्रष्टाचार पर इतनी व्यापक चर्चा नहीं होती जितनी कि भारत में।'
 
सन 1950 के दशक में पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल के मंत्री राव शिवबहादुर सिंह (पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह के पिता) को भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया और सजा भी हुई। उन्हें एक हीरा खनन कंपनी से रिश्वत लेने का दोषी पाया गया था। गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस समस्या से निपटने के लिए संतनम समिति का गठन किया और सन 1960 के दशक में प्रताप सिंह कैरों से जुड़े घोटाले के चलते यह चर्चा लगतार चलती रही। सन 1970 के दशक में मंत्री एल एन मिश्रा का नाम आयात लाइसेंस घोटाले में सामने आया। बाद में उनकी बम हमले में रहस्यमय मौत हो गई। सन 1980 का दशक ए आर अंतुले घोटाले और बोफोर्स घोटाले के नाम रहा। 
 
सन 1990 के दशक में सेंट किट्स घोटाला, जैन हवाला कांड, सुखराम दूरसंचार घोटाला और लखूभाई पाठक धोखाधड़ी मामला चर्चा में रहे। इनमें चंद्रास्वामी और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के नाम तक सामने आए। 21वीं सदी का पहला दशक कोलगेट, 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन, राष्ट्रमंडल खेल और व्यापम घोटाले लेकर आया। बहरहाल उच्च स्थानों पर भ्रष्टाचार की चर्चा से कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता। इस मामले में मीडिया केवल बुरी खबरों को बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है। उच्च पदस्थ लोगों ने भी भ्रष्टाचार को लेकर तमाम बढ़ीचढ़ी बातें कीं। सन 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश को आश्वस्त किया था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग चलती रहेगी। बहरहाल, अगर कोई जंग छिड़ी भी तो उसके परिणाम नजर नहीं आए। 
 
वर्ष 2014 के आम चुनाव के पहले प्रचार अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी, 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा।' तो क्या देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था भ्रष्टाचार से इसलिए लड़ रही है क्योंकि नेतृत्व में परिवर्तन हुआ है। नेता मायने रखते हैं लेकिन केवल नेतृत्व में बदलाव को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना कोई ठीक नहीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेता संविधान, संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह होते हैं। इतना ही नहीं, एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेता जनता या मतदाताओं का ही चुना हुआ होता है। कहा जाता है कि लोगों को वही नेता मिलता है जिसके वे लायक होते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता महत्त्वपूर्ण है। चुने हुए नेता उनके प्रतिनिधि होते हैं। संभव है भारतीय लोकतंत्र भ्रष्टïचार का सामना बदलते मतदाताओं में गरीबी, निरक्षरता और संचार की कमी जैसी दिक्कतें दूर होने से भी कर रहा हो। सन 2014 के लोकसभा चुनाव में एक सर्वेक्षण में शामिल लोगों में से 12 फीसदी ने कहा था कि भ्रष्टाचार उनके लिए सबसे बड़ी चिंता है। इससे आगे केवल मुद्रास्फीति थी जिसे 19 फीसदी लोगों ने बड़ी समस्या बताया था।
 
करीब 2,500 साल पहले कौटिल्य का यह कहना ठीक हो सकता है कि उच्च पदों पर बैठकर भ्रष्टाचार से बचना उतना ही मुश्किल हो सकता है जितना कि जिह्वïा पर रखे मधु को खाने से बचना। मौजूदा भारत जैसे सूचित समाज में अब भ्रष्टाचार का पता लगाना और आसान है। सामंती संस्कृति के साथ ही उच्च पदों पर खराब व्यवहार के प्रति सहिष्णुता कम होती जा रही है। सार्वजनिक स्थानों पर बैठकर धन के आकर्षण से बच पाना मुश्किल हो सकता है लेकिन आम जनता नेताओं से यही उम्मीद करती है।
 
लेकिन अभी तक ऐसी अवधारणा देखने को नहीं मिल रही है जिसमें गलत करने वालों को निर्वाचित ही न किया जाए। उदाहरण के लिए सीबीआई द्वारा नरसिंह राव सरकार में संचार मंत्री रहे पंडित सुखराम के घर तमाम संपत्ति बरामद करने के बावजूद वह सन 1998 में हिमाचल प्रदेश में मंडी से विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे। वह भी बहुत भारी बहुमत से। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद जे जयललिता तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के लिए चुनाव लगातार जीतती रहीं। बिहार में लालू प्रसाद चारा घोटाला मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं लेकिन इसके बावजूद वहां राजद का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है। उनके परिवार के तमाम लोगों को चुनावी जीत मिली। उम्मीद की जानी चाहिए अगले लोकसभा चुनाव तक यह प्रवृत्ति भी बदल जाएगी।
Keyword: india, corruption,,
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