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संस्थापक भविष्य की खातिर अपनी कंपनी में कुशल अगुआ करें तैयार

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  August 03, 2017

एन आर नारायण मूर्ति समय-समय पर चौंकाने वाले बयान देते रहते हैं। इस कड़ी में उनका हालिया बयान यह था कि वर्ष 2014 में इन्फोसिस को छोडऩा उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। यह उस व्यक्ति का निराशाजनक बयान था, जो बीते वर्षों में निरंतर यह कहते रहे हैं कि भारतीय कंपनियों को सही मायनों में स्वतंत्र बोर्डों और सशक्त पेशेवर प्रबंधन की दरकार है। इन्फोसिस के बोर्ड में भारतीय उद्योग जगत के कुछ दिग्गज नाम और एक ऐसा प्रबंध निदेशक शामिल है, जिसे खुद मूर्ति ने चुना है। इसके बावजूद सह-संस्थापक ने कंपनी जल्द छोडऩे को लेकर 'पछतावे' की बात कही है। इससे बाहरी दुनिया में यह संदेश गया है कि उन्हें बोर्ड और प्रबंधन में भरोसा नहीं है। 

 
मूर्ति ने पहले ही दुनिया को यह जता दिया था कि वह इन्फोसिस के वर्तमान चेयरमैन और कंपनी को चलाने के तरीके से खुश नहीं हैं। उसके बाद कंपनी ने उनकी चिंताएं दूर करने के लिए कई कदम उठाए थे। लेकिन जब हर कोई यह सोच रहा था कि अब ये मसले हल हो गए हैं तो मूर्ति ने एक और धमाका कर दिया और यह साफ कर दिया कि वह अब भी बहुत नाखुश हैं। 
 
ऐसा नहीं है कि मूर्ति ने 2014 में जल्दबाजी में इन्फोसिस छोड़ी थी। उस समय वह दूसरी बार कंपनी में आए थे। दरअसल वह वर्ष 2011 में गैर-कार्यकारी चेयरमैन के पद से सेवानिवृत्त हो गए थे, लेकिन मुश्किल दौर से गुजरती इन्फोसिस ने उन्हें अगुआई के लिए वापस बुलाया और 2013 में कार्यकारी चेयरमैन बनाया। इस तरह वह माइकल डेल, स्टीव जॉब्स और हॉवर्ड शुल्ज जैसे संस्थापकों की प्रतिष्ठित उद्यमियों की फेहरिस्त में शामिल हो गए। मूर्ति की तरह ये अन्य सभी भी सेवानिवृत्ति या बाहर निकाले जाने के बाद फिर से अपनी कंपनियों में लौटे थे। लेकिन कंपनी के नियमों के पालन के प्रति प्रतिबद्ध माने जाने वाले मूर्ति कंपनी में कार्यकारी भूमिका में लौटे, जबकि उनकी उम्र इन्फोसिस की आधिकारिक सेवानिवृत्ति उम्र 65 साल से काफी ज्यादा हो गई थी। 
 
अहम बात यह है कि मूर्ति बोर्ड और प्रबंधन के खिलाफ तीखी सार्वजनिक बयानबाजी कर और उन्हें रक्षात्मक स्थिति में आने के लिए बाध्य कर असल में क्या हासिल करना चाह रहे हैं। मूर्ति के नजदीकी माने जाने वाले इन्फोसिस के को-चेयरमैन रवि वेंकटेशन इस दिशा में कड़ी मेहनत कर रहे हैं कि प्रवर्तक और प्रबंधन 'एक इन्फोसिस' के रूप में एकजुट होकर काम करें और अलग-अलग काम न करें। सवाल पैदा होता है कि क्या इन प्रयासों के सकारात्मक नतीजे आए हैं। बहुत से लोगों का कहना है कि मूर्ति वर्ष 2014 में इन्फोसिस में केवल इसलिए आए थे क्योंकि उस समय कंपनी मुश्किल हालात में थी। लेकिन इसकी व्याख्या इस महान व्यक्ति की सबसे बड़ी असफलता के रूप में भी की जा सकती है। यह पचने वाली बात नहीं है कि वह कंपनी में दो दशक के अपने कार्यकाल के दौरान एक भी ऐसा नेतृत्वकर्ता तैयार नहीं कर पाए, जो आगे कंपनी को चला सके। आखिर में जब बाहर से प्रबंधक लाया जाता है तो संस्थापक दो साल तक इंतजार करते हैं और फिर कंपनी चलाने के तरीकों के बारे में अपनी चिंताओं को लेकर सार्वजनिक बयानों की झड़ी लगा देते हैं।
 
अहम बिंदु यह है कि खुद को एक ऐसा व्यक्ति बनाना, जिसका कोई विकल्प नहीं है, वह एक कौशल है और ऐसा लगता है कि बहुत से नेतृत्वकर्ताओं इस ललित कला में पारंगत हो गए है। कंपनियों के इतिहास से हमें पता चलता है कि कैसे संस्थापक कंपनियों की शुरुआत और इन्हें बनाने में अच्छे रहते हैं, लेकिन कंपनी को छोड़ते समय और उनके बिना नए अगुआ की अगुआई में संगठन को बढऩे देने की मंजूरी में बुरा बरताव करते हैं। यह बात केवल मूर्ति पर ही लागू नहीं होती है। अनुसंधान में पाया गया है कि ज्यादा अगुआ यह सोचते हैं और अन्य को यह सोचने के लिए बाध्य करते हैं कि उनका कोई विकल्प नहीं है। ज्यादा भयावह स्थिति वह होती है, जब वे पद छोडऩे के बाद कंपनी में खुद द्वारा तय नियमों में बिल्कुल भी छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करते हैं। इसमें वे बाहरी दुनिया में आए अहम बदलावों की भी अनदेखी करते हैं। इसमें किसी को संदेह नहीं है कि इन अगुआओं ने कंपनी के लिए बहुत कुछ किया है। वे बहुत प्रतिभाशाली होते हैं, उन्होंने काम के लिए सर्वस्व दिया है और उन्होंने अपने संगठन पर अपनी अमित छाप छोड़ी है। लोग यही चाहते हैं कि वे कंपनी को छोडऩा भी सीखें। 
 
इसे संस्थापक का सिंड्रोम कहा जाता है, जो उस स्थिति में होता है जब कोई संगठन अपने मिशन पर ध्यान देने के बजाय संस्थापक जैसे अहम शख्स के मुताबिक चलता है। यह बहुत पेचीदा मामला है कि संस्थापक भविष्यद्रष्टा, अत्यधिक करिश्माई और शानदार व्यक्तित्व वाला है या नहीं। कंपनी के पीछे एक मजबूत संस्थापक होना ज्यादा दिक्कत पैदा करता है। उसने जिस सीईओ को नियुक्त करने में मदद की है, वह हर समय संस्थापक की सोच का पूर्वानुमान लगाता रहता है। 
 
कोई भी संगठन इस विश्वास से नहीं चल सकता कि उसके संस्थापक हमेशा उसके साथ बने रहेंगे। इसलिए संस्थापकों को खुद से ये सवाल पूछने चाहिए कि क्या उन्होंने संगठन को इस लायक बना दिया है कि वह उनकी गैर-मौजूदगी में भी फल-फूल सकता है? क्या वे संगठन को छोडऩे के बारे में विचार कर सकते हैं? अगर इसका जवाब नहीं है तो इसका मतलब है कि संस्थापकों ने संगठन को मिशन से नहीं बल्कि खुद से जोड़ दिया है। 
Keyword: infosys, इन्फोसिस, संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति,
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