बिजनेस स्टैंडर्ड - मीडिया उद्योग के बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देने की दरकार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, November 23, 2017 05:41 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

मीडिया उद्योग के बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देने की दरकार

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  July 24, 2017

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) एक बार फिर निरर्थक मुद्दे पर उलझा हुआ है। अमत्र्य सेन पर बने एक वृत्तचित्र में गाय शब्द के इस्तेमाल पर सेंसर बोर्ड को आपत्ति है। यह मीडिया और मनोरंजन उद्योग से संबंधित विवेकहीनता का एक और उदाहरण है। टिप्पणी और उसके जवाब में आने वाली टिप्पणियों के दुष्चक्र में फंसकर असली मुद्दा और उसका समाधान दबकर रह जाते हैं। नए सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी की नियुक्ति के बाद क्या इस उद्योग से संबंधित कुछ मसलों पर उनका ध्यान आकृष्ट किया जा सकता है? उदाहरण के तौर पर फिल्मों को लीजिए। पर्याप्त सिनेमाघर नहीं मिल पाने की वजह से फिल्में प्रदर्शित नहीं हो पा रही हैं। नितेश तिवारी की फिल्म दंगल दुनिया भर में 2,000 करोड़ रुपये की कमाई का आंकड़ा पार कर चुकी है और आज यह भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी हिट फिल्म बन चुकी है। इसकी कमाई में करीब 600 करोड़ रुपये का योगदान भारतीय बॉक्स ऑफिस का भी था। इसका मतलब है कि यह फिल्म जिस देश में बनी, वहां की करीब पांच फीसदी आबादी यानी करीब छह करोड़ लोगों ने ही इसे सिनेमाघरों में देखा था। 

 
अगर चीन में दंगल की कमाई पर नजर डालें तो पता चलेगा कि वहां पर यह जबरदस्त हिट रही है। चीन में दंगल के 4.6 करोड़ से अधिक टिकट बिके और उसकी कुल कमाई 1,225 करोड़ रुपये की हुई। यह आंकड़ा अभी बढ़ सकता है क्योंकि अब भी चीन के सिनेमाघरों में यह फिल्म चल रही है। हालांकि चीन में इस फिल्म के टिकट अपेक्षाकृत महंगे हैं लेकिन वहां पर दंगल के जितने टिकट बिके हैं वह बजरंगी भाईजान की घरेलू टिकट बिक्री से भी अधिक है। दंगल के शानदार प्रदर्शन की वजह सिर्फ यह नहीं है कि यह एक अच्छी फिल्म है। इसकी वजह यह है कि इसे चीन में कमाई का अधिक मौका भी मिला। चीन के करीब 138 करोड़ लोगों के लिए 40,000 स्क्रीन हैं जबकि भारत के 125 करोड़ लोगों के लिए महज 9,000 स्क्रीन ही उपलब्ध हैं। यहां पर यह बात ध्यान में रखने लायक है कि चीन में भी वर्ष 2011 में उतने ही सिनेमाघर थे जितने भारत में थे। लेकिन सरकार ने सिनेमाघरों के निर्माण में निवेश बढ़ाने का फैसला किया और अब चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फिल्म बाजार बन चुका है।
 
चीन के फिल्म बाजार का आकार 6.6 अरब डॉलर हो चुका है। आप यह दलील दे सकते हैं कि लोग अब ऑनलाइन और टेलीविजन पर फिल्म देखना अधिक पसंद कर रहे हैं और उनके लिए सिनेमाघर अधिक मायने नहीं रखते हैं। लेकिन असल में फर्क पड़ता है। भारतीय फिल्म उद्योग को मिलने वाले राजस्व का तीन-चौथाई से भी अधिक हिस्सा बॉक्स ऑफिस से ही आता है। इसका मतलब है कि सिनेमाघरों से मिलने वाला राजस्व ही भारतीय फिल्म उद्योग की जान है। एक तरफ मल्टीप्लेक्स में स्क्रीन की संख्या हरेक साल 150-200 की दर से बढ़ रही है तो इकलौते स्क्रीन वाले परंपरागत सिनेमाघर इसकी दोगुनी संख्या में बंद हो रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में फिल्म उद्योग के राजस्व में जो बढ़ोतरी हुई है उसका बड़ा हिस्सा टिकटों के दाम बढऩे से आया है, न कि अधिक लोगों के फिल्म देखने से। आप यह दलील भी दे सकते हैं कि फिल्म उद्योग एक अप्रासंगिक उद्योग है लेकिन सच में ऐसा नहीं है। यह भारत को वैश्विक पटल पर सशक्त मौजूदगी दर्ज कराने का एक लोकप्रिय माध्यम है और इससे लाखों लोगों को रोजगार मिला है और सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व भी मिलता है। ऐसे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय क्या देश भर में स्क्रीन की संख्या बढ़ाने के लिए मददगार पहल करने वाली नीति बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित करेगा? इसके बजाय हमें यह बताया जा रहा है कि किन शब्दों का इस्तेमाल करना है और पर्दे पर कितनी देर तक चुंबन किया जा सकता है?  फिर सभी के मन में बने हौवे यानी समाचार सामग्री का मसला है। भारत का समाचार टेलीविजन उद्योग अपने अल्प-प्रशिक्षित, शोर-शराबा करने वाले और अधिकतर पक्षपाती रवैया रखने वाले रिपोर्टरों के लिए जाना जाता है। हालांकि तीन बातों पर ध्यान देकर यह स्थिति सुधारी जा सकती है।
 
पहला, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की तरफ से 2014 से ही दिए जा रहे सुझावों को गंभीरता से लीजिए और राज्य सरकारों, नेताओं और राजनीतिक एवं धार्मिक संगठनों को कोई भी समाचार चैनल या केबल वितरण कंपनी चलाने पर पाबंदी लगा दीजिए। साथ ही किसी समाचार संगठन से संबंधित सभी तरह की सूचना को ऑनलाइन कर दिया जाए। समाचार चैनल चलाने वाली कंपनी की तिमाही रिपोर्ट, मालिकाना ढांचा और फंडिंग स्रोत की जानकारी ऑनलाइन करने से कई संदिग्ध मालिकों को दूर रखा जा सकता है।
 
दूसरा, प्रसार भारती को केंद्र सरकार के नियंत्रण से प्रशासनिक और वित्तीय आजादी देकर दूरदर्शन को भी मुक्त किया जा सकता है। सार्वजनिक प्रसारक पर राजस्व को लेकर कोई दबाव नहीं होने पर वह सही मायने में स्वायत्त हो जाता है। वैसा होने पर वह अच्छी गुणवत्ता वाली पत्रकारिता पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। इससे निजी समाचार चैनलों पर खुद को सही तरह से पेश करने का दबाव बढ़ेगा। ब्रिटेन में टीवी समाचार उद्योग के मौजूदा स्वरूप को आकार देने में बीबीसी की काफी अहम भूमिका रही है।
 
तीसरा, भारतीय प्रेस परिषद जैसे स्व-नियमन निकायों को कुछ शक्तियां दीजिए। अगर इन निकायों को दंड देने की शक्ति मिली होती तो पेड न्यूज (पैसे देकर खबर प्रकाशित-प्रसारित कराना) की समस्या बहुत पहले ही खत्म हो गई होती। पिछले छह वर्षों में 1,26,200 करोड़ रुपये के आकार वाले भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के विकास के लिए केवल दो महत्त्वपूर्ण कदम ही उठाए गए हैं। केबल प्रसारण को डिजिटल करना और रेडियो स्टेशनों की नीलामी करना काफी अहम रहा है। अगर देश के सकल घरेलू उत्पाद में इस उद्योग की हिस्सेदारी को 0.9 फीसदी से बढ़ाना है तो इस तरह के कुछ फैसले उठाए जाने की जरूरत है। इसी पहलू पर तवज्जो देने की दरकार है। 
Keyword: media, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड),
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 पेमेंट बैंक में प्रतिस्पर्धा होगी ग्राहकों के लिए फायदेमंद?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.