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प्रिंटिंग पेपर मिलों को मिली राहत

दिलीप कुमार झा / मुंबई August 01, 2017

असंगठित क्षेत्र की कंपनियों पर सख्त पर्यावरण मानकों का भारी असर पड़ रहा है। इस कारण संगठित क्षेत्र की लेखन एवं मुद्रण पेपर मिलों ने पिछली 6 तिमाहियों के दौरान अपने राजस्व और मुनाफे में अच्छी तेजी दर्ज की है।
उदाहरण के लिए, जहां शेषशायी पेपर का शुद्घ लाभ मार्च 2017 की तिमाही में लगभग 10 गुना बढ़कर 39.54 करोड़ रुपये हो गया, वहीं वेस्ट कोस्ट पेपर ने दिसंबर 2015 की तिमाही के बाद से अपने कर-बाद मुनाफे (पीएटी) में ढाई गुना की तेजी दर्ज की है। इंटरनैशनल पेपर, जेके पेपर और तमिलनाडु न्यूजप्रिंट का भी मुनाफा बढ़ा, पर धीमी गति से। इन कंपनियों का राजस्व भी अच्छा बढ़ा है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ((सीपीसीबी) के सख्त पर्यावरण कानून लागू करने से पिछली 6 तिमाहियों के दौरान बड़ी तादाद में छोटी एवं मझोले आकार की इकाइयां बंद हुई हैं। इससे इस उद्योग के बड़े लेखन एवं प्रिंटिंग पेपर निर्माताओं ने मजबूती दर्ज की है। कागज निर्माण के लिए मिलों को स्वच्छ और हरित तकनीक अपनानने के लिए भारी पूंजी निवेश की जरूरत है। छोटी और मझोले आकार की कंपनियां इतना बोझ नहीं उठा सकती हैं।
जेके पेपर के मुख्य वित्तीय अधिकारी वी कुमारस्वामी ने कहा, 'देश में असंगठित क्षेत्र की लगभग 20 फीसदी लेखन एवं मुद्रण पेपर मिलें पिछली 6 तिमाहियों के दौरान परिचालन बंद कर चुकी हैं। इससे संगठित क्षेत्र की कंपनियों को फायदा मिल रहा है।' उद्योग की सर्वोच्च संस्था भारतीय कागत निर्माता संघ (आईपीएमए) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत का कुल लेखन एवं मुद्रण कागज बाजार 5 फीसदी की सालाना वृद्घि के साथ वर्ष 2015-16 में 46 लाख टन पर था।
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लेखन एवं मुद्रण कागज की मजबूत कीमतों और दक्षता सुधार पर जोर देने से उत्पादन की घटती लागत से इस क्षेत्र की घरेलू कंपनियों के मुनाफे को मदद मिल रही है। क्रिसिल ने ऐसी 71 कागज मिलों पर अध्ययन कराया है जिनका इस क्षेत्र की बिक्री में लगभग 50 प्रतिशत का योगदान है। अध्ययन से संकेत मिला कि नकदी प्रवाह में सुधार से कंपनियों को अपना कर्ज बोझ 1800 करोड़ रुपये तक घटाने में मदद मिलेगी। परिणामस्वरूप, शुद्घ कर्ज वित्त वर्ष 2019 तक घट कर एबिटा का लगभग दोगुना रह जाएगा, जो वित्त वर्ष 2015 में लगभग 5 गुना पर था।
क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक मनीष गुप्ता ने कहा, 'हमने पिछले पांच साल के दौरान कृषि वानिकीकरण के तहत रकबे में दोगुना इजाफा दर्ज किया है। वर्ष 2012 से जिंसों की कीमतों में अधिक वृद्घि नहीं होने से किसानों के लिए लकड़ी उगाना अपेक्षाकृत अधिक लाभदायक बना है। हाल के वर्षों के दौरान प्रति एकड़ बेहतर उपज (क्लोन के जरिये तैयार पौधे के साथ) से भी किसानों को मदद मिली है। साथ ही लकड़ी व्यवसाय ने उद्योग को कच्चे माल की 2012 जैसी किल्लत के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की है।' इस बीच, लेखन एवं मुद्रण कागज की मांग आयात में तेजी आने की वजह से बढ़ी है। साक्षरता दर बढ़ाने पर सरकार के ध्यान देने से भी लेखन एवं मुद्रण कागज की मांग में 5-6 फीसदी की दर से इजाफा हुआ है। हालांकि छोटी इकाइयां बंद होने और मांग बढऩे से आपूर्ति की दिक्कत बढ़ी है।
आईपीएमए के महासचिव रोहित पंडित ने कहा, 'असंगठित क्षेत्र की कंपनियां स्वच्छ एवं हरित प्रौद्योगिकी के लिए कार्यशील पूंजी की जरूरत पूरी करने में असमर्थ रही हैं। कृषि अवशेष, लकड़ी और रद्दी कागज जैसे कच्चे माल की उपलब्धता एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। जहां पिछले साल नवंबर में बड़े नोटों को चलन से बाहर किए जाने से नकदी पर असर पड़ा, वहीं जीएसटी पर अमल ने अनुपालन लागत में इजाफा किया है। इसलिए असंगठित क्षेत्र की कंपनियों को जो भी फायदे मिल रहे थे, वे खत्म हो चुके हैं। इस बीच, लेखन एवं मुद्रण कागज का आयात शुरू हुआ है। मगर यह कम है। हालंकि घरेलू उत्पादन के लिए खतरे जैसी बात नहीं है। लेकिन घरेलू बाजार में कीमतें बढऩे की स्थिति में घरेलू मिलों के सामने सस्ते आयात की आशंका बढ़ जाती है।

Keyword: Printing, paper mills,,
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