बिजनेस स्टैंडर्ड - विलय और ऊर्जा सुरक्षा
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विलय और ऊर्जा सुरक्षा

संपादकीय /  July 21, 2017

तेल-गैस क्षेत्र में भारीभरकम सरकारी उपक्रम (पीएसयू) बनाने का केंद्रीय मंत्रिमंडल का निर्णय बेशक कुछ देर से आया, लेकिन क्षेत्र में अक्षमता कम करने में और संसाधनों के लिए दुनिया भर में बेहतर तरीके से प्रतिस्पद्र्घा करने वाली संस्था बनाने की दृष्टिï से यह बहुत कारगर साबित होगा। यह आवश्यक था क्योंकि अधिकतर एशियाई देशों में एक ही तेल कंपनी होती है, जिसमें मूल्य शृंखला के सभी घटक शामिल होते हैं। लेकिन भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की 18 तेल कंपनियां हैं। देश की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी खुदरा तेल विक्रेता हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (एचपीसीएल) में सरकार की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी देश की सबसे बड़ी तेल उत्पादक कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) को बेची जा रही है, जो फरवरी में बजट में हुई घोषणा के अनुरूप है। बजट में एकीकरण, विलय एवं अधिग्रहण द्वारा केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को मजबूत करने की सरकार की योजना का खाका दिखाया गया था। खबरों में संभावना जताई गई है कि इस निर्णय के बाद रिफाइनिंग कंपनियों इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) और उत्खनन क्षेत्र की पीएसयू ऑयल इंडिया का विलय हो सकता है अथवा तेल विपणन कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और गैस क्षेत्र की कंपनी गेल का विलय हो सकता है।

 
तेल-गैस क्षेत्र की पीएसयू के एकीकरण का यह निर्णय कई कारणों से स्वागतयोग्य है। पहला कारण तो यही है कि इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा बेहतर होगी। हालांकि भारत दुनिया में सबसे तेज विकास करने वाली अर्थव्यवस्था है, लेकिन उस जमात में सबसे कमजोर देश भी यही है। अपने नागरिकों के लिए आर्थिक वृद्घि तथा कल्याण सुनिश्चित करने के मामले में इसे बहुत लंबा रास्ता तय करना है। इस वृद्घि के लिए ऊर्जा संसाधनों की लगातार आपूर्ति आवश्यक होगी। फिलहाल भारत कच्चे तेल की अपनी 80 प्रतिशत मांग, तरल पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की 50 प्रतिशत मांग और प्राकृतिक गैस की 35 प्रतिशत जरूरत आयात से ही पूरी करता है। भारत वैश्विक महाशक्ति बनने की उम्मीद कर रहा है, लेकिन अंतरराष्टï्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि दो दशकों में आयात पर यह निर्भरता बढ़कर 90 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। उस समय संख्या में कम, लेकिन आकार में बड़ी तेल कंपनियां होने का और उन्हें वित्तीय संसाधन तथा तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने का जबरदस्त फायदा मिलेगा। इससे अंतरराष्टï्रीय स्तर पर ईंधन मूल्य में अनिश्चितता से निपटने और दुनिया भर में रणनीतिक सौदे करने में ही नहीं बल्कि देसी तेल क्षेत्र की पूरी क्षमता तलाशने की क्षमता तैयार करने में भी मदद मिलेगी।
 
बुधवार के फैसले पर कई प्रकार की चिंता होना भी लाजिमी है और चिंता बंबई स्टॉक एक्सचेंज पर दिख भी गई, जहां एचपीसीएल का शेयर 4 प्रतिशत से भी ज्यादा लुढ़क गया। एचपीसीएल के शेयरधारक निराश थे क्योंकि इस अधिग्रहण के बाद खुली पेशकश आने की संभावना बहुत कम है। इसे उनके साथ अन्याय कहा जा सकता है क्योंकि उन्हें भी उसी कीमत पर कंपनी से बाहर निकलने का मौका मिलना चाहिए, जिस कीमत पर सरकार हिस्सेदारी बेच रही है। यह चिंता भी जताई जा रही है कि एकदम अलग किस्म की कार्य संस्कृति से आए कर्मचारियों को एक साथ लाना कितना मुश्किल भरा हो सकता है क्योंकि इस मामले में उत्पादन करने वाली और विपणन करने वाली कंपनियों का विलय होना है। कुछ लोगों ने यह दावा भी किया है कि कंपनियों के बड़े आकार के कारण होने वाले संभावित फायदे बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं। उन्होंने चेतावनी भी दी है कि स्पद्र्घा कम होने का नुकसान उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ेगा। कदम आगे बढ़ाते समय सरकार को इन बातों की चिंता करनी चाहिए। यह तर्क काफी नहीं होगा कि इस सौदे से सरकार के वार्षिक विनिवेश लक्ष्य का बड़ा हिस्सा पूरा हो जाएगा।
Keyword: oil, gas, पेट्रोलियम मंत्रालय सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी),
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