बिजनेस स्टैंडर्ड - विश्व व्यवस्था और चीनी आधिपत्य
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विश्व व्यवस्था और चीनी आधिपत्य

दीपक लाल /  July 30, 2017

चीन के नेतागण स्टालिन से लेकर हिटलर तक की नकल करते रहे हैं। ऐसे में अमेरिका और अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए उसका मुकाबला करने का वक्त आ गया है। बता रहे हैं दीपक लाल

 
सितंबर 2008 के अंत में पेइचिंग में प्रवास के दौरान मुझे चीन के कुछ उदारवादी एवं लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं से रात्रिभोज में शामिल होने का निमंत्रण मिला था। आमंत्रित अतिथियों में लियू श्याओबो भी शामिल थे। लियू के अलावा कुछ अन्य अतिथि भी निगरानी सूची में शामिल थे। उनमें से कुछ लोग तो अपने घरों में नजरबंद भी रखे जा चुके थे और लियू जैसे कुछ लोग हिरासत में भी रह चुके थे। इसके बावजूद रात्रिभोज में शामिल सभी लोग काफी खुश नजर आ रहे थे और लियू तो सबसे अधिक प्रसन्न थे। उन लोगों का मानना था कि थ्येन आन मन कांड के बाद लोकतंत्र समर्थकों पर हो रहे दमन से मिली फौरी राहत के बीच चीनी साम्यवादी पार्टी से आंशिक लोकतांत्रिक सुधारों की दिशा में आगे बढऩे की उम्मीद की जा सकती है। उस समय लियू चेक गणराज्य के असंतुष्ट नेता वासलाव हेवल की तर्ज पर एक घोषणापत्र (चार्टर) बनाने में लगे हुए थे जिसमें संवैधानिक सुधारों और बहुदलीय लोकतंत्र की व्यवस्था लागू करने का जिक्र था। उस समय मैंने उन लोगों से असहमति जताते हुए कहा था कि चीनी साम्यवादी पार्टी की सोच में बदलाव होना संदिग्ध है। 
 
लियू ने उस रात्रिभोज के दौरान अपना लोकतांत्रिक चार्टर पेश किया जिस पर सैकड़ों बुद्धिजीवियों के हस्ताक्षर भी थे। उसके कुछ दिनों बाद ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और सत्ता पलटने की कोशिश के आरोप में 11 साल के कारावास की सजी सुनाई गई। हाल ही में लियू की जेल के भीतर ही लीवर कैंसर से मौत हो गई है। खुद लियू और जी-20 सम्मेलन में शामिल वैश्विक नेताओं की अपील के बावजूद उन्हें इलाज के लिए विदेश नहीं भेजा गया। आनन-फानन में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया और उनकी अस्थियों को समंदर में प्रवाहित कर दिया गया। पश्चिमी देशों के नेताओं ने लियू के निधन पर शोक एवं संवेदना तो जताई लेकिन चीन के साम्यवादी शासन की आलोचना नहीं की। इस भीरूता की वजह वह नजरिया है जिसके मुताबिक चीन के साथ आर्थिक एवं वाणिज्यिक संबंध काफी मूल्यवान हैं और उन पर मानवाधिकार की चिंताओं से कोई फर्क नहीं पडऩा चाहिए। गॉर्डन जी चांग ने अपने लेख 'अ चाइना पॉलिसी दैट वक्र्स फॉर अमेरिका' (स्ट्रेटजिक,17 मई 2017) में कहा है कि चीन के खराब एवं खतरनाक व्यवहार के बावजूद अमेरिका का उससे करीबी संबंध बनाए रखना असल में प्रतिकूल प्रोत्साहन का काम करता है। चांग के मुताबिक 'चीन को लगता है कि जब अमेरिका को कोई फर्क ही नहीं पड़ता है तो उसे अपना लड़ाकू अंदाज छोडऩे की कोई जरूरत नहीं है।'
 
हालांकि चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के 'चाइना ड्रीम' संबंधी ऐलान को देखते हुए लोगों को नई विश्व व्यवस्था के बारे में चीनी परिकल्पना पर अपनी राय बदल लेनी चाहिए। शी के इस सपने की आधिकारिक व्याख्या 'चीन राष्ट्र के महान कायाकल्प'  के तौर पर की गई है। जमील एंदरलिनी ने फाइनैंशियल टाइम्स में प्रकाशित अपने लेख में चीनी श्रेष्ठता के इस स्वप्न के स्याह पक्ष का जिक्र किया है। एंदरलिनी के मुताबिक शी ने अपने भाषण में जिस चीनी शब्दावली का जिक्र किया है उसका सटीक अनुवाद 'चीनी नस्ल' होगा। चीनी भाषा में 'झान्गहुआ मिन्जु' शब्द  का सामान्य अर्थ हान नस्लीय समूह से है जिसकी चीन की आबादी में करीब 90 फीसदी हिस्सेदारी है। एंदरलिनी कहते हैं, 'इस अवधारणा में चीनी रक्त संबंध रखने वाले सभी लोगों को अपने साथ जोडऩे की सोच भी शामिल है, भले ही उनके पूर्वजों ने कितने भी साल पहले चीन की जमीन क्यों न छोड़ दी हो?' चीन के प्रधानमंत्री ली कछ्यांग ने भी कहा है कि साम्यवादी पार्टी के प्रति अपनी धारणाओं और अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के बावजूद चीनी प्रवासियों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे चीन के विकास, तकनीकी प्रगति और निवेश संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार बनें। चीनी सिद्धांतकारों का मानना है कि संप्रभु राष्ट्र-राज्य की अवधारणा दरअसल पश्चिमी देशों की एक गैरकानूनी खोज है। विश्व व्यवस्था के बारे में चीन की परंपरागत धारणा तो यह रही है कि केंद्र में चीन का सम्राट हो और पुराने सत्ता केंद्र 'फॉरबिडन सिटी' से ही दुनिया के हरेक कोने तक उसका विस्तार हो। एंदरलिनी इस चीनी विश्व व्यवस्था के तहत चीनी नस्ल के विस्तृत परिवार में शामिल नहीं रहे लोगों की स्थिति को लेकर भी एक निष्कर्ष निकालते हैं।
 
यह एक नस्ल पर आधारित फासीवादी विश्व व्यवस्था है। फ्रांसीसी इतिहासकार फ्रांस्वा फुरेत का मानना है कि साम्यवाद और फासीवाद के बीच आलंकारिक अंतर दिखने के बावजूद दोनों में काफी नजदीकी वैचारिक संबंध हैं ('द पासिंग ऑफ एन इल्यूजन')। फ्रांसीसी क्रांति से बुर्जुआ वर्ग के सशक्त होने से लोकतंत्र और व्यक्तिवादी पूंजीवाद का जन्म हुआ लेकिन फासीवाद और साम्यवाद दोनों ही विचारधाराओं में बुर्जुआ समूह खासकर बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति घृणा का समान भाव पाया जाता है। ऐसे में कोई अचरज नहीं है कि चीनी साम्यवाद ने नस्ल-आधारित फासीवादी रूप अपना लिया। लेकिन इसी के साथ वे परंपरागत राजनीतिक स्वरूप का दावा भी करते हैं। सवाल यह है कि अमेरिका केंद्रित उदारवादी विश्व व्यवस्था चीनी साम्यवादी शासन की तरफ से पेश इस खतरे का कैसे मुकाबला करेगी?  
 
पहली बात तो यह है कि आपको इस खतरे की पहचान करनी होगी। आश्चर्यजनक रूप से राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने पूर्ववर्तियों के उलट ऐसा काम किया है। ट्रंप का आर्थिक राष्ट्रवाद असल में चीन पर ही केंद्रित है। उन्होंने रूस को साधने के एक औजार के तौर पर अमेरिका-चीन संबंध को देखने से इनकार कर दिया है। माओत्से तुंग के समय रिचर्ड निक्सन ने जब चीन की यात्रा की थी तो उसका आधार यही था। लेकिन ट्रंप नहीं मानते हैं कि अमेरिका को सबसे अधिक भू-राजनीतिक खतरा रूस से है। इसके अलावा 'ट्रंप वन चाइना नीति पर सवाल खड़े करने को तैयार दिखते हैं, उत्तर कोरिया को साधने के लिए चीन पर दबाव डालते हैं, सीरिया के खिलाफ सैन्य ताकत के इस्तेमाल का चतुराई भरा फैसला करते हैं जिससे चीन और अमेरिका में अब मुकाबला जीतने के लिए कोई भी तरीका अपनाने का भाव नजर आने लगा है' (माइल्स माओचन यू, स्ट्रेटजिक)।  हालांकि ट्रंप को चीन के प्रति नरम रुख रखने वाली नौकरशाही से प्रतिरोध का भी सामना करना होगा। इसके अलावा 'चाइना इंक' का निर्माण करने वाले शेयर बाजार वॉल स्ट्रीट के निहित स्वार्थ भी इसमें बाधा डालेंगे। वॉल स्ट्रीट के अगुआ गोल्डमैन सैक्स के कई पूर्व कर्मचारी ट्रंप प्रशासन में शामिल हैं।
 
विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने जब चीन के प्रति अमेरिकी नीति के 'संघर्ष को टालने वाले, आपसी सम्मान और पारस्परिक सहयोग' पर आधारित होने की बात कही तो वह काफी हद तक एशिया के बारे में चीन के नजरिये से साम्यता रखने वाला नजर आया। यह निश्चित रूप से अमेरिका के भू-राजनीतिक हितों के खिलाफ है। चांग कहते हैं कि अमेरिका को वास्तविक बात खुलकर कहने की जरूरत है। वह वास्तविकता यह है कि चीन एक दोस्त या साझेदार नहीं रह गया है और बड़ी तेजी से दुश्मन बनता जा रहा है। चीन की विरोधी और अस्वीकार्य गतिविधियों के लिए उस पर दंड लगाया जाना चाहिए। चीन के बैंकों पर उत्तर कोरिया के धन को सफेद करने के आरोप अगर सही पाए जाते हैं तो उन्हें अमेरिकी डॉलर में लेनदेन से रोक दिया जाए। अमेरिका को एशिया में चीन की धमकियों का सामना कर रहे देशों- भारत से लेकर दक्षिण कोरिया का एक गठजोड़ बनाना चाहिए ताकि चीन को नियंत्रित किया जा सके। 
 
मानवाधिकार के मोर्चे पर चीन के खराब रिकॉर्ड को देखते हुए भी उसकी घेराबंदी की जा सकती है। पहला, तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को अमेरिका सरकार व्हाइट हाउस में आमंत्रित करे और तिब्बत की स्वायत्तता की उनकी मांग का समर्थन करे। दूसरा, लियू श्याओबो को मिला नोबेल पुरस्कार ग्रहण करने के लिए उनकी विधवा को पश्चिमी देशों का दौरा करने की इजाजत देने के लिए चीन पर दबाव डाला जाए। चीन के नेता स्टालिन से लेकर हिटलर तक का रूप अख्तियार करते रहे हैं लेकिन अब अमेरिका और अन्य उदारवादी लोकतांत्रिक देशों के लिए चीन को चुनौती देने और अमेरिकी अगुआई वाली उदारवादी विश्व व्यवस्था को बचाकर रखने का वक्त आ गया है।
Keyword: india, china, economy,,
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