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अब सरकार की बारी

संपादकीय /  August 02, 2017

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने वर्ष 2017-18 की अपनी तीसरी दोमाही समीक्षा में वही किया है जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। उसने नीतिगत दरों में 25 आधार अंक की कटौती की है। एमपीसी के बुधवार को जारी वक्तव्य में कहा गया कि यह निर्णय निष्पक्ष मौद्रिक नीति संबंधी रुख को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। समिति इस रुख को बदलने से लगातार इनकार करती रही है। एमपीसी के वक्तव्य से आमतौर पर यही भावना निकलकर आई कि मुद्रास्फीति को लेकर अपेक्षा से कम अनुमान और लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था ने उसे कटौती के लिए मजबूर किया। मुद्रास्फीति के ऊपरी स्तर को लेकर जोखिम बरकरार रहा जो चिंता का सबब बना रहा लेकिन इसके बावजूद कहा जा सकता है कि कटौती का निर्णय अनिच्छापूर्वक लिया गया है।

 
एक के बाद एक जारी हुए आंकड़े बता रहे थे कि अर्थव्यवस्था में धीमापन है। ऐसे में दरों में कटौती अपेक्षित थी। खाद्य मुद्रास्फीति मई में नकारात्मक हो गई थी और जून में भी यही सिलसिला रहा। कुल मिलाकर खुदरा महंगाई वर्ष 2011-12 के नए आधार वर्ष के हिसाब से न्यूनतम स्तर पर आ गई। शहरी मांग में कमी बताती है कि कंपनियों के पास बहुत ज्यादा मूल्य शक्ति शेष नहीं है। इस बीच अर्थव्यवस्था के उत्पादन क्षेत्र के आंकड़े भी व्याकुल करने वाले हैं। आंकड़ों के मुताबिक मई माह में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक सालाना आधार पर 1.7 फीसदी रहा। एमपीसी के वक्तव्य में यह भी कहा गया कि नए निवेश में कमी आई है और पहली तिमाही में वह 12 वर्ष के न्यूनतम स्तर पर आ गया। सरकार के अर्थशास्त्रियों का रुख इन आंकड़ों से निकलने वाले निष्कर्षों को लेकर ठोस बना रहा। उनका कहना था कि इन आंकड़ों से निकलने वाले निष्कर्ष यही बताते हैं कि मुद्रास्फीति के कम स्तरों को लेकर मुद्रास्फीतिक प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव आया है। उन्होंने अपस्फीति के रुझान को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि नीति निर्माताओं को वास्तविक आंकड़ों पर ध्यान रखना चाहिए, बजाय कि अनुमान आधारित मॉडलों के, जिनमें गलती की आशंका अधिक रहती है। एमपीसी पर यह दबाव बनाया गया कि वह स्वीकार कर ले कि मुद्रास्फीति के ऊपरी स्तर को लेकर कुछ जोखिम या तो कम हुए हैं या फिर फलीभूत नहीं हुए हैं। कुलमिलाकर एमपीसी पर इतना अधिक दबाव था कि वह उसे बरदाश्त नहीं कर सकी।
 
इस बात को भी समझा जा सकता है कि आखिर एमपीसी ने सतर्कता बरतने की क्यों ठानी। उसने केवल 25 आधार अंकों की कटौती क्यों की जबकि वह 50 आधार अंक या इससे ज्यादा की कटौती कर सकती थी। इस समाचार पत्र समेत कई धड़ों का यह मानना रहा है कि पूंजी की लागत को ध्यान में रखते हुए ऐसा करना जरूरी था। एमपीसी ने मुद्रास्फीति के ऊपरी जोखिम को तो समझा लेकिन उसने मुद्रास्फीतिक दबाव में बड़े बदलाव की अवधारणा स्वीकार नहीं की। उसने कहा कि आधारभूत मुद्रास्फीति के दायरे को लेकर अनिश्चितता बरकरार है। बहरहाल, चाहे जो भी हो लेकिन कोई भी यह बात ठीकठीक नहीं जानता है कि मुद्रास्फीति में हाल के दिनों में जो कमी आई है वह कितनी ढांचागत है और कितनी नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर के कारण। वक्तव्य से यह स्पष्ट हुआ कि एमपीसी को लगता है कि दरों में कटौती के जरिये कम मुद्रास्फीति को स्वीकार करके उसने अपना काम कर दिया। अब यह केंद्र और राज्यों की सरकारों पर निर्भर करता है कि वे आगे बढ़कर निवेश में आए गतिरोध को दूर करें। इसके लिए उनको परियोजनाओं को मंजूरी की गति तेज करनी होगी और फंसे हुए ऋण की समस्या से तेजी से निपटना होगा।
Keyword: bank, repo rate, RBI, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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