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चीन के उठान पर समंदर के रास्ते लगाम मुमकिन

नितिन पई /  July 23, 2017

सीमा पर चीन की भड़काऊ गतिविधियों से पार पाने के लिए समुद्री ताकत बढ़ाने की रणनीति भारत के लिए मददगार हो सकती है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं नितिन पई

 
हमें अब अच्छी तरह मालूम हो चुका है कि भारत-भूटान-चीन के तिमुहाने पर पिछले महीने क्या हुआ था? जून के शुरुआती दिनों में चीनी सैनिकों ने भूटान के इस इलाके में सड़क बनाने की कोशिश की। इसका भूटानी सैनिकों ने विरोध करते हुए चीनी सैन्य टुकड़ी को चुनौती दी लेकिन संख्या में कम होने से उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। भूटानी सेना के साथ भारतीय सैनिक काफी नजदीकी तौर पर काम करते रहे हैं, लिहाजा इस मौके पर भी भारतीय सैनिक उस इलाके में पहुंचे और सड़क निर्माण रोकने और थोड़ा पीछे हटने के लिए चीनी सैनिकों को मनाने की कोशिश की। अब भी वहां पर वही स्थिति बरकरार है। भारत और चीन दोनों के ही सैनिक बैनरों और लाउडस्पीकरों के जरिये अपनी स्थिति पर दावा जताते रहते हैं। दोनों में से किसी भी पक्ष ने अभी तक गोलीबारी नहीं की है।
 
चीन का विदेश मंत्रालय और उसकी सेना पीएलए के प्रवक्ता इस मसले पर आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं। कुछ वैसा ही हाल भारतीय मीडिया का भी है। इसके उलट भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपेक्षाकृत शांत लेकिन दृढ़ रवैया दिखाया है। भारत ने चीन पर भारत एवं भूटान के बीच हुए समझौतों का उल्लंघन करने का आरोप लगाने के साथ ही यह भी कहा है कि वह एकतरफा ढंग से विवादग्रस्त इलाके में यथास्थिति को नहीं बदल सकता है।
 
विशुद्ध सैन्य रणनीतिक नजरिये से देखें तो चीन को सिलिगुड़ी के और करीब आने की इजाजत देना इस इलाके में भारत की सुरक्षा को कमजोर कर सकता है। इससे सामरिक रूप से 'चिकंस नेक' कहा जाने वाला सिलिगुड़ी का संकरा इलाका सुरक्षा के लिहाज से खतरे में पड़ सकता है। पूर्वोत्तर राज्यों को देश के अन्य हिस्सों से जोडऩे में इस संकरे इलाके की बेहद अहम भूमिका है। इसके साथ ही इस इलाके में ऊंचे मुकाम पर रहने से भारतीय सेना को भारत एवं भूटान को अलग करने वाले चीन-नियंत्रित क्षेत्र पर भी बढ़त की स्थिति मिली रहती है। इस तरह डोकलाम इलाके में अपनी स्थिति पर बने रहना भारत के लिए सैन्य वजहों से भी जरूरी है। हाल के दिनों में चीन की रणनीति रही है कि पड़ोसी देशों के साथ तनाव को इस कदर बढ़ा दिया जाए कि पड़ोसी देश सीधे टकराव से बचने को तरजीह दे और फिर चीन अपने पक्ष में 'शांतिपूर्ण' समाधान निकाल ले। इस रणनीति के तहत चीन पहले एक अतिवादी दावा करता है। 
 
दक्षिण चीन सागर में मौजूद द्वीपों के इर्दगिर्द नाइन डैश लाइन का रेखांकन या भारत-भूटान-चीन तिमुहाने से संबंधित अपना मानचित्र जारी करना चीन की इसी रणनीति का हिस्सा है। ऐसी स्थिति में पड़ोसी देश चीन के साथ द्विपक्षीय कूटनीति, बहुराष्ट्रीय मंचों और अंतरराष्ट्रीय कानून का इस्तेमाल करने का तरीका अपनाते हैं। लेकिन यह एक समय-साध्य प्रक्रिया है और चीन पूरी कोशिश करता है कि इस प्रक्रिया में लगने वाला समय और भी बढ़ जाए। इस बीच वह विवादग्रस्त इलाकों में सड़कें, रनवे और सैन्य अड्डïे बना लेता है। इसे रोकने का इकलौता रास्ता ताकत का इस्तेमाल करना है लेकिन चीन के छोटे एवं कम ताकत वाले पड़ोसी देशों में से भला कौन उसके साथ लड़ाई शुरू करना चाहता है? लंबे समय तक भौतिक नियंत्रण होने से चीन किसी विवादग्रस्त इलाके की यथास्थिति तोडऩे में कामयाब हो जाता है। इस तरह कब्जा होना ही मालिकाना हक का पर्याय बन जाता है।
 
भारत-भूटान-चीन तिमुहाने पर हुई हाल की घटना भी इसी परिपाटी पर सटीक बैठता है। अगर चीन को रोका नहीं गया तो वह इस तरकीब को एक के बाद दूसरे स्थान पर आजमाता रहेगा। खेल सिद्धांत के विचारक इसे 'सलामी स्लाइसिंग' (छोटी-छोटी घटनाओं के सम्मिलन से हासिल नतीजा) कहकर पुकारते हैं।  सामरिक विशेषत्र ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि भारत इस रणनीति के चलते पहले ही अपना सैकड़ों किलोमीटर भूभाग गंवा चुका है।
 
ऐसे में सवाल यह है कि भारत इस समस्या से किस तरह निपटेगा? भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान में महाद्वीपीय शक्ति की धारणा हावी है। इसके मुताबिक भारत को अपनी सैन्य ताकत बढ़ाकर हिमालयी सुरक्षा आवरण को सशक्त करना चाहिए। भारत को अपनी मौजूदा स्थिति बरकरार रखने के साथ ही एकतरफा ढंग से पीछे नहीं हटना चाहिए। इसके साथ ही हमें हिमालयी सीमा क्षेत्र में तनाव पैदा करने वाले हालात पैदा करने से भी परहेज करना चाहिए। सीमावर्ती इलाकों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने का मतलब है कि हम चीन के साथ प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष में पडऩे के निहायत ही गैरजरूरी, अवांछनीय एवं टाले जा सकने वाले खतरे में पड़ जाएं। चीन के साथ प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष हमारे हित में नहीं है (और शायद चीन के भी हित में नहीं है)। 
 
भारत को हिमालय एवं उप-महाद्वीप में चीन की चालबाजियों का जवाब दक्षिण चीन सागर और आसपास के इलाकों में अपने पलटवार से देना चाहिए। अपने कॉलम में मैंने लगातार कहा है कि भारत को सिंगापुर से आगे के समुद्री इलाके पर अपनी ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि चीन को हिमालय के सीमावर्ती क्षेत्र में आगे बढऩे या भारत के नजदीकी पड़ोसियों के बीच पैठ बनाने से रोका जा सके।
 
लगभग एक दशक तक पूर्वी एशिया की छोटी एवं मझोली शक्तियां चीन को साधने के लिए भारत से अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की मांग करती रही हैं। लेकिन वैसा नहीं हुआ जिसका नतीजा यह हुआ कि उनमें से कई देश चीन के ही पाले में जा गिरे। हालांकि वियतनाम, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, संभवत: ऑस्ट्रेलिया और सबसे बढ़कर जापान जैसे कई देशों ने मजबूती से अपना रुख बनाए रखा है।
 
मसलन, डोकलाम में हुई तनातनी पर भारत की प्रतिक्रिया यह संकेत हो सकता है कि वह दक्षिण चीन सागर में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास में शिरकत करेगा। अगर ऐसा होता तो निश्चित रूप से चीन के माथे पर बल पड़ते। दूसरे शब्दों में, चीन के संवेदनशील भौगोलिक इलाके में समुद्री शक्ति का इस्तेमाल कर भारत उसके लिए हिमालय क्षेत्र में सक्रियता की कीमत बढ़ा सकता है। 
 
इसके उलट स्थलीय शक्ति के पैमाने पर जवाब देने का मतलब है कि भारत चीन के ही मनवांछित तरीके से बरताव कर रहा है। चीन तो यह चाहेगा कि भारत हिमालय क्षेत्र की सुदूर चोटियों और पठारों की सुरक्षा में ही फंसा रहे जिससे बड़ी संख्या में सैन्यबल और धन उसमें लगे। इससे युद्ध का जोखिम भी बढ़ेगा और तनाव पसरेगा। यही वजह है कि चीन ने आखिर अपने नए टैंक का परीक्षण तिब्बत में ही करना क्यों पसंद किया? लेकिन भारत को चीन की इस चालबाजी में नहीं फंसना चाहिए। जमीन पर चीन के पास पाकिस्तान के रूप में एक सहयोगी मौजूद है लेकिन भारत के पास ऐसा कोई मददगार नहीं है। वहीं पूर्व एशिया के समुद्री इलाके में जहां चीन के पास गिने-चुने सहयोगी हैं, वहीं भारत के पास कई सहयोगी हैं।
 
मौजूदा गतिरोध में भारत को अपने मोर्चे पर दृढ़ता से डटे रहना चाहिए ताकि तनाव कम करने के लिए दोनों पक्ष कदम पीछे खींचे। आने वाले हफ्तों में चीन अपनी जुबानी चालबाजियां बढ़ा सकता है और राजनीतिक एवं आर्थिक दबाव का भी सहारा ले सकता है। लेकिन भारत को इन उकसावों के फेर में नहीं आना चाहिए। कूटनीति का मतलब ही है कि दूसरा पक्ष जो न दे सके उसका आप जिक्र ही नहीं कीजिए। चीन का जुबानी जमा-खर्च और हरकतें टांग खींचने वाली ही हैं, कूटनीति की नहीं। इसीलिए भारत को झुकना नहीं चाहिए और सितंबर में बर्फबारी शुरू होने तक अपनी मौजूदा स्थिति बनाए रखनी चाहिए।
 
भारत को यह भी प्रदर्शित करना होगा कि वह चीन के उकसावे में नहीं फंसेगा क्योंकि उसके लिए अपनी प्रतिष्ठा मायने रखती है। अगर दूसरे देश भारत को चीन के आगे झुकते हुए देखते हैं तो भारतीय कूटनीति के लिए खासी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इसी तरह अगर भारत को चीन के सामने तनते हुए देखते हैं तो चीन के राजनयिकों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। यही बात दांव पर लगी हुई है।
 
(लेखक लोक नीति के स्वतंत्र शोध एवं शिक्षण संस्थान  तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के सह-संस्थापक और निदेशक हैं)
Keyword: india, china,,
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