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वित्तीय बाजार नीति पर हो समुचित विचार

अजय शाह /  July 27, 2017

वित्तीय बाजार कारोबार के अन्य हिस्सों की सफलता के लिए शेयर बाजार की मशीनरी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

 
बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने हाल ही में इक्विटी डेरिवेटिव बाजारों की कार्यशैली पर एक परिचर्चा पत्र जारी किया है। यह परिचर्चा पत्र आलोचकों के विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। इक्विटी बाजार अपने आधुनिक अवतार में सन 2000-2001 में सामने आया और इसने मोटे तौर पर अच्छा काम किया है। लेकिन सेबी के परिचर्चा पत्र में जिन चिंताओं को समेटा गया है, उन पर कई बार बहस हो चुकी है और उनको खारिज किया जाता रहा है। वित्तीय बाजारों से संबंधित नीति को उच्च तरलता हासिल करने पर जोर देना चाहिए। इसके अलावा उसे पूंजी जुटाने पर काम करना चाहिए और वैश्विक बाजारों में भारत की घटी हिस्सेदारी की समस्या को हल करने की दिशा में काम होना चाहिए। इस परिचर्चा पत्र के विचार निम्रलिखित लक्ष्यों को नुकसान पहुंचाते हैं।
 
अनुभवी प्रतिभागियों का समूह
 
उपभोक्ताओं के प्रति पारदर्शिता अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। इसके अलावा वित्तीय बाजार प्रतिभागियों की सहभागिता के बिना वित्तीय बाजारों में नकदी की स्थिति सहज बनाना संभव नहीं होता है। अगर साफगोई की कमी नजर आती है तो कहीं न कहीं इसका असर बाजार में नकदी की स्थिति पर भी पड़ेगा। इक्विटी स्पॉट और डेरिवेटिव बाजार में व्यक्तिगत स्तर पर निवेशकों की भागीदारी लंबे समय से संवेदनशील मसला रहा है। हम चाहते हैं कि व्यक्तिगत निवेशक मुनाफा कमाएं लेकिन नुकसान से बचे रहें। हम चाहते हैं कि ऐसे लोग आईपीओ बाजार में हों लेकिन जब पहली सूचीबद्धता के बाद द्वितीयक बाजार की कीमत में कमी आती है तो हम नाखुश हो जाते हैं। यह अवधारणा ही सही नहीं है। इक्विटी निवेश परिसंपत्ति वर्ग में सर्वश्रेष्ठ है लेकिन इसके साथ तमाम जोखिम भी जुड़े हुए हैं। 
 
देश में उपभोक्ता संरक्षण की समस्याओं को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है: पहली वे जो कानून से इतर हैं मसलन पोंजी योजना, डब्बा कारोबार, एनएसईएल आदि और दूसरी वे जो कानून में दायरे में हैं यानी बीमा योजनाएं आदि। बाद वाली स्थिति की बात करें तो समस्या का एक अहम घटक है लंबी देरी। खरीद के निर्णय और अंतिम निष्कर्ष के बीच कई बार दशकों का समय लग जाता है। वित्तीय बाजार कारोबार में ऐसी कोई देरी नहीं होती। जब कभी खराब निर्णय होते हैं तो नुकसान एक या दो दिन में ही सामने आ जाता है। वित्तीय बाजार में शामिल सभी लोग गलतियां करते हैं, वे तत्काल प्रतिपुष्टिï हासिल करते हैं और फिर अपनी गलती सुधार लेते हैं। इससे उपभोक्ता संरक्षण से जुड़ी समस्याएं कम करने में मदद मिलती है। 
 
देश में निवेशकों के व्यवहार पर किया गया शोध बताता है कि इस संबंध में सीखने की प्रक्रिया लगातार चल रही है। जब भी लोग वित्तीय बाजार में पहली बार कारोबार के लिए आते हैं वे तमाम गलतियां करते हैं लेकिन समय के साथ उनमें सुधार होता है। समय बीतने के साथ ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है जिन्होंने गलतियों से सबक सीखे हैं। सन 1990 के दशक के आखिर में और सन 2000 के दशक के आरंभ में इक्विटी बाजार से संबंधित नीतिगत निर्णय लेना कठिन था। उस वक्त स्तरीय वित्तीय बाजार प्रतिभागियों की तादाद कम थी। सेबी, एनएसई और वित्त मंत्रालय के नीति निर्माताओं ने कहा कि हमें इस सीखने की प्रक्रिया के साथ ही इस राह पर आगे बढऩा चाहिए। वर्ष 2000 से ही इस दिशा में परिपक्वता की प्रक्रिया आरंभ है। हर वर्ष नए प्रतिभागी शामिल होते हैं लेकिन बाजार में  अधिकांश प्रतिभागी पुराने और अनुभवी हैं। हर नए प्रतिभागी का सामना कुछ अनुभवी लोगों से होता है। भारतीय वित्तीय बाजारों में डेरिवेटिव कारोबार की जानकारी पाने की तयशुदा लागत बाकायदा चुकाई गई है। 
 
उपभोक्ता संरक्षण संबंधी अवधारणाएं और प्रमाण 
 
सेबी के मसौदे के कई तत्त्वों में सूचना और तर्क के मोर्चे पर कमजोरी है। इसमें भारतीय वित्तीय बाजारों के आलोचकों का नजरिया जाहिर किया गया है लेकिन यह नहीं दिखाया गया है कि समस्या है और उसमें हस्तक्षेप की गुंजाइश भी है। उपभोक्ता संरक्षण की बात करें तो इस पर भारतीय नीतिगत विचार व्यवस्था की उत्कृष्टïता वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) के काम में नजर आती है। एफएसएलआरसी में उपभोक्ता संरक्षण के लिए आर्थिक सिद्घांतों और विधायी बुनियाद पर पूरा विचार किया गया। जब व्यक्तिगत स्तर पर और वित्तीय बाजारों को लेकर प्रश्न उठते हैं तो प्रमाणों का व्यवस्थित इस्तेमाल और तार्किक निष्कर्ष इसी ढांचे के इस्तेमाल में निहित होता है। 
 
नीतिगत विचार के लिए गहन शोध और प्रमाण की आवश्यकता होती है। सन 2000 के बाद से व्यक्तिगत निवेशकों से जुड़े अुनभव ब्रोकरेज फर्मों के रिकॉर्ड और एनएसडीएल, सीडीएसएल के रिकॉर्ड से समझे जा सकते हैं। अब वित्तीय बाजार शोध की एक अहम संस्था अस्तित्व में है और काफी कुछ किया जाना बाकी है। इन सवालों को लेकर मजबूत विचार की सही राह एफएसएलआरसी के बौद्घिक ढांचे को इन प्रमाणों के साथ संलग्न करने में निहित है। सेबी के मसौदा पत्र में इन दोनों का अभाव है। 
 
वित्तीय बाजार नीति का उद्देश्य
 
वित्तीय बाजार नीति का लक्ष्य है प्रभावी और नकदी संपन्न वित्तीय बाजार सुनिश्चित करना। बाजार में नकदी के आगमन से कारोबार की लागत में कमी आती है। बाजार के प्रभावी होने से सभी खरीदारों और विक्रेताओं के लिए मूल्य बेहतर होते हैं। नकदी की बेहतर स्थिति होने का असर नीचे तक होना चाहिए ताकि अधिक से अधिक संख्या में फर्मों को पूंजी की कम लागत का लाभ मिल सके। 
 
इससे प्राथमिक बाजार मजबूत होगा क्योंकि छोटी कंपनियां गैर सूचीबद्घ से सूचीबद्घ दर्जे में आएंगी। भारतीय वित्तीय बाजारों के माहौल में लेनदेन की लागत सिंगापुर अथवा लंदन की तुलना में कम होनी चाहिए। तभी वैश्विक परिदृश्य में हमारी बाजार हिस्सेदारी मजबूत होगी। सेबी के मसौदा पत्र की विचार प्रक्रिया के अधीन तो यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सकेगा। वित्त मंत्रालय, सेबी और एनएसई ने सन 1990 और 2000 के दशक के आरंभ में सबसे बड़े आर्थिक सुधारों को अंजाम दिया। इसमें शेयर बाजार सुधार शामिल थे। देश की वित्तीय बाजार व्यवस्था में सुधार लाने में इसकी अहम भूमिका है। इक्विटी बाजार की मशीनरी का इस्तेमाल वित्तीय बाजार कारोबार के अन्य हिस्सों के बारे में भी किया जा सकता है। वित्तीय फर्मों को लेकर एक नियमित ढांचा, विनिमय और नियमन अब इक्विटी, कॉर्पोरेट बॉन्ड, सरकारी बॉन्ड, जिंस और मुद्रा पर भी  लागू होता है। 
 
देश के वित्त क्षेत्र के अन्य हिस्से का प्रदर्शन खासा कमजोर रहा है। बैंकिंग संकट से हम सब वाकिफ हैं। बीमा क्षेत्र भी संघर्षरत रहा है। पेंशन का अधिकांश हिस्सा ईपीएफओ पर है जिसमें कोई बदलाव नहीं आया है। देश के वित्त जगत का अधिकांश हिस्सा लडख़ड़ाया हुआ है जबकि संगठित वित्तीय बाजार के कारोबार में प्रगति हुई है। इसमें शेयर बाजारों की अहम भूमिका है। अहम बात यह है कि बुनियादी बातों को तवज्जो दी जाए और यह चिह्निïत किया जाए वित्तीय बाजार सुधार का लक्ष्य क्या है और हमारे यहां ऐसे बाजारों की जरूरत क्या है। इस आधार पर दीर्घावधि की नीति तैयार की जानी चाहिए। 
Keyword: india, वित्तीय बाजार कारोबार,
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