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कृत्रिम बुद्घिमता से होगा कारोबार में फायदा

आकाश प्रकाश /  July 31, 2017

इस क्षेत्र में भारतीय कंपनियां पिछड़ती नजर आ रही हैं। उन्हें अपने कर्मचारियों को उचित कौशल प्रदान ही नहीं करना होगा बल्कि निवेश में बढ़ोतरी भी करनी होगी। विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
इन दिनों प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कृत्रिम बुद्घिमता यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) की ही चर्चा है। रोज ही इस विषय पर कोई न कोई आलेख, शोध रिपोर्ट या कोई अन्य घोषणा सुनने को मिल जाती है। इसे लेकर तमाम तरह की बातें कही जा रही हैं। कोई कहता है कि उत्पादकता में बदलाव के मामले में यह खोज औद्योगिक क्रांति के समान साबित होगी और यह हमारे काम करने और जीवन स्तर को बदलकर रख देगी। एक दशक के शोरगुल के बाद एआई संबंधी तमाम प्रौद्योगिकी अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से में बदलाव की तैयारी नजर आ रही है। जैसे-जैसे एआई ने औद्योगिक तकनीकी क्षेत्र में प्रवेश किया है, यह आईटी सेवा प्रदाता कंपनियों के बीच विवाद का विषय बन रही है। अगर मशीनें सोच सकें और तर्क कर सकें तो फिर लोगों की आवश्यकता ही क्या रह जाएगी? देखा जाए तो यह प्रश्न मामूली नहीं है क्योंकि 10 सूचीबद्घ सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों में 20 लाख से अधिक लोग रोजगारशुदा हैं और इस उद्योग का राजस्व 900 अरब डॉलर से अधिक का है।
 
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों के लिए तो यह प्रश्न और अधिक महत्त्वपूर्ण है। देश में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के रोजगार की गति पहले ही काफी कमजोर हो चुकी है। इसका उच्चतम बिंंदु चार लाख से घटकर एक लाख पर आ चुका है। ये ऐसे रोजगार हैं जहां वेतन बहुत ज्यादा है। एक ऐसा उद्योग जो बमुश्किल चार साल पहले की 15 से 20 फीसदी की वृद्घि दर से गिरकर एक अंक में आ गया है और जिसमें सभी बड़ी कंपनियों की वृद्घि एक अंक में है तो यह प्रश्न तो बनता है कि क्या एआई आधारित समाधान इस क्षेत्र की वृद्घि दर और प्रतिस्पर्धा को आगे और प्रभावित करेंगे? सवाल यह है कि क्या उद्योग जगत में आगे और धीमापन आएगा? 
 
पहली बात तो यह है कि एआई क्या है? सामान्य तौर पर देखा जाए तो यह मानव क्षमताओं की पांच श्रेणियों को अपने आप में समाहित किए है: (1) प्राकृतिक भाषा का प्रसंस्करण यानी (आवाज को पहचानना), (2) मशीनी दृष्टिï, (3) विशेषज्ञता (आईबीएम वाटसन जैसी विशेषज्ञ व्यवस्था), (4) तार्किक क्षमता (गूगल और अल्फा गो आदि की भांति समस्या निवारण की क्षमता), (5) योजना निर्माण। दूसरा सवाल यह है कि ये सब अभी क्यों? आखिरकार एआई शब्द सबसे पहले सन 1956 में डार्टमाउथ में आयोजित एक शोध सम्मेलन में उछला था। कई गलत शुरुआत के बाद अब लगता है कि यह तकनीक सही दिशा में है। इस अवधि में क्या बदलाव आया है? दरअसल अब यह तकनीक और प्रौद्योगिकी में बदलाव पर निर्भर है। हम मशीनी शिक्षण और सॉफ्टवेयर की ओर बढ़ चुके हैं जो अपने दम पर सीख सकते हैं और नई प्रौद्योगिकी अपना सकते हैं। इन प्रशिक्षण तकनीक के लिए भारी मात्रा में आंकड़ों और गणन क्षमता की आवश्यकता होती है। इस प्रकार अब हमारे पास यह क्षमता है कि हम अत्यंत कम लागत में आंकड़े जुटा सकें, उनका प्रसंस्करण कर सकें और आकलन भी। लागत कम होने के कारण एआई का वाणिज्यिक इस्तेमाल और उसका क्रियान्वयन संभव हो सका है। एआई सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों को दो क्षेत्रों में प्रभावित करेगा एक किफायत और दूसरा वृद्धि।
 
यहां किफायत से तात्पर्य यह है कि सभी प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियों को अपने परिचालन और प्रबंधन में एआई का इस्तेमाल करना होगा। इससे उनके और उनके ग्राहकों के आईटी बुनियादी ढांचे और संसाधनों का किफायती इस्तेमाल संभव होगा। एक्सेंचर कंपनी पहले ही इस बारे में बता चुकी है कि कैसे स्वचालन और एआई की बदौलत उसे 25,000 रोजगार कम करने में मदद मिली है। रोबोटिक प्रोसेस ऑटोमेशन में एआई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। देश की अधिकांश बड़ी कंपनियां पहले ही इस दिशा में बढ़ चुकी हैं। 
 
टीसीएस ने इग्नियो प्लेटफॉर्म को अपना लिया है और इन्फोसिस ने निया के नाम से अपना संस्करण तैयार किया है। आंतरिक किफायत के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एआई के जरिये भविष्य में आईटी सेवा क्षेत्र को चुनौती मिलना तय है। ठीक उसी तरह जिस तरह हाल के दिनों में सस्ते विदेशी संस्थानों ने सफलता और विफलता तय की। बिना एआई के हमारे पास लागत के आधार पर प्रतिस्पर्धा की वजह नहीं होगी। जहां तक वृद्घि की बात है तो यह भी स्पष्टï है कि उन आईटी सेवा कंपनियों के लिए कारोबारी अवसरों की भरमार होगी जिनके पास एआई को लेकर बेहतर समझ होगी और जो इस संबंध में जरूरी साझेदारियां कर चुके होंगे। एक्सेंचर ने अनुमान लगाया है कि एआई से 400 अरब डॉलर के कारोबारी अनुमान जुड़े हुए हैं। यह ज्यादा हो सकता है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस क्षेत्र में ढेर सारे अवसर हैं। 
 
गार्टनर में हाल ही में एक सर्वेक्षण किया जिसमें 93 फीसदी अधिकारियों ने कहा कि वे एआई तकनीक विकसित करने में तीसरे पक्ष की मदद लेंगे। क्लाउड तकनीक के तर्ज पर हमें अब एआई के इर्दगिर्द सर्विस लाइन विकसित होती नजर आएंगी। इसके साथ ही कारोबार के नए अवसर सामने आएंगे। सूचना प्रौद्योगिकी सेवा क्षेत्र पर ए आई का प्रभाव निरंतर बढ़ेगा और इसके तमाम असर देखने को मिलेंगे। एआई के आगमन के साथ ही अधिक कौशल की मांग वाली महंगी सेवाओं का दायरा भी बढ़ेगा। इसमें सलाहकार सेवा और विशिष्टï विकास शामिल हैं। इससे अधिक जिंसीकृत सेवाओं की मांग में कमी आएगी जिनको मशीनें आसानी से अंजाम दे सकेंगी। इस मामले में सफलता का निर्माण सलाह देने के कौशल, बोर्ड की गुणवत्ता और तकनीक तथा एआई साझेदारी को लेकर विकसित रिश्तों और समझ पर निर्भर करेगी। कर्मचारियों को नए सिरे से कौशल संपन्न बनाना और उच्च कौशल वाली प्रतिभा को आकर्षित करना अहम होगा। 
 
आमतौर पर यह माना जाता है कि प्रमुख भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों ने डिजिटल लहर की सवारी करने में देर कर दी। उनको अब प्रतिस्पर्धी लाभ से जुड़े बदलाव का सामना करना पड़ रहा है। अब बकि प्रतिस्पर्धी बदलाव दूर हो चला है और कम लागत वाले मानव संसाधन के बजाय नई प्रौद्योगिकी अपनाई जा रही है तो भारतीय कारोबारी इस बदलाव को अपनाने में काफी शिथिल रहे हैं। एआई के मामले में भी ऐसा ही होता नजर आ रहा है। भारतीय कंपनियों को अपना निवेश बढ़ाना होगा, उनको अपनी समझ बढ़ानी होगी और नई तकनीक का इस्तेमाल करना होगा। हम भी भी एआई प्रौद्योगिकी अपनाने के मामले में एकदम शुरुआती स्तर पर हैं। अभी भी हमें इस दिशा में काफी कुछ करना है। बहरहाल भारतीय कंपनियों को इस क्षेत्र में अपना निवेश बढ़ाना होगा। कंपनियों को मुनाफे के गणित में नहीं उलझना चाहिए। उनको आगे बढ़कर निवेश करने की आवश्यकता पड़ सकती है। उनको इसका फायदा बाद में मिलेगा। कंपनियों को चाहिए कि वे अपना अंशधारक आधार बढ़ाएं जो इस जरूरत को समझे और उनकी मदद करे। 
Keyword: india, company, कृत्रिम बुद्घिमता,
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