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दिवालिया प्रक्रिया नहीं बननी चाहिए पहला विकल्प

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  July 30, 2017

उच्चतम न्यायालय ने एक लेनदार और कर्ज लेने वाली कंपनी के बीच विवाद को समझौते से हल करने को मंजूरी दे दी है। यह समझौता दिवालिया कानून के तहत शुरू की गई इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को निरस्त करते हुए संपन्न हुआ। दोनों पक्षों ने समझौते की शर्तों पर सहमति जताई। उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इस समझौते को मंजूरी दी। यह एक महत्त्वपूर्ण घटना है और करीब नौ महीने पहले लागू हुए नए दिवालिया कानून में निहित कुछ मुद्दों पर ध्यान दिलाने की जरूरत को भी बयां करती है।

 
पहला, दिवालिया प्रक्रिया हजारों करोड़ रुपये का कर्ज देने वाले ऋणदाताओं को एक कर्जदार की बराबरी में ला खड़ा करती है। इस कानून के तहत एक लाख रुपये से थोड़ा भी अधिक बकाया होने पर एक कार्यकारी कर्जदाता को विवाद निपटान प्रक्रिया शुरू करने का हक मिल जाता है। राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) केवल सीमित आधार पर ही यह प्रक्रिया शुरू करने से इनकार कर सकता है। दिवालिया कानून के तहत केवल बकाया राशि पर ही विवाद समाधान प्रक्रिया शुरू हो सकती है। 
 
दूसरा, एक बार विवाद समाधान प्रक्रिया शुरू होते ही कर्ज की अदायगी पर रोक लग जाती है। ऐसी स्थिति में किसी भी कर्जदार कंपनी को कर्ज की रकम चुकाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। 'दिवालिया संरक्षण' के तहत भले ही यह सामान्य बात लगे लेकिन यह वास्तव में दिवालिया हो चुकी कंपनियों के लिए ही फायदेमंद है। ऐसी कंपनियां जो कर्ज चुकाने में सक्षम हैं लेकिन किसी वजह से कर्ज भुगतान को लेकर विवाद है, उनके लिए तो यह प्रावधान एक तरह से अछूत बनाने का ही काम करता है। अगर आप अपने वित्तीय वादों पर खरा नहीं उतरते हैं तो कोई भी आपके साथ लेनदेन नहीं करेगा। यह दिवालिया प्रक्रिया को बेहद सतर्कता से लागू किए जाने के लिए और भी वाजिब वजह है। राष्ट्रीय कंपनी कानून अपील अधिकरण के हालिया फैसले से पहले तक एनसीएलटी के विभिन्न पीठों का यह रुख था कि वास्तविक कानूनी प्रक्रिया शुरू नहीं होने तक कार्यकारी ऋणदाता के किसी भी दावे को विवादित नहीं माना जाएगा। 
 
तीसरा, दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने पर न केवल ऋण स्थगन हो जाएगा बल्कि कंपनी के निदेशक मंडल की समस्त शक्तियां एक 'अंतरिम समाधान पेशेवर' के भीतर समाहित हो जाएंगी। कर्ज चुका पाने में अक्षम हो चुकी किसी कंपनी के अंशधारकों के हितों की रक्षा के लिए यह काफी बढिय़ा प्रावधान है। लेकिन कर्ज चुका पाने में सक्षम कंपनी के लिए यह निश्चित रूप से नुकसानदायक साबित होगा। इस तरह की कंपनियों को विवाद समाधान प्रक्रिया शुरू करने की धमकी भी दी जा सकती है। इसलिए यह प्रक्रिया शुरू करने की धमकी से ही जबरन वसूली की स्थिति बन सकती है जो कंपनी के साथ दीर्घावधि रिश्तों की चाहत रखने वाले अन्य ऋणदाताओं को चोट पहुंचा सकता है।
 
यही वजह है कि एचडीएफसी बैंक के प्रबंध निदेशक आदित्य पुरी ने यह बयान दिया है कि अगर कर्जदार जानबूझकर कर्ज भुगतान से चूक नहीं करता है तो इनसॉल्वेंसी अदालतों की शरण लेना सबसे अच्छा विकल्प नहीं है। कोई भी वस्तु एवं सेवा प्रदाता अगर दिवालिया प्रक्रिया का सबसे पहले सहारा लेता है तो उसकी काबिलियत संदेह के घेरे में आ जाएगी। कर्ज अदायगी पर तत्काल रोक लगने की चोट कार्यकारी ऋणदाताओं के साथ ही वित्तीय लेनदारों को भी लगेगी और वे अपना बकाया भी नहीं  वसूल पाएंगे।
 
ऋण स्थगन के दौरान काम संभालने वाली लेनदारों की समिति में ऐसे ऋणदाता भी शामिल हो सकते हैं जो उस कंपनी से लंबे समय तक अपने रिश्ते चाहते हों, लिहाजा ऐसी चाहत नहीं रखने वाले इकलौते ऋणदाता की आवाज को दबाया जा सकता है। इस तरह एक आक्रामक कार्यकारी ऋणदाता या एक असंतुष्ट वित्तीय ऋणदाता की धमकी के आगे घुटने नहीं टेकता है और अपनी मांग पर अड़ा रहता है तो विवाद निपटान प्रक्रिया शुरू करने की पूरी कवायद का ही कोई मायने नहीं रह जाएगा। वैसे यह महज एक सैद्धांतिक धारणा है, न कि व्यावहारिक। एक बार कर्ज अदायगी का वादा पूरा करने से चूक जाने वाली कंपनी के तौर पर सारी दुनिया को पता चल जाने के बाद उस कंपनी के बारे में धारणा एक बुरे कर्जदार के रूप में ही बन जाएगी और उसकी साख को बहाल कर पाना आसान नहीं होगा। 
 
इस तरह कानून में दिवालिया प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद उसे रोक नहीं पाने का प्रावधान काफी सख्त है। अगर इस कानून का इस्तेमाल विवाद निपटान के पहले उपाय के तौर पर किया जाता है तो नुकसान और भी अधिक होगा। उच्चतम न्यायालय जब पूरा न्याय करने के लिए अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करता है और समाधान प्रक्रिया शुरू कर चुके लेनदार और कर्ज अदायगी पर रोक लगवा चुके कर्जदार के बीच समझौते को मंजूरी देता है तो इसकी वजह यह है कि यह प्रक्रिया वाकई में अन्यायपूर्ण है। इस कानून के क्रियान्वयन से अनपेक्षित नतीजे आ सकते हैं। 
 
दिवालिया कानून को असरदार बनाने के लिए बेहतर होता कि पहले दिवालिया प्रक्रिया में शामिल होने वाले पेशेवरों को तैयार किया जाता और फिर उन पर पूरे समाज के कॉर्पोरेट ऋण से निपटने का भारी बोझ डाला जाता। निजी कंपनियों के कर्ज की वसूली का बड़ा बोझ प्रवर्तन मशीनरी पर डाला जा सकता था और इस कानून के दायरे में केवल गंभीर वित्तीय ऋण ही रखा जाना चाहिए था। उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप की शक्ति का इस्तेमाल कर यह जता दिया है कि दिवालिया कानून को असरदार बनाने के लिए तत्काल विचार करने और मामूली बदलाव करने का वक्त आ गया है। 
 
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता और स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: defaulter, company, court,,
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