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कृषि ऋण माफी के नुकसान

अभीक बरुआ /  August 01, 2017

राज्य सरकारों के कृषि ऋण माफ करने से खपत में कोई सुधार नहीं होता है। बल्कि इससे निवेश चक्र ही प्रभावित होता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अभीक बरुआ
देश के किसानों के समक्ष तमाम प्रतिकूल परिस्थितियां हैं। इनमें फसल चौपट हो जाना और अत्यधिक उत्पादन होना जैसे एकदम विरोधाभासी हालात शामिल हैं। किसानों को अपनी उपज का कम मूल्य मिलने की समस्या अक्सर हमारे सामने आती है। कई बार तो उनको उपज के अंतिम मूल्य की तुलना में एक तिहाई से भी कम दाम मिलते हैं। इसकी वजह से अक्सर किसान कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। सवाल यह है कि क्या किसानों को दिए जाने वाले बैंक ऋण की माफी में इन सवालों का हल छिपा है? मेरा अनुमान है कि जिन राज्यों ने घोषणा कर दी है या करने वाले हैं, वहां यह माफी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.6 फीसदी के बराबर होगी।
यह बात ध्यान देने लायक है कि देश के किसानों का बड़ा तबका आज भी कर्ज के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर करता है। वर्ष 2011 की कृषि गणना के मुताबिक देश में कर्जमाफी की मांग कर रहे 3.28 करोड़ छोटे और सीमांत किसानों में से 1.06 करोड़ ही बैंक ऋण पर निर्भर थे। शेष 2.21 करोड़ किसान साहूकारों और रिश्तेदारों के कर्ज में थे। हो सकता है कि अब इस आंकड़े में गिरावट आई हो लेकिन फिर भी यह बहुत कम नहीं हुआ होगा। 
सरकार ने फसल बीमा की पहुंच बनाने का हर प्रयास किया है जो सराहनीय भी है। बहरहाल बीमा योजनाएं अक्सर प्राकृतिक आपदाओं से ही बचाव करती हैं। कृषि क्षेत्र की मौजूदा समस्या मोटे तौर पर फसलों के अतिशय उत्पादन से जुड़ी है। खासतौर पर दलहन के उत्पादन से। इसकी वजह से कीमतों में भारी गिरावट आई है। फसल बीमा ऐसे मामलों में कारगर साबित नहीं होता।
इस विषय पर लिख रहे कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि फसल ऋण को कृषि बीमा निगम जैसी एजेंसियों की मदद से सुरक्षित किया जाता है। इसलिए बैंकों को किसान के डिफॉल्ट यानी ऋण अदायगी में चूक की चिंता नहीं करनी चाहिए। यह भ्रामक है। फसल बीमा ऋण बीमा नहीं है। आमतौर पर फसल बीमा भुगतान फसल ऋण की तुलना में बेहद कम होता है। किसी भी कृषि ऋण अधिकारी से पूछिए वह यही बताएगा कि किसान को जिन निराशाजनक हालात में बीमा भुगतान मिलता है, उस वक्त उसके दिमाग में कहीं से भी यह बात नहीं होती है कि वह बैंकों के ऋण का भुगतान करे।
मुझे लगता है इस तथ्य को लेकर कोई मतभेद नहीं होना चाहिए कि कृषि ऋण माफी से ऋण की संस्कृति पर बुरा असर होगा। इस बात के प्रचुर प्रमाण मौजूद हैं कि विभिन्न राज्यों के तमाम अच्छी आर्थिक स्थिति वाले किसानों ने भी भुगतान रोक कर रखा होता है और यह स्थिति बैंकों के फंसे हुए कर्ज में इजाफा कर सकती है। ऋण माफी के मॉडल में अंतर भी एक पहलू है। पंजाब और महाराष्टï्र ने सभी किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा की जबकि उत्तर प्रदेश में कहा गया कि केवल छोटे और सीमांत किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा। उत्तर प्रदेश में भी सभी किसानों को माफी देने का दबाव बन रहा है। अन्य प्रदेशों की भी यही स्थिति है।
वर्ष 2008-09 में जो कृषि ऋण माफी की गई थी उसे मानक मानकर बाकायदा यह अध्ययन किया जा सकता है कि ऐसी कर्ज माफी का क्या असर होता है। विश्व बैंक के एक प्रपत्र में दो रोचक बातों का उल्लेख किया गया है। पहली, कर्ज माफी के बाद देनदारी में चूक के मामलों में भारी इजाफा होता है। दूसरा बैंक इस डिफॉल्ट का अनुमान लगा लेते हैं और उन जगहों पर कम से कम ऋण देते हैं जहां माफी का प्रभाव अधिक होता है।
एक सवाल यह भी है कि कर्ज माफी कारोबारी चक्र पर क्या असर डालती है? क्या कर्ज राहत की वजह से उपभोक्ता व्यय में इजाफा होता है, जो निवेश पर पडऩे वाले नकारात्मक असर को खत्म करने में मदद करे। यहां भी वर्ष 2008-09 का उदाहरण उपयोगी नजर आता है। विश्व बैंक का पहले का अध्ययन बताता है कि इस राहत का कोई सकारात्मक असर घरेलू खर्च पर देखने को नहीं मिला। शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आम परिवारों के जीवन में कर्ज माफी का कोई सीधा और स्थायी असर नहीं हुआ। न ही ऋण तक उनकी पहुंच में कोई फर्क आया।
कर्ज माफी के निवेश व्यय पर असर की बात करें इसका विश्लेषण इस परिदृश्य में करना होगा कि इन कर्ज माफी की भरपाई कैसे की जाएगी। किसानों को जहां राहत मिलती है, वहीं बैंकों को इसके लिए राज्य सरकार की ओर से हर्जाना मिलना होता है। प्रथम दृष्टïया इसका अर्थ यही होता है कि राज्य सरकारों को बाजार से उधारी लेनी होगी और जब राज्य बॉन्ड बाजार में आते हैं तो बॉन्ड प्रतिफल और ब्याज दर में इजाफा होने की संभावना रहती है। ऋण की लागत में यह इजाफा निवेश को प्रभावित कर सकता है। बहरहाल कुछ राज्य खासतौर पर पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के पास और अधिक ऋण लेने की गुंजाइश नहीं शेष है। ये राज्य दो कोशिशें करते नजर आ रहे हैं। पहली बात, मामूली वित्तीय इंजीनियरिंग की मदद से वे अपनी स्थिति सुधार सकते हैं। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश ने किसान राहत बॉन्ड की योजना पेश की है। यह काफी हद तक बिजली वितरण क्षेत्र की मदद के लिए प्रस्तुत किए गए उदय बॉन्ड की तरह है। इसमें बैंक ऋण को राज्य समर्थित बॉन्ड में बदलने की गुंजाइश है। राज्य सरकार इस ऋण पर ब्याज चुकाती है। इसके लिए आरबीआई की मंजूरी की आवश्यकता होती है और यह देखा जाना है कि आरबीआई को यह विचार पसंद आता है या नहीं। वहीं दूसरी ओर पंजाब ने अल्पावधि के कृषि ऋण को लंबी अवधि के कर्ज में बदलने का निश्चय किया है ताकि मूल धन के पुनर्भुगतान का दबाव न बने। इससे बैंकों में नकदी का प्रवाह प्रभावित होगा और वे शायद आगे ऋण देने के इच्छुक नहीं रहें। इससे परियोजनाओं का निवेश प्रभावित होगा।
हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार के बजट में राजकोषीय घाटे का अनुमान 3 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है। अगर इसमें चूक होती है तो व्यय में कटौती और केंद्र की मदद की आवश्यकता होगी। अगर ऐसा हुआ तो माना जाएगा कि राज्य की यही अपेक्षा थी कि केंद्र सरकार उसके घाटे की भरपाई करे। अगर केंद्र सरकार ऐसा करने से मना करती है तो इसकी गाज राज्य सरकार पर गिरेगी। बहरहाल चाहे जो भी हो इसका अंतिम असर तो निवेश संबंधी व्यय पर ही होगा।

Keyword: Agriculture, Farmers, loan waiver,
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