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मोदी सरकार में नए रोजगार नहीं आए, पुराने भी गंवाए

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  August 01, 2017

वृद्धि संबंधी आधिकारिक आंकड़े जारी हुए दो महीने से अधिक वक्तबीत चुका है। जनवरी से मार्च 2016 और जनवरी से मार्च 2017 के बीच मूलभूत कीमतों में सकल मूल्यवर्धन लगातार कमजोर हुआ। यह निरंतर घटता हुआ 8.7 फीसदी से 7.6 फीसदी और फिर 6.8 फीसदी तक घटता हुआ आखिरकार 5.7 फीसदी पर स्थिर हुआ। उस वक्त भी मैंने लिखा था कि वर्ष 2014 के पहले अर्थव्यवस्था में सुधार आना शुरू हुआ था लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में एक नए तरह की मंदी की शुरुआत हो चुकी है।
यह दुखद है कि इन आंकड़ों के जारी होने के बाद के दो महीनों में भी ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है जिनसे लगे कि सरकार अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए कोशिश कर रही है। यह सच है कि वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था की शुरुआत से वित्त मंत्रालय का एक हिस्सा दूसरे कामों में व्यस्त हो गया होगा लेकिन यह अब तक स्पष्ट नहीं है कि अन्य मूलभूत सुधारों को लेकर कोई हलचल है या नहीं।
आखिर क्यों यह सरकार 2019 के चुनाव के पहले सुधार के मोर्चे पर आगे बढऩे का कोई राजनीतिक दबाव महसूस नहीं कर रही? हो सकता है कि ऐसा इसलिए हो क्योंकि सत्ताधारी दल को लग रहा हो कि विपक्ष कमजोर आर्थिक प्रदर्शन का कोई लाभ नहीं ले पाएगा और 2019 में एकजुट नहीं हो पाएगा। लेकिन मोदी और अमित शाह अतिआत्मविश्वास से भरे हुए नजर नहीं आते हैं, ऐसे में यह बात खारिज हो जाती है। शायद वे यह यकीन नहीं करते हैं कि उनके आर्थिक प्रबंधन का स्पष्ट दुष्प्रभाव जीडीपी के आंकड़ों में परिलक्षित हो रहा है। वे यह कह सकते हैं कि वृद्धि दर में आई कमी की इंसानी स्तर पर जो लागत हमें चुकानी पड़ी है वह तत्काल नजर नहीं आ रही है। हो सकता है यह लागत राजनीतिक रूप से भी प्रासंगिक न हो। लेकिन ऐसा नहीं है। हकीकत में इसकी जमीनी लागत का आकलन आसान नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि देश में उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार सृजन सूचकांक का अभाव है। लेकिन इसके स्थानापन्न के रूप में कई उपाय अपनाए जाते रहे हैं। ऐसा ही एक उपाय है सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकनॉमी द्वारा आम घरों में कराया गया गहन सर्वेक्षण। इसके नतीजे बहुत परेशान करने वाले हैं। आइए इस सर्वेक्षण के कुछ बिंदुओं पर बात करते हैं:
1. सितंबर से दिसंबर 2016 के दौरान और जनवरी से अप्रैल 2017 के दौरान जमीन का मालिकाना हक रखने वाले किसानों की तादाद में 37 लाख का इजाफा हुआ जबकि कृषि श्रमिकों की तादाद में 56 लाख की कमी आई।
2. समान अवधि में गैर कृषि क्षेत्र में रोज काम करने वालों की तादाद में 56 लाख की कमी आई। जबकि इससे पहले के सर्वेक्षणों में हमने देखा था कि उनकी तादाद में 95 लाख की बढ़ोतरी हुई थी।
3. जनवरी-अप्रैल 2016 के दौरान ऐसे 9.3 करोड़ रोजगार थे जो मई से अगस्त 2016 की अवधि में घटकर 8.9 करोड़ रह गए। जबकि सितंबर से दिसंबर 2016 के दौरान यह तादाद 8.6 करोड़ रह गई। जनवरी से अप्रैल 2017 के बीच भी यह 8.6 करोड़ रही। एक साल पहले की तुलना में औपचारिक रोजगारों में 70 लाख की कमी आई है। यह आंकड़ा बेचैन करने वाला है। सर्वेक्षण में अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का असर साफ देखा जा सकता है। दैनिक वेतनभोगियों और कृषि कामगारों की तादाद में ही 1.06 करोड़ की कमी आई।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि अर्थव्यवस्था में औपचारिक रोजगार पैदा हो रहे हैं। हकीकत यह है कि बीते एक साल में ऐसे रोजगार में 70 लाख की कमी आई है। ध्यान रहे कि यह प्रक्रिया नोटबंदी के पहले से चली आ रही है।
ये तथ्य बेहद मजबूती से इस बात की ओर इशारा करते हैं कि बीते 18 माह में आर्थिक वृद्घि में धीमेपन के चलते गहरी निराशा का भाव देखने को मिला है। सरकार के पास अपनी अक्षमता के लिए कोई खास बचाव नहीं हैं। संप्रग के उलट इस सरकार के सामने कोई वैश्विक आर्थिक संकट भी नहीं है। बल्कि उसे जिंस और ईंधन कीमतों के रूप में मदद ही मिली है। वैश्विक पूंजी भी पर्याप्त मात्रा में है और मांग में भी धीमे-धीमे सुधार हो रहा है।
निष्पक्ष होकर देखें तो यही अंदाजा लगता है कि मोदी सरकार हाल के कुछ दशकों में सबसे अक्षम आर्थिक प्रबंधकों के साथ काम कर रही है। अधिक उदारता बरती जाए तो कहा जा सकता है कि सरकार ढांचागत, प्रशासनिक और वित्तीय सुधारों की ओर काफी धीमी गति से बढ़ी है। यहां तक कि आधारभूत कड़े प्रशासनिक निर्णय मसलन फंसे हुए कर्ज से निपटने के लिए जरूरी निर्णय लेने में भी देरी की गई। बुनियादी ढांचे पर इसका ध्यान केंद्रित करना स्वागतयोग्य है लेकिन प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाले ढांचागत सुधार के अभाव में नई बुनियादी व्यवस्था कारोबार और रोजगार को बढ़ावा देने वाली नहीं साबित होगी।
सरकार को यह मानना होगा कि वह न केवल नए रोजगार तैयार करने में नाकाम रही बल्कि रोजगारों की हानि भी हुई है। यह सरकार के 2014 के चुनावी वादे के एकदम विपरीत है। प्रधानमंत्री मोदी और उनके दल ने रोजगार देने का वादा किया था लेने का नहीं।  कुछ लोग इस विफलता का फायदा उठाने का प्रयास कर सकते हैं क्योंकि देश में कोई प्रभावी विपक्ष मौजूद नहीं है। परंतु ऐसा करना कतई समझदारी भरा नहीं होगा। अगर असंतोष में दम हो तो विपक्ष कभी भी उभर सकता है। फिलहाल शायद लक्ष्य यह है कि  राष्टï्रीय स्तर पर बहसों को आर्थिक मुद्दों से हटाकर सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित कर दिया जाए। यह राजनीतिक रूप से भले ही लाभदायक हो लेकिन देश के भविष्य के लिए यह नुकसानदेह होगा। सरकार को समझना होगा कि उसके पास अपनी प्रतिष्ठïा, विरासत और देश के भाग्य को बचाने का बहुत ज्यादा समय नहीं है।

Keyword: Modi government, Employment, रोजगार,
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