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सुधार की बारी?

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 04, 2017

अर्थव्यवस्था में एक वर्ष पहले से मंदी नजर आने लगी थी। नवंबर में नोटबंदी के बाद यह और गहरा गई। जनवरी-मार्च तिमाही में सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में हुई 5.6 फीसदी की मामूली वृद्घि को देखकर यह बात स्पष्टï होती है। पिछले वर्ष की समान तिमाही में यह दर 8.7 फीसदी थी। इन चार तिमाहियों की बात करें विनिर्माण क्षेत्र की वृद्घि दर जनवरी-मार्च 2016 के 12.7 फीसदी से घटकर 5.3 फीसदी रह गई। इस बीच विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियां बहुत हद तक स्थगित रहीं। यहां बड़ा सवाल यह है कि अप्रैल- जून 2017 तिमाही के इस माह के आखिर में जारी होने वाले आंकड़े मंदी की स्थिति में किसी तरह के सुधार का संकेत लाएंगे? अधिकांश विशेषज्ञों का अनुमान है कि मंदी अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है और अगली तिमाही में वृद्घि के आंकड़े बेहतर होंगे। बुरी से बुरी स्थिति में यह आंकड़ा 5.5 से 6.0 फीसदी पर स्थिर रहेगा। निश्चित तौर पर यह यकीन करना मुश्किल है कि जीवीए वृद्घि जनवरी-मार्च के स्तर से भी निचले स्तर पर चली जाएगी। बहरहाल, सतर्कता बरतना जरूरी है और बहुत अधिक तेजी की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के सूचकांकों से निकले ताजा संकेत बताते हैं कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की वजह से उत्पन्न हलचल वर्ष 2017-18 की पहली छमाही को प्रभावित करेगी। 

 
कॉर्पोरेट परिणाम तथा ऋण वृद्घि जैसे आंकड़े भी कोई उम्मीद नहीं जगाते। यह भी संभव है कि देश में आंकड़े जुटाने की व्यवस्था का विरोधाभास अगस्त के अंत में कुछ सुखद समाचार दे सकता है। अगर वैसा होता है तो भी देश की आर्थिक वृद्घि को लेकर आशाएं कमजोर ही रहेंगी। उम्मीद की बात यही है कि बीती तीन तिमाहियों से किसी न किसी वजह से चली आ रही मंदी आज नहीं तो कल समाप्त हो जाएगी। नोटबंदी के कारण लगे झटके से अगर एक बार पूरी तरह निपट लिया गया और जीएसटी से उत्पन्न हलचल शांत हो गई तो वृद्घि के आंकड़े खुद ही बेहतर हो जाएंगे। सबसे बढ़कर लगातार दूसरे वर्ष मॉनसून में बेहतरी देखने को मिली है। बेहतर कर संग्रह से भी हालात सुधर सकते हैं। यानी शेयर बाजार में जो आशावाद नजर आ रहा है वह कहीं न कहीं सही ठहर सकता है। लेकिन किसी को यह उम्मीद नहीं है कि वर्ष 2017-18 किसी भी मायने में वर्ष 2016-17 से बेहतर साबित होगा। वर्ष 2016-17 में 7.1 फीसदी की वृद्घि दर हासिल हुई थी। वर्ष 2018-19 इस सरकार का अंतिम वर्ष होगा। उस वर्ष अवश्य इससे बेहतर हालात देखने को मिल सकते हैं। परंतु सरकार का पूरा पांच वर्ष का कार्यकाल मिलाकर भी जीवीए में 7 फीसदी से अधिक की वृद्घि शायद ही देखने को मिले। यह ठीक है लेकिन वर्ष 2009-14 के पांच साल की अवधि में हासिल 7.2 फीसदी की दर से अलग नहीं है। जिन लोगों को उम्मीद थी कि नई सरकार मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली पिछली सरकार से अलग होगी, वह टूट गई होगी। मोदी सरकार मध्यम अवधि की इस गिरावट के बाद एकदम विपरीत प्रदर्शन कर सकती है। ऐसी स्थिति में अंतिम निष्कर्ष बदल जाएगा। मोदी सरकार के कुछ कदमों का असर वर्ष 2019 में या उसके बाद ही नजर आएगा। मसलन रेलवे का भारी भरकम निवेश और राजमार्ग कार्यक्रम में नई जान फूंकने की योजना। 
 
उत्साह बढ़ाने वाली बात यह है कि सरकार ने बीते एक साल में सुधार का काम अधिक गंभीरता से लिया है। भविष्य में दो ऐसे काम होने हैं जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। एक तो एयर इंडिया की बिक्री और दूसरा पेट्रोलियम सब्सिडी का पूरी तरह खात्मा। अगर दो या तीन और समस्याग्रस्त कंपनियों को बेचा जा सका तथा कुछ छोटे, पूंजी की दृष्टिï से कमजोर बैंकों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जा सका तो मोदी सरकार के बारे में यह कहा जा सकेगा कि उसने वह कर दिखाया जिसे करने में पहले काफी हिचक देखने को मिल रही थी। 
 
अगर किसी भी अर्थशास्त्री से पूछा जाए कि मोदी सरकार ने अब तक कौन से सुधार नहीं किए हैं तो उनमें पहला नाम श्रम कानून सुधारों का है। आज के अतार्किक कानूनों को नए सिरे से लिखने की आवश्यकता है। ये पुराने कानून केवल श्रम बाजार के आपूर्ति क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। कुछ मायनों में आपूर्ति क्षेत्र अहम है। मसलन कौशल कार्यक्रमों में सुधार और स्कूलों और तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार। रुपये के बाहरी मूल्य का पुनर्निर्धारण, व्यापक आपूर्ति शृंखला स्थापित करना आदि काम भी साथ-साथ करने होंगे। इसके लिए संगठित खुदरा क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है। अगर मोदी सरकार को दूसरे कार्यकाल में बेहतर काम करना है तो ये शुरुआत अभी करनी होगी।
Keyword: india, economy,,
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