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प्रत्यक्ष कर के दायरे में कैसे हो इजाफा

जैमिनी भगवती /  July 26, 2017

नोटबंदी और जीएसटी के क्रियान्वयन के बाद प्रत्यक्ष कर का दायरा बढ़ाने के बारे में अभी भी अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं जैमिनी भगवती 

 
एक जुलाई से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने का निर्णय देश में अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को एकीकृत करने की दिशा में अहम कदम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 जुलाई को संसद में अपने भाषण में कहा था कि जीएसटी के आगमन से अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को भ्रष्टïाचार मुक्त बनाने में मदद मिलेगी। तमाम विशेषज्ञों ने जीएसटी की बदौलत बढ़ती पारदर्शिता और जीएसटी दरों की विविधता के चलते उत्पन्न कठिनाइयों के बावजूद हमारे एकीकृत बाजार की ओर बढऩे पर सकारात्मक टिप्पणी की। परंतु प्रत्यक्ष कर आधार को लेकर कोई खास टिप्पणी देखने को नहीं मिली। ऐसा शायद इसलिए हुआ होगा क्योंकि हमारे राजस्व और प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और व्यक्तिगत लाभ को ध्यान में रखने वाला समृद्घ तबका इसे लेकर सहज नहीं रहा होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने सनदी लेखाकार दिवस पर दिए भाषण में कहा कि देश में 8 लाख चिकित्सक हैं, हमारे यहां दो करोड़ से अधिक इंजीनियर हैं, करीब 8 लाख लेखाकार हैं और 2.18 करोड़ भारतीय गत वर्ष विदेशों में छुट्टिïयां बिताने गए। बहरहाल महज 32 लाख करदाताओं ने ही 10 लाख रुपये सालाना से अधिक आय घोषित की। यह आंकड़ा हास्यास्पद रूप से कम है। खासतौर पर यह देखते हुए कि प्रधानमंत्री ने कहा कि इनमें तमाम लोग सरकारी और निजी क्षेत्र के वेतनभोगी कर्मचारी हैं। 
 
गत 12 जुलाई को वित्तीय मामलों से संबंधित संसद की स्थायी समिति के कुछ सदस्यों ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की आलोचना की क्योंकि वह नोटबंदी के दौरान जमा नकदी की गिनती नहीं कर सका है। आशंका है कि आरबीआई यह सूचना नहीं दे रहा है क्योंकि जनता के पास मौजूद समस्त नकदी बैंकों में वापस आ चुकी है। लब्बोलुआब यह है कि बेनामी धन वसूली के मामले में नोटबंदी को नाकाम माना जा रहा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 1 फरवरी 2017 को अपने बजट भाषण में कहा था कि नोटबंदी के बाद 1.1 करोड़ बैंक खातों में दो लाख रुपये से लेकर 80 लाख रुपये तक की राशि जमा की गई। जबकि 1.48 अन्य खातों में 80 लाख रुपये से अधिक की राशि डाली गई। इनमें औसत जमा राशि 3.3 करोड़ रुपये थी। इन आंकड़ों से भी यही साबित होता है कि 10 लाख रुपये से अधिक की घोषित आय के मामले में 32 लाख लोगों की तादाद बेहद कम है। 
 
प्रधानमंत्री ने सनदी लेखाकार दिवस पर आयोजित समारोह में नोटबंदी के बारे में कहा कि सरकार ने बैंकों में जमा राशि को लेकर एक विस्तृत व्यवस्था कायम की है जहां 8 नवंबर, 2016 के पहले और बाद में जमा राशि का विस्तृत अध्ययन किया गया है। उन्होंने कहा कि अब तक जो भी अध्ययन हुआ है उससे यही पता लगता है कि 300,000 से अधिक कंपनियां शंका के घेरे में हैं। उन्होंने लेखाकारों से पूछा कि क्या उनको नहीं लगता कि ऐसे लोगों की पहचान की जाए जो खुद लेखाकारों के बीच बैठे हैं और जिन्होंने इन कंपनियों की फर्जीवाड़े में मदद की? उन्होंने कहा कि विभिन्न सनदी लेखाकारों के खिलाफ करीब 1,400 मामले वर्षों से लंबित हैं, क्या यह इस पेशेवर वर्ग के लिए चिंता का विषय नहीं है? ऐसे में जबकि सरकार आयकर वंचना करने वालों और सनदी लेखाकारों की पहचान करने में व्यस्त है, उसे इस बात पर भी निगाह रखनी चाहिए कि राजस्व अधिकारी भी कहीं शोषण की प्रक्रिया में शामिल न हो जाएं। 
 
प्रधानमंत्री का कहना यह था कि सनदी लेखाकार काले धन को सफेद करने वालों की मदद न करें। यह सलाह उचित है। बहरहाल, लगता नहीं कि केवल इतना कहना पर्याप्त होगा। यहां तक कि देश की कुछ जानीमानी बड़ी कंपनियों में से भी कई जानबूझकर अपनी आय के दस्तावेज से छेड़छाड़ करती रही हैं ताकि कम से कम कर चुकाना पड़े। ऐसा बिना लेखाकारों की मिलीभगत के नहीं हो सकता। एक बात यह भी कि अगर भारतीय सनदी लेखाकार संघ जैसी संस्था एक प्रभावी नियामक की भूमिका निभा सकती है तो आखिर भारतीय म्युचुअल फंड महासंघ जैसा संगठन म्युचुअल फंडों का प्रबंधन क्यों नहीं कर सकता है? यह काम भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड के अधीन क्यों है?
 
हाल के महीनों में इस बात के कई प्रमाण मिले हैं कि अचल संपत्ति कारोबार में नकदी का इस्तेमाल खूब हो रहा है। अब यह काम पहले की तुलना में आसान हो गया है क्योंकि बड़े नोट अब 1,000 रुपये के बजाय 2,000 रुपये के मूल्य में आ रहे हैं। यूरोप और अमेरिका में हुए अध्ययन बताते हैं कि उच्च मूल्य वर्ग के नोटों से आर्थिक गतिविधियों में इजाफा नहीं होता है और अक्सर उनका इस्तेमाल कर वंचना में होता है। अगर सरकार कर वंचकों के खिलाफ कदम उठाने को लेकर गंभीर है तो उसे आरबीआई के साथ मिलकर काम करना चाहिए और साथ ही उच्च मूल्य के नोट अगले कुछ साल में चरणबद्घ ढंग से बंद कर दिए जाने चाहिए। दूरदराज इलाकों में नकदीरहित लेनदेन कायम करने के लिए यह आवश्यक है कि इंटरनेट उपलब्ध कराया जा सके। 
 
वित्त मंत्री ने 1 फरवरी को अपने बजट भाषण में बेनामी निर्वाचन बॉन्ड की अवधारणा पेश की। ऐसे बॉन्ड बैंकों द्वारा जारी किए जाएंगे जब राजनीतिक दलों के दानदाता बैंकों में राशि जमा करेंगे। उसके बाद इस राशि को राजनीतिक दलों के खाते में जमा कर दिया जाएगा। पहले की तरह इस राशि की कोई सीमा नहीं होगी। सरकार का कहना है कि ये बॉन्ड यह सुनिश्चित कर देंगे कि केवल वैध और कर पश्चात फंड ही राजनीतिक दलों को दिया जा सके। बहरहाल कंपनी अधिनियम के अनुच्छेद 182 (3) को शिथिल कर दिया गया है ताकि कंपनियों को उन राजनीतिक दलों का नाम न लेना पड़े जिनको दान दिया गया। 
 
एक जून 2017 को यह खबर आई कि भारतीय निर्वाचन आयोग ने औपचारिक तौर पर कानून मंत्रालय को पत्र लिखकर उससे कहा है कि सरकार पुनर्विचार कर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और कंपनी अधिनियम में निर्वाचन बॉन्ड से संबंधित हालिया संशोधनों को बदले। निर्वाचन आयोग ने सुझाव दिया कि इस मामले में यथास्थिति बरकरार की जाए। निर्वाचन आयोग ने कार्मिक, जन निवारण और कानून व्यवस्था संबंधी संसद की स्थायी समिति में यह उचित ही कहा कि निर्वाचन बॉन्ड की व्यवस्था अतीतगामी है क्योंकि इसकी बदौलत पारदर्शिता में कमी आएगी। लब्बोलुआब यह है कि प्रत्यक्ष कर का दायरा बढ़ाने के बारे में अभी अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है। सरकार ने नोटबंदी के बाद जो भी सूचनाएं एकत्रित की हैं उनका उचित इस्तेमाल किया जाए और बेनामी निर्वाचन बॉन्ड की व्यवस्था खत्म की जाए। 
 
(लेखक इक्रियर में आरबीआई के चेयर प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं)
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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