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सामाजिक सुरक्षा को कैसे किया जाए सुनिश्चित!

नितिन देसाई /  07 25, 2017

समाज के कमजोर तबके के लिए स्वास्थ्य की देखभाल एवं पेंशन व्यवस्था का खाका तैयार करने की जरूरत है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई

 
हाल में दिल्ली स्थित मानव विकास संस्थान की एक संगोष्ठी में सभी लोगों को सामाजिक सुरक्षा की खातिर निश्चित धनराशि उपलब्ध कराने (यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी यूबीआई) से संबंधित कुछ प्रस्तावों पर चर्चा की गई। इन प्रस्तावों को तैयार करने वाले प्रणव वद्र्धन और विनय जोशी की संगोष्ठी में मौजूदगी ने उसे और धार देने का काम किया। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में दी जाने वाली सब्सिडी के गलत दिशा में चले जाने से उपजी निराशा और 'त्रुटिपूर्ण' सब्सिडी की बड़ी मात्रा के समाज के साधन-संपन्न लोगों तक पहुंच जाने जैसे मुद्दे भी उस संगोष्ठी में काफी प्रमुखता से उठाए गए। जोशी के मुताबिक मौजूदा सब्सिडी को खत्म कर उसके स्थान पर 'सघन राजकोषीय समायोजन' करने के साथ ही यूबीआई सुनिश्चित करने का विकल्प आजमाया जा सकता है। इसके वास्ते जरूरी संसाधनों को जुटाने के लिए त्रुटिपूर्ण सब्सिडी में कमी लाने के अलावा कर एवं जीडीपी का अनुपात बढ़ाने, विनिवेश और राजकोषीय रियायतों को तर्कसंगत बनाने पर भी चर्चा हुई। इन रियायतों से जीडीपी पर 10 फीसदी बोझ पडऩे की बात भी कही गई।
 
हालांकि अपवादों की जरूरत स्वीकार की गई जिसमें आय सब्सिडी के सबसे बड़े स्रोत मनरेगा को भी शामिल किया गया। इस पर भी सहमति जताई गई कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर व्यय बनाए रखा जाना चाहिए। हालांकि इन अच्छे मदों में होने वाले सार्वजनिक व्यय की प्राथमिकता तय करने और इसके लिए परिवारों और लाभार्थियों की पहचान करने वाली एजेंसी के चयन को लेकर मतभेद भी नजर आए। दूसरे समूह में शामिल लोगों का कहना था कि स्वास्थ्य और शिक्षा रियायतें यूबीआई सुनिश्चित करने के बाद देनी चाहिए। पूरी चर्चा में यह बात साफ थी कि राजनीतिक दल अपना वोट बैंक साधने के लिए सब्सिडी का एक औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
 
हालांकि संगोष्ठी में इस बात पर थोड़ी काल्पनिक चर्चा भी सुनने को मिली कि अगर यूबीआई को मूर्त रूप देना है तो व्यक्तिगत या घरेलू प्राधिकार, मासिक या वार्षिक भुगतान, बैंक खातों के जरिये लेनदेन या मोबाइल वालेट में से कौन सा तरीका अपनाना बेहतर होगा। मेरी चिंता का विषय बस यह है कि इन मुद्दों पर चर्चा तभी होनी चाहिए जब हम इस नतीजे पर पहुंच चुके हों कि भारत में सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का कारगर तरीका यूबीआई ही है।
 
खुद प्रणव वद्र्धन का कहना है कि यूबीआई का मामला घरेलू आर्थिक सुरक्षा पर पडऩे वाले इसके असर पर निर्भर करना चाहिए। हमारे विभाजित समाज में सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संरक्षण को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। सामाजिक कल्याण के नजरिये से हमें निजी एवं सार्वजनिक हित के उपभोग के न्यूनतम स्तर की गारंटी देने पर विचार करना चाहिए। इसके अलावा अनर्थकारी स्वास्थ्य खर्चों, फसलों के लगातार खराब होने, रोजगार गंवाने और प्राकृतिक आपदा जैसे हालात में भी सुरक्षा देनी होगी। किसी व्यक्ति को स्वयं और अपने बच्चों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए जरूरी संसाधन जुटाने का भी मौका मिलना चाहिए। महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण और संबद्धता का भाव पैदा करने में भी सफल होना चाहिए। इसके साथ ही सिर पर मैला ढोने जैसे अमानवीय पेशे में फंसे लोगों को उससे निकालने का भी रास्ता बनाया जाना चाहिए। 
 
इस सवाल का जवाब तलाशने की जरूरत है कि किसी व्यक्ति को साल भर में क्या कुछ हजार रुपये का नकद हस्तांतरण करने भर से इन लक्ष्यों को हासिल किया जा सकेगा? गरीब एवं वंचित समाज से ताल्लुक रखने वाले एक व्यक्ति के नजरिये से देखा जाए तो निश्चित रूप से यह रकम उसके लिए एक राहत होगी। हालांकि यह रकम मिलने पर उसे सरकार से मिलने वाली सभी तरह की रियायती सेवाओं एवं सब्सिडी पर मिलने वाले सामान का मोह छोडऩा पड़ेगा। उसे सब्सिडी वाला अनाज, मनरेगा के तहत मिलने वाला रोजगार, लड़कियों के जन्म, गर्भवती महिला के इलाज एवं विकलांगों की मदद के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाएं, छात्रवृत्ति वितरण योजनाएं, लक्षित बीमा योजनाएं (फसल सुरक्षा या स्वास्थ्य देखभाल), रोजगार में आरक्षण जैसे सुधारात्मक उपाय और भेदभाव से संबंधित कानूनों से मिलने वाले लाभ भी क्या छोडऩे होंगे? हरेक पूंजीवादी बाजार वाली अर्थव्यवस्था की तरह भारत को भी बहुत जल्द एक सुगठित सामाजिक सुरक्षा प्रणाली की जरूरत होगी। सवाल उठता है कि क्या यूबीआई योजना इसका जवाब है? 
 
वर्तमान में सामाजिक सुरक्षा का जो स्तर है उसमें किसी व्यक्ति को बेरोजगारी, गंभीर बीमारी के इलाज में लगने वाले भारी खर्च, अधिक उम्र और आपात स्थितियों का सामना करने के लिए मूलत: पारंपरिक सहयोग प्रणालियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। या तो वह व्यक्ति नौकरी छूटने पर अपने गांव लौट जाता है या बीमारी के इलाज या अन्य आपात स्थितियों में रिश्तेदारों और दोस्तों से आर्थिक मदद लेता है या बुढ़ापे में अपने बच्चों पर आश्रित हो जाता है। ये पारंपरिक सहयोग प्रणालियां काफी अपमानजनक लगती हैं। खास तौर पर बुजुर्ग महिलाओं को अक्सर अपनी बाकी उम्र काटने के लिए वाराणसी और वृंदावन के विधवा आश्रमों में गुजर-बसर करने भेज दिया जाता है।
 
केंद्र और राज्य आर्थिक असुरक्षा से कुछ हद तक संरक्षण देते हैं। लेकिन इस दिशा में अभी काफी कुछ किए जाने की दरकार है। आंकड़े बताते हैं कि अफ्रीका या एशिया-प्रशांत क्षेत्र के भी कुछ देशों की तुलना में हमारी कोशिशें सीमित हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण और विस्थापन होने से लोगों के पास विस्तारित परिवार का पारंपरिक सुरक्षा घेरा नहीं रह जाएगा और हमें सरकार की मदद से संचालित सामाजिक सुरक्षा आवरण की जरूरत पड़ेगी। उसमें अधिकारियों के विवेकाधिकार की कोई जगह नहीं होगी और केवल पात्रता ही उसका आधार होगा। हालांकि पात्रता के लिए कुछ साधनों को पूरा करने या कुछ सामाजिक-भौगोलिक मापदंड और जरूरत जैसी शर्तें रखी जा सकती हैं।
 
दूसरे देशों के अनुभव के आधार पर देखें तो हमें जल्द-से-जल्द सामाजिक सुरक्षा व्यय को दोगुना कर जीडीपी के पांच फीसदी तक ले जाने की जरूरत है। इसके साथ ही यह भी मानकर चलना होगा कि भारत के एक शहरीकृत औद्योगीकृत उच्च-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था के रूप में तब्दील होने पर यह अनुपात बढ़कर 10 फीसदी तक पहुंच जाएगा। यूबीआई के लिए राजकोषीय प्रावधान की गुंजाइश संबंधी गणनाएं बताती हैं कि हम सभी लोगों के लिए पात्रता पर आधारित एक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली का बोझ उठा सकते हैं।
 
हालांकि हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि मौजूदा स्थिति से आगे हम किस तरह बढ़ सकते हैं? मौजूदा योजनाओं से लाभांवित हो रहे लोग उसके अभ्यस्त हो चुके हैं और राजनीतिक संरक्षक भी उन लोगों का समर्थन पाने के आदी हो चुके हैं। इस दिशा में शुरुआती तौर पर एक तरह की योजनाओं को आपस में मिला देने, नकद लाभ देने के बजाय सीधे बैंक खातों में रकम भेजने और प्रतिपादन मशीनरी को तर्कसंगत बनाने जैसे उपाय किए जा सकते हैं। इससे किसी भी व्यक्ति या परिवार के लिए अपनी पात्रता साबित करने और विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाने के लिए एक संपर्क सूत्र विकसित करने में मदद मिलेगी।
 
यूबीआई के बारे में रखे गए प्रस्तावों को आधार बनाते हुए हमें एक एकीकृत सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए। इससे पात्र लोगों को सभी सार्वजनिक सेवाओं और केंद्र एवं राज्य की तरफ से सामाजिक सुरक्षा के लिए दी जा रही नकद एवं अन्य सुविधाओं का लाभ दिया सकेगा। दरअसल हमें महज एक साधारण यूबीआई की जरूरत नहीं है बल्कि सभी के लिए स्वास्थ्य देखभाल, वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी भत्ता और समाज के कमजोर तबकों के लिए सामाजिक सहयोग सुनिश्चित करने वाली एक समेकित एवं एकीकृत प्रणाली चाहिए। यह काम जीएसटी की ही तरह जटिल होने के साथ ही देश की एकता एवं लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण भी है।
Keyword: health, pension,,
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