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व्यवहार में बदलाव लाने से सुलझ सकती है खुले में शौच की समस्या

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  July 31, 2017

लोगों के व्यवहार में तब्दीली क्यों आती है? क्या ऐसा शिक्षा की वजह से होता है? या फिर विकल्पों की मौजूदगी से ऐसा होता है? क्या यह किसी तरह का सामाजिक दबाव है? या जुर्माने का डर? या फिर ये सभी तथा कुछ और वजह इसके लिए उत्तरदायी हैं? जलवायु परिवर्तन या खुले में शौच पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रहे देश के नीति निर्माताओं के लिए यह लाख टके का सवाल है। 

 
शौचालयों की बात करें तो लोगों के घरों में शौचालय बनवाना और उन्हें इनके इस्तेमाल के लिए प्रेरित करना बहुत बड़ी पहेली बना हुआ है। महात्मा गांधी ने कहा था कि स्वच्छता आजादी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। सफाई की कमी के चलते शिशुओं की मृत्यु होती है जिसे रोका जा सकता है और कमजोर तथा अल्पविकसित बच्चे पैदा होते हैं। यह स्वीकार्य नहीं है। अच्छी खबर यह है कि देश की सरकार ने 2 अक्टूबर, 2019 तक खुले में शौच को खत्म करने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय कर रखा है। उस वर्ष महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ भी है। सरकार ने वर्षों तक शौचालय निर्माण के असफल प्रयास किए। आखिरकार उसने यह तय किया कि उसका लक्ष्य शौचालय बनाना नहीं बल्कि उनका इस्तेमाल बढ़ाना है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोगों को अपना व्यवहार बदलना होगा और शौचालयों का इस्तेमाल शुरू करना होगा। सरकार अब सर्वेक्षणों में शौचालय नहीं उनका इस्तेमाल देख रही है। यह कोई छोटा बदलाव नहीं है।
 
विभिन्न रिपोर्टों में कहा गया है कि शौचालय बने लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हुआ। वर्ष 2015 में आई नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक की रिपोर्ट में पाया गया था कि सरकारी योजनाओं के अधीन बनने वाले 20 फीसदी शौचालयों में या तो ताला लगा रहता है या फिर वे भंडारगृह की तरह इस्तेमाल में लाए जाते हैं। वर्ष 2015 में एक बार फिर राष्टï्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय में 75 जिलों के 75,000 घरों के शौचालयों का आंकड़ा दर्ज किया गया। इसके नतीजे चौंकाने वाले रहे। सिक्किम, केरल और हिमाचल प्रदेश समेत कुछ राज्यों में 90 से 100 फीसदी शौचालय इस्तेमाल में लाए जा रहे थे। लेकिन कई राज्यों में यह इस्तेमाल अत्यंत कम था। आर्थिक रूप से विपन्न राज्य झारखंड में यह स्तर 20 फीसदी था। यहां तक कि तमिलनाडु जैसे अपेक्षाकृत संपन्न और शिक्षित राज्य में भी यह मात्र 39 फीसदी था। 
 
यह आंकड़ा सुधरेगा कैसे? लोगों के व्यवहार में इसे लेकर बदलाव कैसे आएगा? इसका संबंध विकास की राजनीति से है। इस विषय पर अध्ययन करने वाले मेरे सहकर्मियों ने पाया कि देश को खुले में शौच मुक्त बनाने के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने वाली हमारी राज्य सरकारें इस बदलाव के लिए लोगों को शर्मिंदा करने को भी एक तरीके के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। 
 
राज्य सरकारें खुले में शौच को सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बना रही हैं। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तथा कुछ अन्य राज्यों ने पंचायत का चुनाव लडऩे के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि उम्मीदवार के घर में शौचालय हो। कई जिलों में खुले में शौच कर रहे लोगों को देखकर सीटी बजाई जाती है, उनकी तस्वीरें गांव में सूचना पट्टï पर लगाई जाती हैं, उनके राशन कार्ड रद्द कर उनसे सरकारी लाभ छीन लिए जाते हैं। 
 
राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में इस तरह की कार्रवाई के बहुत त्रासद परिणाम सामने आए। वहां सरकारी अधिकारी खुले में शौच कर रही महिलाओं की तस्वीर खींच रहे थे। लोगों ने इसका विरोध किया और एक व्यक्ति को जान गंवानी पड़ी। जब मेरे सहयोगी महताब शाह कच्ची बस्ती पहुंचे तो उन्होंने पाया कि यह एक अवैध बस्ती थी और महिलाओं के पास खुले में शौच के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। वे बेहद गरीब थीं, उनके पास शौचालय बनाने के लिए जमीन तक नहीं थी और उनके पास शौचालय में इस्तेमाल के लिए पानी तक नहीं था। यहां तक कि वहां बने सामुदायिक शौचालय में भी 3,000 लोगों की जरूरत का पानी नहीं हो पाता। इसका रखरखाव बेहद खराब था।
 
लेकिन खुले में शौच को केवल इतने से नहीं समझा जा सकता। आखिरकार, लोग शौचालय बनवाने के पहले मोबाइल फोन और साइकिल तो खरीदते ही हैं। ऐसे में शौचालय की मांग भला कैसे बढ़े? मेरा मानना है कि इस मामले पर खुलकर चर्चा की जाए। लोगों के व्यवहार में बदलाव लाना अत्यंत आवश्यक है। साफ-सफाई की खराब स्थिति के स्वास्थ्य पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों को लेकर भारी जागरूकता फैलाने की जरूरत है। मेरा अपना शोध बताता है कि इस लिंक को केवल नीतियों के संदर्भ में समझा जाता है, असली आंकड़ों के संदर्भ में नहीं। व्यवहार में बदलाव लाने के लिए स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता पैदा करना जरूरी है। 
 
तंबाकू को लेकर व्यवहार में बदलाव साफ देखने को मिला है। क्योंकि अब तंबाकू के दुष्प्रभाव को लेकर लोगों की समझ एकदम साफ हो चुकी है। शौचालयों के मामले में भी ऐसा ही करने की जरूरत है। आज सरकार का स्वच्छ भारत मिशन इस बात को स्वीकार करता है और इस विषय पर सूचित, शिक्षित और संवाद को प्रोत्साहित भी करता है। लेकिन खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016-17 में सरकार ने इस सिलसिले में आवंटित बजट का बमुश्किल 0.8 फीसदी इस्तेमाल किया। जबकि दिशानिर्देश 8 फीसदी इस्तेमाल के थे। 
 
शौचालय बनाने में रियायत पर्याप्त नहीं है। लोगों का व्यवहार बदलने के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है। महताब शाह कच्ची बस्ती जैसी जगहों पर सरकार को सस्ते सामुदायिक शौचालय बनाने होंगे जो साफ-सुथरे और बेहतर रखरखाव वाले हों। इस दौरान पानी और शौचालयों के संबंध का भी ध्यान रखना होगा। इसमें दो राय नहीं कि सामाजिक दबाव काम करता है लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम पीडि़तों को दोषी न ठहराएं या उनका मजाक न उड़ाएं। ऐसा करने से हम स्वच्छ भारत नहीं बल्कि एक शर्मिंदा मुल्क तैयार करेंगे।
Keyword: clean india, toilet,,
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