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'अभी संपत्ति आवंटन पर फैसले लेने का नहीं है सही वक्त'

हंसिनी कार्तिक /  July 25, 2017

यूटीआई ऐसेट मैनेजमेंट के अध्यक्ष (समूह) और इक्विटी प्रमुख का पदभार संभालने के बाद वी सुब्रमण्यन ने भारतीय इक्विटी पर अपनी चिंताएं सामने रखी। हंसिनी कार्तिक को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा, मूल्यांकन बुलबुले वाली स्थिति में है, जो सहज स्थिति से बाहर है। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश...

 
सेंसेक्स 32,000 के पार निकल गया है और कुछ लोग इसे बुलबुले का संकेत बता रहे हैं। आप इन संकेतों को कैसे देखते हैं?
 
इस आंकड़े का उतना महत्व नहीं है जितना मूल्यांकन का। इस नजरिये से भारत निश्चित तौर पर सस्ता बाजार नहीं है। यह ऐसा बाजार है जहां मूल्यांकन में ठीक-ठाक इजाफा हुआ है। साल 2013 के मध्य से जब भारत को पांच कमजोर बाजार में से एक माना गया था और हमने मुद्रा संकट का सामना किया, तब बाजार दोगुने से भी ज्यादा हो गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या आय दोगुनी हुई है। हमने पिछले 3-4 साल में एक अंक में आय देखी है। मुझे लगता है कि मूल्यांकन ऐसे चरण में पहुंचा है, जहां आप इसे असंगत कह सकते हैं, पर यह सहज स्थिति से थोड़ा बाहर है। कुछ ऐसे कारक हैं जो आय में इजाफा कर सकते हैं, लेकिन ऐसे समय के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। अगर आय में तेजी नहीं आती है तो यह बाजार के लिए मुश्किल पैदा करेगा क्योंकि आय के मुकाबले हम ज्यादा तेज गति से आगे बढ़े हैं। अन्य चुनौती यह है कि आगे की कुछ सकारात्मक बातों को हम पहले ही समाहित कर चुके हैं।
 
आय में बढ़त के सवाल पर लोकप्रिय तर्क नकदी का दिया जाता है। देसी निवेशक अपनी तरफ से सुनिश्चित कर रहे हैं कि इक्विटी में पर्याप्त रकम का प्रवाह हो?
 
नकदी आपको सिर्फ यह बताती है कि किसी खास संपत्ति में कितनी रुचि है। यह आपको नहीं बताता कि इसका मूल्यांकन उचित है या नहीं। लेकिन नकदी के साथ इसका पर्याप्त प्रवाह भी है। आईपीओ के अलावा दूसरे जरिए क्यूआईपी आदि में भारी तेजी आई है। द्वितीयक बाजार में सरकार की तरफ से पेश प्रतिभूतियां आसानी से खरीदी गई है। ऐसे में कुछ नकदी निकाली गई है। उपलब्ध नकदी के साथ रकम जुटाना भी अर्थव्यवस्था के बढ़त के चक्र के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन अंतत: अकेले नकदी बाजार को आगे नहीं बढ़ा सकती। आय में बढ़त समान रूप से महत्वपूर्ण है। आय के मामले में जोखिम सर्वव्यापी है। पिछले छह साल से हम आय में सालाना 15 फीसदी की बढ़त का अनुमान जताते रहे हैं, लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो पाया है।
 
कुछ विदेशी निदेशक पहले से ही भारत में निवेश की व्यवहार्यता को लेकर सवाल उठा रहे हैं?
 
सिर्फ उन्हें ही नहीं अपने क्लाइंटों को समझाना होता है बल्कि हर किसी को जिसके क्लाइंट भारतीय इक्विटी में निवेश कर रहे हैं। मूल्यांकन के इस स्तर पर इक्विटी की ओर संपत्ति के आवंटन का जोखिम भरा होता है और आगे कम रिटर्न की संभावना से जुड़ा है। देसी निवेशकों की बात करें तो इन्होंने भारतीय शेयर में कम निवेश किया है। ऐसे में उन्हें अपना निवेश धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। 
 
आपको निवेश निकासी का भय नहीं है, जैसा पहले देखा गया था?
 
एसआईपी निवेश के चलते प्रवाह की गुणवत्ता में नाटकीय सुधार हुआ है। लेकिन ऐसी कोई चीज नहीं है कि निवेश निकासी का दबाव दोबारा सामने नहीं आएगा। हालांकि इसके समय के बारे में बताना मुश्किल है।
 
जीएसटी के चलते आय में कितना अवरोध दिख रहा है?
 
एक या दो तिमाही तक अवरोध हो सकता है, लेकिन अभी हम इस बारे में नहीं जानते। कुछ क्षेत्रों में जीएसटी से आय को झटका लगेगा और हम यह नहीं जानते कि यह एक बार लगेगा या ज्यादा बार। बाजार इन अवरोधों में से कुछ को अस्थायी मानेगा। पिछले तीन महीने में आय अनुमान में स्पष्ट तौर पर कमी देखी गई है। साथ ही जीएसटी का मौजूदा संस्करण दो साल पहले बात हो रहे सैद्धांतिक मॉडल से अलग है। ऐसे में इसके फायदे कुछ समय में मिलेंगे।
 
क्या दरों में कटौती के हक में हैं?
 
अगर आप ब्याज दर घटाते हैं तो सवाल यह है कि क्या आप उधारी की रफ्तार में बढ़ोतरी और पूंजीगत खर्च में सुधार देखेंगे? इसका जवाब शायद नहींं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी ब्याज दर महंगाई के आंकड़े, आउटपुट के आंकड़े आदि पर आधारित है, तो फिर दरों में कटौती की गुंजाइश है। 
Keyword: UTI, यूटीआई ऐसेट मैनेजमेंट,
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