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इस्तीफे के बाद मायावती को अपने जनाधार को रखना होगा बरकरार

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 21, 2017

यह सबसे चतुराई भरा कदम था जो वह उठा सकती थीं। मायावती जब देशभर में दलितों पर हो रहे हमलों का मुद्दा संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा में उठाने की कोशिश कर रही थीं तो उनकी आवाज हंगामे में कहीं दबकर रह गई। ऐसे परिस्थिति में उन्होंने वही किया जो वह कर सकती थीं। उन्होंने तुरंत राज्य सभा से इस्तीफा देने की धमकी देते हुए कहा कि वह यह कदम इसलिए उठा रही है क्योंकि सदन ने उन्हें अपने लोगों पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाने का मौका नहीं दिया।

 
मायावती खुद को एक ऐसे नेता के रूप में दिखाना चाहती थीं जिसे पद का कोई मोह नहीं है। अलबत्ता उत्तर प्रदेश चुनावों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बेहद खराब प्रदर्शन के बाद अब उनके दोबारा राज्य सभा पहुंचने की संभावना नहीं है। मायावती ने अपनी धमकी को अमली जामा पहनाते हुए एक पंक्ति का हस्तलिखित इस्तीफा सौंप दिया। पिछले कुछ चुनाव मायावती के लिए अच्छे नहीं रहे हैं। वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश चुनावों में उनकी पार्टी को 26 फीसदी मत के साथ 403 में से 80 सीटें मिली थीं। लेकिन पार्टी को सबसे बड़ा झटका वर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों में लगा। तब मत प्रतिशत के हिसाब से उत्तर प्रदेश में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई। उन चुनावों में मोदी की जबरदस्त लहर थी जिसमें अधिकांश दलों के मजबूत किले ढह गए थे। यह लहर उत्तर प्रदेश में इस साल हुए विधानसभा चुनावों में भी जारी रही। एक बार फिर इसका सबसे ज्यादा नुकसान बसपा को हुआ जो 22.2 फीसदी वोट हासिल करने के बावजूद महज 19 सीटें ही जीत पाई। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 325 सीटें जीतीं जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) तथा कांग्रेस के गठबंधन ने 54 सीटों पर कब्जा किया। सपा को बसपा से कम यानी 21.8 फीसदी वोट मिले लेकिन वह 47 सीटें जीतने में कामयाब रही।
 
वर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों में भी इसी तरह का रुझान देखा गया। तब बसपा को उत्तर प्रदेश में 19.6 फीसदी वोट मिले थे लेकिन उसका खाता भी नहीं खुल पाया। दूसरी तरफ सपा ने 22.2 फीसदी मतों के साथ पांच सीटें जीती। कांग्रेस को महज 7.5 फीसदी मत हासिल हुए थे और पार्टी ने अमेठी और रायबरेली की सीटों पर कब्जा बरकरार रखा। इसका मतलब साफ है कि बसपा का वोट बैंक पूरी तरह पार्टी के प्रति समर्पित है। लेकिन पार्टी ने इसे मजबूत करने के लिए कदम नहीं उठाए तो फिर उसका जनाधार खिसक सकता है। बसपा को अगर इस जनाधार को बरकरार रखना है तो उसे हार के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को जिम्मेदार ठहराने जैसे बहाने तलाशने के बजाय अपने कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना होगा और भविष्य की योजना बनानी होगी। संभवत: मायावती को अब लगने लगा है कि यह जड़ों की ओर लौटने का सही समय है।
 
बसपा को सोशल इंजीनियरिंग के अपने प्रयोगों पर फिर से विचार करना होगा। पार्टी केवल जातिगत गठजोड़ के दम पर आगे नहीं बढ़ सकती है। सबसे पहले मायावती ने ब्राह्मïणों और दलितों का गठजोड़ बनाने की कोशिश की। यहां तक कि उन्होंने अगड़ी जाति के गरीबों को नौकरियों में आरक्षण की भी वकालत कर डाली। इससे दलित बिफर गए। उन्होंने सोचा कि अगर उन्हें अगड़ी जातियों के साथ गठजोड़ ही करना है तो फिर इसके लिए मायावती को माध्यम बनाने की क्या जरूरत है? वे सीधे नरेंद्र मोदी से क्यों नहीं जुड़ सकते हैं? अब हमें अच्छी तरह पता है कि 2014 के आम चुनावों में बड़ी संख्या में दलितों ने भाजपा को वोट दिया था।
 
तब मायावती ने दलितों से जुड़े व्यापक मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया। यह था दलित महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण का मुद्दा। इन महिलाओं का तिहरा शोषण होता है। उनकी ही जाति और ऊपरी जाति के मर्द उनका शोषण करते हैं। साथ ही दलित होने के नाते भी उन्हें शोषण झेलना पड़ता है। बसपा जब सत्ता में थी तो उसने उच्च शिक्षा और निजी क्षेत्र में दलितों को आरक्षण के बारे में नहीं सोचा। साथ ही दलितों को जमीन का मालिकाना हक दिलाने के लिए भी कोई आंदोलन नहीं चलाया। 
 
इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि सत्ता से बेदखली के बाद मायावती ने इन मुद्दों पर विचार किया है। इसके बजाय उन्होंने मुस्लिमों के साथ गठजोड़ करने की कोशिश की जिससे साबित होता है कि बसपा अब भी मानती है कि इस तरह वह सत्ता तक पहुंचने के लिए जरूरी सीटें जीत जाएगी। यह अलग बात है कि दलित उसकी इस सोच को ठुकरा चुके हैं। नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार दलितों खासकर उत्तर प्रदेश के बुनकरों पर पड़ी है। लेकिन इस मुद्दे पर मायावती ने कभी केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश नहीं की बल्कि उनका जोर गोरक्षकों और लव जिहादियों से आसन्न खतरे पर होता है।
 
टेलीविजन पर सीधे प्रसारण में इस्तीफे के ऐलान के बाद अगर मायावती दलितों और गैर दलितों से जुड़े मुद्दों को पूरी संजीदगी के साथ जोरशोर से उठाती हैं तो फिर बसपा को नया जीवन मिल सकता है। लेकिन पहचान की सियासत में यकीन रखने वाली मायावती के लिए हिंदुत्व की व्यापक अपील के इस दौर में अपनी खोई राजनीतिक जमीन हासिल करना आसान नहीं होगा।
Keyword: uttar pradesh, mayawati,,
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