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अनुचित आशावाद

संपादकीय /  July 31, 2017

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिय़ा ने गत सप्ताह कहा कि देश 8 फीसदी की वृद्घि दर की राह पर है और वर्ष 2017-18 के दौरान ही वह 7.5 फीसदी की दर हासिल कर सकता है। उन्होंने माना कि रोजगार सृजन एक चुनौती बना हुआ है लेकिन इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही आते-आते अर्थव्यवस्था 8 फीसदी की वृद्घि दर छूने लगेगी। यह आकलन जरूरत से ज्यादा आशावादी नजर आता है क्योंकि हालिया अतीत में हमारी अर्थव्यवस्था को एक के बाद एक कई झटके लगे हैं।

 
कृषि पर पड़े प्रभाव की बात करें तो वर्ष 2016-17 की दूसरी छमाही में वृद्घि के आंकड़े पहले की तुलना में बेहतर थे क्योंकि कृषि क्षेत्र का उत्पादन काफी बेहतर रहा। ऐसा लगातार दो वर्ष सूखा पडऩे के बाद हुआ था। इस वर्ष भी मॉनसून के कुलमिलाकर सामान्य ही रहने का अनुमान जताया जा रहा है। हालांकि क्षेत्रीय आधार पर इसमें अंतर देखने को मिल सकता है और इसका असर कृषि उत्पादन पर भी पड़ सकता है। हालांकि इस बारे में अभी कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन यह बात ध्यान देने वाली है कि उच्च आधार प्रभाव का तात्पर्य यह होगा कि सालाना आधार पर वृद्घि के आंकड़े ऐसे नहीं होंगे जैसे कि बीते कुछ सालों के दौरान रहे। 
 
अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की स्थिति को परखना भी आवश्यक है। अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र की बात करें तो वह निवेश की कमी से अभी भी जूझ रहा है। इस क्षेत्र ने लगातार वृद्घि हासिल की है बल्कि कुछ तिमाहियों में तो यह वृद्घि उल्लेखनीय ढंग से बेहतर रही है। ऐसा मुख्य तौर पर लागत कटौती और मूल्य वर्धन के प्रभावस्वरूप हुआ है। परंतु निवेश में तेजी के अभाव में औद्योगिक वृद्घि में निरंतर स्थायित्व की उम्मीद ठीक नहीं। यह बात जून 2017 के आठ प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों के वृद्घि संबंधी आंकड़ों से समझी जा सकती है। सोमवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें सालाना आधार पर 0.4 फीसदी की वृद्घि देखी गई। 
 
देश का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) अस्थिर रहा है। पिछले महीने इन आंकड़ों में महज 1.7 फीसदी की वृद्घि देखने को मिली थी। इसे मजबूत सुधार का संकेत तो नहीं माना जा सकता। आईआईपी को उच्च आवृत्ति वाले संकेतक के रूप में इस्तेमाल करने को लेकर चाहे जो विचार हो लेकिन तथ्य यही है कि यह काफी समय से निम्र स्तर पर बना हुआ है। खासतौर पर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं और पूंजीगत वस्तुओं से जुड़े सूचकांक की बात करें तो ऐसा ही है। इससे तो यही संकेत मिलता है कि हमारा औद्योगिक क्षेत्र विकास का वाहक बनने के मामले में संघर्षरत ही रहेगा। 
 
जहां तक सेवा क्षेत्र की बात है तो अब तक यह स्पष्टï नहीं है कि नोटबंदी के झटके से उबर रही अर्थव्यवस्था मध्यम अवधि में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर क्या प्रतिक्रिया देगी। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि लंबी अवधि में जीएसटी वृद्घि के लिए सकारात्मक साबित होगा लेकिन कुछ ही लोगों को उम्मीद है कि यह बदलाव बिना किसी खास कीमत के आएगा। यह कीमत आने वाली तिमाहियों में वृद्घि के आंकड़ों में भी नजर आ सकती है। अर्थव्यवस्था की जटिलता को देखते हुए और जीएसटी के लिए जरूरी गहरे बदलाव के असर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसके अल्पकालिक या मध्यम अवधि के असर को लेकर कोई भी अनुमान लगाना ठीक नहीं है। खासतौर पर सेवा क्षेत्र पर इसके असर की बात करें तो वहां असंगठित काम ज्यादा है। जाहिर है इसके भी वृद्घि का वाहक होने की संभावना कम ही है। ऐसे में कम से कम फिलहाल 8 फीसदी की वृद्घि दर का अनुमान उचित नहीं प्रतीत होता।
Keyword: niti aayog, नीति आयोग अरविंद पानगडिय़ा,
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