बिजनेस स्टैंडर्ड - महंगाई से अभी खत्म नहीं हुई लड़ाई
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, December 11, 2017 07:43 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

महंगाई से अभी खत्म नहीं हुई लड़ाई

अशोक लाहिड़ी /  July 24, 2017

समय से पहले ही महंगाई पर जीत का ऐलान करने में यह खतरा है कि कहीं यह जोरदार तरीके से पलटवार न कर दे। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अशोक लाहिड़ी

 
एक विचारशील लोकतंत्र में किसी भी नीति पर होने वाली बहसों का हमेशा स्वागत किया जाना चाहिए। सरकार के भीतर होने वाली अनौपचारिक चर्चाएं न केवल गोपनीय होती थीं बल्कि कभी-कभी वे सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे से भी बाहर होती थीं। इनमें विभिन्न सरकारी विभागों के बीच होने वाली उच्च स्तरीय चर्चा के अलावा सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक जैसे नियामक के साथ होने वाली चर्चाएं भी शामिल होती थीं। लेकिन मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति के मामले में चल रही चर्चाओं ने इस स्थिति को काफी हद तक बदल दिया है? अब वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच होने वाली चर्चाओं को लेकर काफी हद तक खुलापन आ गया है।
 
नीतिगत ब्याज दरों में कटौती की लगातार तेज होती मांगों के बीच मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 21 जून को हुई बैठक के बाद तटस्थ रुख अपनाने का संकेत दिया गया। जिसके बाद रिजर्व बैंक ने बैंकों को दिए जाने वाले कर्ज की दर यानी रीपो दर को 6.25 फीसदी पर ही बरकरार रखा। कुछ दिनों पहले जून 2017 के लिए घोषित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति की दर 1.54 फीसदी रहने से एक बार फिर रिजर्व बैंक पर ब्याज दरों में कटौती की मांग तेज हो गई है।
 
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जून महीने में महंगाई दर के रिकॉर्ड स्तर पर आने और औद्योगिक विकास में सुस्ती के बीच वित्त मंत्रालय चाहता है कि ब्याज दरों के मसले पर नीति-निर्माता इस पहलू को भी ध्यान में रखें। हालांकि रिजर्व बैंक अब भी चुप्पी साधे हुए है। शायद उसे लगता है कि नीति-निर्माताओं के बीच मौद्रिक नीति जैसे तकनीकी मसले पर कोई भी चर्चा समितियों और विशेषज्ञ निकायों में ही होना चाहिए, रामलीला मैदान में नहीं। वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक इस बारे में अपने मतभेदों को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन एक आम आदमी का तो इसी से सरोकार है कि जून 2017 में निम्न मुद्रास्फीति के बाद समुचित मौद्रिक नीति अपनाई जाए।
 
पहली बात, क्या रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति को 4 प्लस 2 फीसदी के स्तर पर रखने के अपने लक्ष्य को हासिल कर पाने में नाकाम रहा है? जुलाई 2016 में 6.0 फीसदी पर रही सीपीआई महंगाई दर फरवरी और मार्च को छोड़कर बाकी सभी महीनों में लगातार गिरावट पर रही और जून 2017 में 1.54 फीसदी पर आ गई। रिजर्व बैंक ने 5 अगस्त, 2016 को जारी एक सरकारी अधिसूचना के तहत मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित करने का एक वैधानिक एवं संस्थागत ढांचा बना लिया है। इसके तहत सीपीआई मुद्रास्फीति को 4 फीसदी पर रखने का लक्ष्य तय किया गया था जिसमें 2 फीसदी ऊपर या नीचे जाने की छूट भी शामिल थी। एमपीसी में पांच सदस्य और चेयरमैन होते हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर इस समिति के पदेन चेयरमैन होते हैं। रिजर्व बैंक को अपनी नीतियां तय करने में एमपीसी सांस्थानिक ढांचा मुहैया कराता है।
 
सरकार को इस बात का बखूबी अहसास था कि महंगाई दर अस्थायी कारणों से 4 प्लस 2 फीसदी के लक्ष्य से या तो अधिक रह सकती है या उससे कम रह सकती है। इससे साफ होता है कि रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करने में केवल तभी नाकाम माना जाएगा जब लगातार तीन तिमाहियों तक महंगाई दर ऊपरी या निचली सीमा के भीतर न रहे। इस तरह जून के महीने में महंगाई दर के 1.54 फीसदी पर रहने के बावजूद यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय कर पाने में नाकाम रहा है।
 
दूसरा, क्या एमपीसी वित्त वर्ष 2017-18 की पहली छमाही में महंगाई दर को 2.0-3.5 फीसदी के बीच रखने की राह से भटका हुआ है? चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सीपीआई आधारित महंगाई दर 2.24 फीसदी रही है। यहां तक कि जून में 1.54 फीसदी पर महंगाई दर होते हुए भी एमपीसी को उसके लक्ष्य निर्धारण में सही करार दिया जा सकता है। मसलन, अगर जून की तुलना में जुलाई के महीने में सीपीआई में 1 फीसदी की भी बढ़ोतरी हो जाती है और वह सिलसिला सितंबर तक बना रहता है तो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में सीपीआई महंगाई दूसरी तिमाही के हरेक महीने 2 फीसदी से कम ही रहेगी। फिर भी चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही के लिए औसत महंगाई दर 2 फीसदी से अधिक हो जाएगी। इस तरह महंगाई दर के लक्ष्य निर्धारण के मोर्चे पर एमपीसी को नाकाम ठहराना थोड़ा अपरिपक्व कहा जाएगा।
 
तीसरा, जून में सीपीआई महंगाई को 1.54 फीसदी पर रखने में उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक में आई 2.12 फीसदी की गिरावट का बड़ा योगदान रहा है। सीपीआई में खाद्य उत्पादों का करीब 50 फीसदी भारांक है। जून में कपड़ों एवं फुटवियर, आवासीय और ईंधन एवं बिजली की महंगाई दर 4 फीसदी से अधिक रही थी। इसके साथ ही खाद्य कीमतों में गिरावट की बड़ी वजह सब्जियों (16.53 फीसदी) और दाल एवं उत्पाद (21.92 फीसदी) की कीमतों में आई गिरावट रही। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के खाद्य मूल्य सूचकांक के मई-जून में लगातार बढऩे के बीच भारत में सीपीआई महंगाई में कमी आने से आगे इसके बढऩे का भी जोखिम है।
 
चौथा, क्या रिजर्व बैंक नीतिगत पहल के मामले में अधिक संकोची रवैया अपना रहा है जिससे अर्थव्यवस्था को भी नुकसान हो रहा है? वर्ष 2012-13 में सकल घरेलू निवेश जीडीपी का 42.5 फीसदी रहा था लेकिन 2013-14 से लेकर 2015-16 के बीच यह जीडीपी का 38-39 फीसदी रहा था। असल में, घरेलू निवेश बढ़ाने की जरूरत है लेकिन ढांचागत खामियां, प्रभावी शासन में कमी और नियामकीय बंदिशों के चलते कारोबारी सुगमता को प्रभावित करने वाले वाले पहलू इस तरह के निवेश पर असर डाल सकते हैं। हमें उस कहावत को याद रखने की जरूरत है कि कभी-कभी मौद्रिक नीति एक धागे की तरह होती है जिसे खींचा तो जा सकता है लेकिन पीछे नहीं धकेला जा सकता है। 
 
आखिर में मुद्रास्फीति संबंधी अपेक्षाओं का सवाल आता है। मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं मांग और आपूर्ति दोनों से ही प्रभावित होती हैं और खुद ही अपनी प्रतिपूर्ति कर सकती हैं। कुछ नीति-निर्माता महंगाई रूपी सुरसा के तात्कालिक अवसान की संभावना जता सकते हैं लेकिन आरोपित मुद्रास्फीति आकांक्षाओं के चलते कई लोगों को लग सकता है कि भारत में महंगाई मार्कंडेय पुराण के रक्तबीज दानव में तब्दील हो गई है। यह रक्तबीज अपने आप में नए और समान रूप से शक्तिशाली दानव का सृजन करेगा। 
 
मई 2017 में रिजर्व बैंक के घरेलू मुद्रास्फीति अनुमान सर्वेक्षण के मुताबिक केवल 27.3 फीसदी लोगों का ही यह मानना था कि महंगाई दर नकारात्मक या शून्य स्तर की ओर जा सकती है। महंगाई रूपी दुश्मन कमजोर भले ही हुआ है लेकिन उसका पूरी तरह खत्म होना अभी बाकी है। समय से पहले ही महंगाई पर जीत का ऐलान करने में यह खतरा है कि कहीं यह जोरदार तरीके से पलटवार न कर दे। पहले भी ऐसा हो चुका है। वर्ष 1968-69 और 1975-76 में थोकमूल्य अवमूल्यन के कुछ समय बाद ही मुद्रास्फीति ने पूरी ताकत से अपनी आमद दर्ज कराई थी।
Keyword: india economy,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सरकार को चीनी पर आयात शुल्क बढ़ाना चाहिए ?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.