बिजनेस स्टैंडर्ड - राष्ट्रपति के मायने
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राष्ट्रपति के मायने

संपादकीय /  July 20, 2017

राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद की जबरदस्त जीत संवैधानिक मूल्यों के रक्षक के तौर पर राष्ट्राध्यक्ष की भूमिका के परीक्षण का एक अनूठा अवसर मुहैया कराती है। कोविंद के आलोचकों ने यह आशंका जताई है कि कुछ राष्ट्रपतियों की तरह सत्तारूढ़ दल के एक वफादार नेता और दलित के रूप में अपनी पहचान के चलते वह राष्ट्रपति के तौर पर कार्यपालिका के अधीनस्थ और पूरी तरह रस्मी भूमिका को ही निभाते हुए नजर आएंगे। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार की तरफ से 1976 में लाए गए 42वें संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति की भूमिका काफी हद तक रस्म अदायगी तक ही सीमित की जा चुकी है। लेकिन ये आलोचक दो वजहों से गलत साबित हो सकते हैं। पहला, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय में वह एक दशक से भी अधिक समय तक सरकारी वकील रह चुके हैं। इसके अलावा राज्यसभा सदस्य के रूप में अपने दो कार्यकाल और बिहार के राज्यपाल के रूप में काम करने के चलते उनके पास भारतीय लोकतंत्र की अंदरूनी कार्यप्रणाली के बारे में पर्याप्त अनुभव भी है। भारतीय गणतंत्र का 14वां राष्ट्रपति बनने जा रहे कोविंद इस पद में निहित उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए काफी अच्छी स्थिति में हैं। अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में उनकी व्यक्तिगत या पारिवारिक ईमानदारी पर कोई आक्षेप नहीं लगा है। 

 
दूसरे कारण की जड़ें इतिहास में निहित हैं। भले ही आपातकाल के बाद सभी सरकारों ने राष्ट्रपति भवन में बैठेे शख्स पर साउथ ब्लॉक का वर्चस्व स्थापित करने की कोशिशें की हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के प्रति आभारी माने जाने वाले राष्ट्रपतियों ने भी अनपेक्षित तरीकों से अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल किया है। इससे भारतीय लोकतंत्र के तर्कशील होने के बारे में काफी कुछ पता चलता है। जैसे कि, राजीव गांधी के साथ अपनी तनातनी के चरम पर होने के दौरान राष्ट्रपति जैल सिंह ने डाक विधेयक को वीटो कर दिया था। उस विधेयक से सरकार को डाक संचार को बीच में ही रोकने का अधिकार मिल जाने वाला था। उसके पहले नीलम संजीव रेड्डी ने इसकी मिसाल पेश की थी। रेड्डी ने प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति को कुछ शर्तों के साथ जोडऩे का काम किया था। जनता पार्टी में टूट के बाद रेड्डी ने चरण सिंह को सदन में अपना बहुमत साबित करने को कहा था। यह अलग बात है कि चरण सिंह ऐसा कर पाने में नाकाम रहे। देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार और बिहार की राबड़ी देवी सरकार की बर्खास्तगी के मौके पर राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल कर खुद को रबर-स्टांप नहीं बनने दिया था। प्रणव मुखर्जी ने भी धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक प्रतिवाद के तौर पर असहिष्णुता को बढ़ावा दिए जाने के खिलाफ अपनी राय सार्वजनिक कर अपने पद की सत्ता को स्थापित किया। 
 
इसका मतलब है कि भारत के लिखित संविधान की आत्मा की व्याख्या का अवसर अब भी उसी तरह व्यापक है जैसा देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के समय हुआ करता था। एक युवा लोकतंत्र में राष्ट्रपति की भूमिका की महत्ता गणतंत्र दिवस पर सलामी लेने और कार्यपालिका द्वारा तैयार किए गए भाषणों को संसद में पढऩे की औपचारिकता से कहीं अधिक है। दलित समुदाय से ही ताल्लुक रखने वालीं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के खिलाफ कोविंद का जीतना अवश्यंभावी माना जा रहा था। सत्तारूढ़ गठबंधन ने उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी लामबंदी की थी। दो-तिहाई मतों से मिली जीत चुनाव में क्रॉस वोटिंग की भी पुष्टि करती है। इसका यह भी अर्थ है कि अपने दलगत विचारों से अलग हटकर लोगों ने उनके पक्ष में मतदान किया है। भारत के नाजुक लोकतंत्र में नियंत्रण एवं संतुलन के एक जरूरी लीवर के तौर पर उनकी अहमियत काफी अधिक है।
Keyword: president, election, BJP, NDA, राज्यपाल रामनाथ कोविंद,
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