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सार्वजनिक सेवा के लिए निजी क्षेत्र की बैसाखी

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  July 27, 2017

जब 1990 के दशक की शुरुआत में नियंत्रित अर्थव्यवस्था का ढांचा तोड़ा जा रहा था तो आम धारणा यही थी कि सरकार और निजी क्षेत्र के बीच जिम्मेदारियां बांटने से देश को लाभ मिलेगा। सरकार कॉर्पोरेट गतिविधियों पर नजर रखने के काम से बच जाएगी और बेहतर स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा एवं आधारभूत ढांचे पर ध्यान केंद्रित कर पाएगी। भारतीय कारोबार जगत भी लाइसेंस राज की बंदिशों के चंगुल से आजाद होने के बाद अधिक नौकरियां पैदा करेगा और अधिक पूंजी का भी सृजन होगा। लेकिन आज सरकार और निजी क्षेत्र की भूमिकाएं अजीबोगरीब रूप से बदल गई हैं। सरकार कंपनी जगत के एक बड़े प्रवर्तक की तरह नजर आती है जबकि निजी क्षेत्र को लोक सेवाओं के निष्पादन की एक बैसाखी के तौर पर देखा जा रहा है। भले ही यह ढांचागत परियोजनाओं के लिए अपनाई गई सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) की अब लगभग निष्क्रिय हो चुकी धारणा हो, कॉर्पोरेट क्षेत्र की सामाजिक जवाबदेही (सीएसआर) की सोच हो, शिक्षा का अधिकार कानून के तहत निजी क्षेत्र के स्कूलों में गरीब परिवारों के बच्चों को आरक्षण देना हो या हाल ही में नीति आयोग का ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल में निजी कंपनियों को जोडऩे के लिए पेश किया गया खाका हो, अभी तक सरकार का कार्यक्षेत्र माने जा रहे कार्यों में भी निजी भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है।

 
हालांकि इस विश्वास का परिणाम अपेक्षित नहीं रहा है। निजी क्षेत्र को धन के लोभी के रूप में दिखाया जाता है लेकिन प्रकार्यात्मक नीतियों के क्रियान्वयन में सरकार और नौकरशाही की नाकामी भी परिलक्षित होती है। सबसे पहले 2001 में लागू की गई पीपीपी की नीति इन नाकामियों का एक माकूल उदाहरण है। हालांकि यह अवधारणा काफी विवादों के बाद कारगर साबित हुई। हवाईअड्डों के विकास से जुड़ी परियोजनाओं में पीपीपी नीति सफल रही लेकिन अन्य में यह पूरी तरह नाकाम रही। (रेलवे की पहली पीपीपी परियोजना दिल्ली मेट्रो और रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर के बीच हुई थी लेकिन वह भी नाकाम रही)।
 
सड़कों के निर्माण में पीपीपी की अवधारणा से वाजपेयी की महत्त्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना को तेजी मिलने की उम्मीद थी। ट्रैफिक आकलन एवं राजस्व संग्रह के अनुमान संबंधी गलत और अनम्य अनुबंध डिजाइन होने के साथ ही जमीन अधिग्रहण एवं पर्यावरण मंजूरी हासिल करने में देरी से यह अवधारणा नाकाम साबित हुई। निजी निवेशकों ने खुद को कर्ज के बोझ तले दबा हुआ पाया और उनकी कमाई भी नहीं हो रही थी। थक-हारकर सरकार सड़कें बनाने के लिए फिर से जांचे-परखे ईपीसी मॉडल पर लौट आई है। 
 
संप्रग सरकार ने सीएसआर प्रावधान के तहत निजी क्षेत्र की भूमिका का विस्तार किया था। कंपनियों को सीएसआर में संलग्न करने की सोच के पीछे जमीन अधिग्रहण को लेकर हो रहे व्यापक विरोध का खास योगदान रहा था। अधिग्रहण के तहत दिए गए मुआवजा पैकेज को दोषपूर्ण मानने के बजाय तत्कालीन सरकार ने यह समझ लिया कि बड़ी कंपनियों का कामकाज जनहित के प्रतिकूल होने से उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। अगर सरकार जमीन अधिग्रहण के बाद भू-स्वामियों को आजीविका का बंदोबस्त नहीं कर सकी तो कंपनियों को उस कमी को भरने के लिए आगे आना था। कंपनियों को पहले अपने लाभ का एक हिस्सा विकास कार्यों के लिए अलग रखना पड़ता था लेकिन संप्रग सरकार ने तय सीमा से अधिक कारोबार एवं हैसियत वाली कंपनियों के लिए सीएसआर का अनुपालन अनिवार्य कर दिया। सीएसआर पर खरा उतरने के लिए कंपनियों को सरकार के नियंत्रण वाली क्षेत्रों- प्राथमिक शिक्षा, शौचालय और अस्पतालों में निवेश करना होता है। इस प्रावधान ने कंपनियों को प्रचार के जरिये अपनी छवि चमकाने का मौका दिया लेकिन मानव विकास सूचकांक में भारत को करारी चोट पहुंचाई है।
 
शिक्षा में सरकार की तरफ से दी गई जमीन पर बने निजी स्कूलों में गरीब परिवारों के बच्चों को आरक्षण देने की प्रबुद्ध सोच भी उतनी कारगर नहीं साबित हुई है। धनी एवं उच्च मध्य आय वर्ग के स्वाभाविक पूर्वग्रह और बेहतर अनुपालन व्यवस्था का अभाव इसकी वजह है। (अमेरिका में श्वेत समुदाय के स्कूलों में अश्वेत बच्चों को प्रवेश देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन के लिए राष्ट्रपति आइजनहावर ने सुरक्षाकर्मियों को भी लगाया था।) चमक-दमक वाले निजी अस्पताल भी सरकार से रियायती दरों पर जमीन लेते हैं लेकिन निम्न आय वाले बीमारों के लिए बिस्तर आरक्षित करने से किसी-न-किसी बहाने से मना कर देते हैं। इस तरह के रिकॉर्ड के बावजूद नीति आयोग ने यह सुझाव दिया है कि जिला अस्पतालों को निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को लीज पर दे देना चाहिए। इसके एवज में कुछ सरकारी फंड मिल जाएगा। 
 
इन तमाम प्रयोगों के नाकाम होने की मुख्य वजह यह रही कि उनमें लाभ कमाने के मकसद से ही बने संगठनों से गैर-वाणिज्यिक सामाजिक दायित्व पूरा करने की उम्मीद की जाती है। ये कंपनियां इस तथ्य को झुठला नहीं सकती हैं कि 1991 के बाद आई सभी सरकारों ने नागरिकों के प्रति अपने मूलभूत दायित्वों के निर्वहन में कोताही बरती है। स्वास्थ्य एवं शिक्षा के मद में लगातार कम खर्च करना खुद ही सारी कहानी बयां कर देता है। विश्व बैंक के आंकड़े खुद इसकी तस्दीक करते हैं। हालांकि यह साफ नहीं है कि इसमें केंद्र एवं राज्य दोनों के आंकड़े शामिल हैं। स्वास्थ्य के मद में खर्च जीडीपी के 1.05 फीसदी (1995) से मामूली बढ़त के साथ 1.4 फीसदी (2014) पर पहुंचा है। वहीं शिक्षा के मामले 1997 में 4.3 फीसदी खर्च हो रहा था जो 2013 में घटकर 3.8 फीसदी पर पहुंच गया। यह प्रवृत्ति उसके बाद भी नहीं बदली है। देश की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर चीन को चुनौती देेने में लगा भारत स्वास्थ्य एवं शिक्षा सूचकांकों के मामले में सहारा क्षेत्र के देशों की ही कतार में खड़ा दिखता है।
Keyword: india, economy, PPP,,
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