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कैसे बढ़े मिठास?

संपादकीय /  July 26, 2017

केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश को सलाह दी है कि वह गन्ने के लिए राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) की पुरानी व्यवस्था से निजात पाए और उसके स्थान पर रंगराजन समिति (2012) द्वारा सुझाए गए चीनी क्षेत्र के सुधारों को अपनाए। यह सलाह उस समय आई है जब बाजार के हालात इस बदलाव के अनुकूल हैं। दो अन्य बड़े चीनी उत्पादक राज्य महाराष्ट्र और कर्नाटक पहले ही रंगराजन फॉर्मूले को अपना चुके हैं। इस व्यवस्था के अधीन मिलों से अपेक्षा की जाती है कि वे केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित उचित लाभकारी मूल्य (एफआरपी) किसानों को पहले ही चुका दें और किसानों के साथ अंतिम निस्तारण के दौरान उनको या तो चीनी से हुई आय का 70 फीसदी या फिर चीनी और उसके सह उत्पादों की बिक्री का 75 फीसदी साझा करें। यह व्यवस्था बाजार से जुड़ी हुई है और सभी अंशधारकों के हित में प्रतीत होती है। 

 
इससे चीनी क्षेत्र की निरंतर बनी रहने वाली चिंताएं भी समाप्त हो सकती हैं। मसलन उत्पादन मे होने वाली चक्रीय घटबढ़ और उसकी बदौलत कीमतों में आने वाली अस्थिरता। इसके अतिरिक्त यह गन्ना मूल्य का बकाया लगातार बढऩे की समस्या को भी समाप्त कर सकता है जिसकी वजह से गन्ना उगाने वाले किसानों के पास हमेशा नकदी की कमी बनी रहती है। इसके अतिरिक्त चूंकि एफआरपी का संबंध चीनी की रिकवरी से है इसलिए सक्षम किसानों और मिलों को इसका फायदा मिलेगा। जो किसान 10.5 फीसदी से अधिक सुक्रोज (चीनी का तत्त्व) उगाते हैं उनको एसएपी की तुलना में बेहतर प्रतिफल हासिल हो सकता है। महाराष्ट्र में यह स्तर आमतौर पर 11.5 फीसदी या उससे अधिक ही रहता है। इस पूरी प्रक्रिया में चीनी उद्योग के मुनाफे पर भी कोई नकारात्मक असर नहीं होगा। जाहिर है रंगराजन मॉडल में सबका फायदा है। 
 
लेकिन कुछ अहम चिंताएं हैं जिनको दरकिनार नहीं किया जा सकता है। इस व्यवस्था की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि चीनी मिलें बढिय़ा अंकेक्षण व अन्य प्रक्रिया का इस्तेमाल करें। यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता होगी कि चीनी मिलें इसकी रिकवरी को कहीं कम करके न दिखाएं। क्योंकि उस स्थिति में राजस्व में किसानों की जायज हिस्सेदारी पर बुरा असर होगा। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्य जिन्होंने एसएपी व्यवस्था के बचाव के लिए अपने कानून बना लिए हैं उनको इनमें संशोधन करना होगा। एक राह यह भी है कि केंद्र अपना कानून पारित करे जो राज्यों के कानूनों को बेअसर कर दे। इस तरह भी नई मूल्य व्यवस्था की ओर बढ़ा जा सकता है। 
 
केंद्र सरकार को उत्तर प्रदेश तथा अन्य चीनी उत्पादक राज्यों को इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वे रंगराजन समिति की उन अनुशंसाओं को भी लागू करें जो अब तक लागू नहीं हो सकी हैं। इनमें सबसे अहम है विभिन्न फैक्टरियों के लिए गन्ना क्षेत्र का आरक्षण करने और गन्ना उत्पादकों को अपनी उपज खास मिल को बेचने के लिए वचनबद्घ करने संबंधी प्रावधान। इससे मिलों को अपने खास दायरे में उत्पादित गन्ने पर एकाधिकार हासिल हो जाता है और किसान अपनी उपज को अन्य मिलों को नहीं बेच पाते। किसी राज्य ने अब तक इस आरक्षण को खत्म नहीं किया है। हालांकि महाराष्ट्र ने चीनी मिल स्थापित करने के लिए न्यूनतम दूरी संबंधी प्रावधान समाप्त कर दिया है। केंद्र सरकार ने इस दिशा में उदार उपाय अपनाए हैं, जो एक बेहतर कदम है। मसलन चीनी मिलों पर से लेवी हटाना और मासिक चीनी जारी करने संबंधी व्यवस्था का खात्मा। अब वक्त आ गया है कि केंद्र सभी चीनी उत्पादक राज्यों से कहे कि वे रंगराजन समिति द्वारा आगे बढ़ाए गए सुधार के एजेंडे को लागू करें।
Keyword: sugar, चीनी सीजन, गन्ने की खेती,
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