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इन्फोसिस की पुनर्खरीद पर चिंता के बादल

समी मोडक और रघु कृष्णन / मुंबई/बेंगलूरु July 24, 2017

भले ही टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज टीसीएस (टीसीएस) और विप्रो अपने पुनर्खरीद निर्गमों की योजनाओं पर आगे बढऩे में कामयाब रही हैं, लेकिन नियामकीय चिंताओं से इन्फोसिस के 2 अरब डॉलर (लगभग 13,000 करोड़ रुपये) के शेयर पुनर्खरीद कार्यक्रम को झटका लगा है। अप्रैल में बेंगलूरु स्थित इस आईटी कंपनी के बोर्ड ने शेयरधारकों के लिए लाभांश के जरिये या चालू वित्त वर्ष में शेयर पुनर्खरीद के तहत 13,000 करोड़ रुपये का लाभ मुहैया कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।

 
हालांकि इन्फोसिस इस शेयर पुनर्खरीद निर्गम के लिए निवेश बैंकरों और वकीलों की नियुक्ति भी कर चुकी है, लेकिन भारत और अमेरिका के बीच नियामकीय ढांचे में अंतर ने कंपनी के लिए राह पेचीदा बना दी है। भारत और अमेरिका ऐसे दो मुख्य अधिकार क्षेत्र हैं जहां कंपनी के शेयर सूचीबद्घ हैं। सूत्रों के अनुसार इन्फोसिस ने इस प्रस्तावित पुनर्खरीद पर भारतीय पूंजी बाजार नियामक सेबी और अपने अमेरिकी समकक्ष सिक्योरिटीज ऐंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) से मदद मांगी है। सूत्रों का कहना है कि सेबी द्वारा अभी इस पुनर्खरीद को मंजूरी दी जानी बाकी है क्योंकि वह चाहता है कि कंपनी पहले अमेरिकी एसईसी से मंजूरी प्राप्त करे। कानून जानकारों का कहना है कि 10 प्रतिशत से अधिक के डिपोजिटरी रिसीट्ïस (डीआर) जारी कर चुकी इन कंपनियों को वैश्विक नियामक द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं पर अमल करने या रियायत हासिल करने की जरूरत होगी। इन्फोसिस अमेरिका (अमेरिकन डिपोजिटरी रिसीट्ïस) और यूरोप (यूरोनेक्स्ट) में डीआर जारी कर चुकी है, जिनका उसकी शेयरधारिता में लगभग 17 फीसदी का योगदान है।
 
खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर सुधीर बस्सी ने कहा, 'यदि एडीआर शेयरधारिता 10 प्रतिशत से अधिक है तो कंपनी को एसईसी से रियायत मांगने या वहां भी पुनर्खरीद की पेशकश करने की जरूरत होगी।' इन्फोसिस को इस संबंध में भेजे गए ईमेल संदेश का तुरंत कोई जवाब नहीं मिला है। नोमुरा में विश्लेषकों अश्विन मेहता और रिशित पारिख का कहना है, 'कंपनी पुनर्खरीद या लाभांश के जरिये वित्त वर्ष 2018 में 2 अरब डॉलर की नकदी के लक्ष्य को लेकर प्रतिबद्घ बनी हुई है। प्रबंधन ने संकेत दिया है कि उसने फिलहाल पुनर्खरीद के लिए किसी समय-सीमा का संकेत देने से परहेज किया है, क्योंकि इससे कई जटिलताएं जुड़ी हुई हैं।'
 
पिछले सप्ताह, प्रतिस्पर्धी विप्रो ने 11,000 करोड़ रुपये के पुनर्खरीद निर्गम की घोषणा की थी। हालांकि विप्रो भी एडीआर जारी कर चुकी है, लेकिन इनका योगदान उसकी शेयरधारिता में 3 फीसदी से कम है और इसके परिणामस्वरूप कंपनी एसईसी से रियायत पा सकती है। कानूनी विश्लेषकों का कहना है कि यदि इन्फोसिस एसईसी से रियायत पाने में नाकाम रहती है तो नियामकीय जटिलता उसके लिए पुनर्खरीद की पेशकश की राह में बड़ी चुनौती पैदा कर सकती है। 
 
उदाहरण के लिए, भारतीय नियामक का कहना है कि पुनर्खरीद के तहत 15 प्रतिशत हिस्सा उन छोटे शेयरधारकों के लिए रखा जाएगा जिनकी शेयरधारिता दो लाख रुपये से कम हो। वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी एसईसी ने किसी भी श्रेणी के निवेशकों के लिए किसी तरह की तरजीह दिए जाने से इनकार किया है। इसी तरह, भारत में पुनर्खरीद प्रक्रिया सिर्फ 10 दिन के लिए खुली है, जबकि अमेरिका में यह अवधि 20 दिन है।
 
बस्सी ने कहा, 'चूंकि इन्फोसिस एक या दो वैश्विक एक्सचेंजों पर सूचीबद्घ है, इसलिए या तो उसे रियायत हासिल करनी होगी या सभी क्षेत्राधिकारों की कानूनी प्रक्रियाओं को ध्यान में रखकर साथ कदम बढ़ाना होगा।' विश्लेषकों का कहना है कि एक कंपनी के पुनर्खरीद कार्यक्रम के लिए सभी नियामकों को एकमत कर पाना एक बड़ी चुनौती होगी। नोमुरा के इन विश्लेषकों ने कहा, 'ऐसे मामले में जहां भारतीय कानून ब्रिटेन के कानूना में फर्क होता है वहां ब्रिटिश नियामक को भारतीय कानून अपनाने पर सहमत होने की जरूरत पड़ सकती है। कुछ मामलों में एक नियामक यह चाह सकता है कि दूसरा नियामक पहले फैसला करे। उस स्थिति में दूसरा नियामक उसका अनुसरण करेगा। जाहिर है इसमे भी समय लगेगा।' 
Keyword: infosys, आईटी सेवा प्रदाता इन्फोसिस,
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