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किराया बढ़ाने से पहले सेवाओं में सुधार करे रेलवे

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  July 19, 2017

भारतीय रेलवे ने मुंबई और अहमदाबाद तथा दिल्ली और वाराणसी के बीच तीव्र गति वाली रेल सेवा शुरू करने की अपनी महत्त्वाकांक्षी योजना का हाल ही में खाका पेश किया है। इन योजनाओं की राजनीतिक अहमियत को शायद ही नजरअंदाज किया जा सकता है। लेकिन इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि इससे रेलवे की अनुपयुक्त प्राथमिकताओं का भी पता चलता है। 

 
नई परियोजनाओं की घोषणा से रेल मंत्रालय को निश्चित रूप से अखबारों में काफी सुर्खियां मिलेंगी। लेकिन सुर्खियां बटोरने भर से यात्रियों को ले जाने की समग्र सेवाओं में सुधार की असली जरूरत नहीं पूरी हो पाएगी। हाई स्पीड ट्रेन चलाना भी उतना ही जरूरी है जितना मौजूदा यात्रा सेवाओं को बेहतर और कारगर बनाना जरूरी है। हाई स्पीड रेल परियोजनाओं के प्रति आसक्त रेलवे या तो लोगों की परिवहन संबंधी जरूरतें समझ पाने में नाकाम रहा है या मौजूदा सेवाओं को बेहतर करने की जरूरत को नजरअंदाज कर रहा है। और जब उसने ऐसा करने की कोशिश की है तो उसकी प्राथमिकताएं अनुपयुक्त रही हैं और नीतिगत प्रतिक्रिया भी अपर्याप्त साबित हुई है। भारतीय रेलवे के साथ क्या गड़बड़ हो रहा है? पहले हमें हाई स्पीड रेल परियोजनाओं के लिए सुझाए गए किराये ढांचे पर एक नजर डालनी होगी। रेलवे बोर्ड को सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली-वाराणसी या मुंबई-अहमदाबाद परियोजना के तहत चलने वाली ट्रेनों का किराया 4.5 रुपये प्रति किलोमीटर रखने का प्रस्ताव है। यह किराया हवाई यात्रा के प्रति किलोमीटर सफर की औसत लागत से थोड़ा ही कम है। भारत में विमानन कंपनियां अधिकांश मार्गों पर औसतन पांच रुपये प्रति किलोमीटर की दर से किराया वसूलती हैं। इस तरह हाई स्पीड ट्रेन हवाई सफर की तुलना में थोड़ा ही किफायती होंगी। लेकिन हवाई सफर के अन्य लाभों से इसकी तुलना करें तो यह मामूली अंतर भी नहीं रह जाएगा।
 
हवाई यात्रा में लगने वाले कम समय, रेलवे स्टेशनों से तुलना में हवाईअड्डे का बेहतर अनुभव और ट्रेन से सफर करने के बजाय उड़ान भरने से सामाजिक ढांचे में ऊपर जाने का आकर्षण निश्चित तौर पर लोगों को हाई स्पीड ट्रेनों की तुलना में हवाई सफर को ही प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करेगा। सरकार पहले से ही तेजी से उभरते मध्य वर्ग की आकांक्षाओं को पूरा कर नया बाजार तैयार करने के इरादे से 'उड़ान' योजना शुरू कर चुकी है जिसमें छोटे शहरों को भी विमानन नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। 
 
एक आम भारतीय नागरिक को अपने शहर से दूसरे शहर में जाने के लिए हवाई सफर की सुविधा देने से मिलने वाला सियासी लाभ हाई स्पीड ट्रेन चलाने से कहीं कम नहीं होगा। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि मुंबई-अहमदाबाद और दिल्ली-वाराणसी के बीच हाई स्पीड ट्रेनें चलने में अभी 10-15 साल का समय लग जाएगा लेकिन कम किराये वाली हवाई सेवाएं तब तक अपनी जड़ें जमा चुकी होंगी। रेलवे बेहतर और कारगर यात्री सेवाओं के जरिये काफी कम मेहनत और लागत में ही अधिक लाभ कमा सकता है। सवाल यह है कि रेलवे को किन प्रमुख बातों को प्राथमिकता देनी चाहिए? देश के महानगरों में रेलवे का जाल सुधारने से ही इसकी शुरुआत की जा सकती है। 
 
रेलवे के कुल यात्रियों में 28 फीसदी संख्या इन महानगरों के भीतर सफर करने वाले लोगों की है। लेकिन समस्या यह है कि इन उपनगरीय रेल नेटवर्क से केवल 14 फीसदी राजस्व ही मिलता है। इस बड़े अंतराल की वजह यह है कि उपनगरीय रेल सेवाओं के किराये पर भारी सब्सिडी दी जाती है जिसका बोझ आखिरकार रेलवे को ही उठाना पड़ता है। लगातार कई सरकारों की लोकप्रियतावादी नीतियों के चलते यात्री किराया आम तौर पर अपरिवर्तित ही रहा है। ऐसे में पहली प्राथमिकता उपनगरीय रेल सेवाओं के किराये को तर्कसंगत बनाने की होनी चाहिए ताकि रेलवे की गुणवत्ता सुधारने के साथ ही उसकी आर्थिक सेहत सुधारने में भी मदद मिले।
 
दूसरी प्राथमिकता रेलवे की तरफ से विभिन्न तरह के यात्रियों को किराये में दी जाने वाली प्रत्यक्ष एवं परोक्ष सब्सिडी की समीक्षा करने को दी जानी चाहिए। आखिर कर देने वाले एक वरिष्ठ नागरिक को सभी ट्रेनों के किराये में 50 फीसदी छूट क्यों दी जानी चाहिए? क्या यह छूट एक खास आय समूह वाले वरिष्ठ नागरिकों तक ही सीमित कर देने का वक्त नहीं आ गया है? 
 
इसी तरह रेलवे के मौजूदा एवं सेवानिवृत्त कर्मचारियों को मिलने वाली तमाम रियायतों की भी समीक्षा क्यों नहीं की जानी चाहिए? संसद सदस्यों को किराये में मिलने वाली रियायतों की भी समीक्षा की जानी चाहिए। आखिर में रेलवे राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी प्रीमियम ट्रेनों में सीटें भरने की समस्या को लेकर बेवजह परेशान हो रहा है। राजधानी ट्रेनों में 95 फीसदी सीटें भरने और शताब्दी ट्रेनों में 75 फीसदी सीटें भरने के बावजूद रेलवे का चिंतित होना थोड़ा अजीब है। इससे भी बुरा यह है कि रेलवे कई तरह की रियायतें और छूट देकर अधिक सीटें भरना चाहता है ताकि राजस्व बढ़ सके।
 
यह एक त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया है। प्रीमियम ट्रेनों के साथ समस्या इनकी सीटों का पूरी तरह भर पाना नहीं है। इसके बजाय रेलवे का ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि किस तरह इन प्रीमियम ट्रेनों में यात्रा करने वाले लोगों के अनुभव को यादगार बनाया जा सके। रेलवे स्टेशनों पर बेहतर सुविधाएं, ट्रेनों की तेज रफ्तार, समय पर गंतव्य स्थल तक पहुंचना और ट्रेनों में सफाई जैसे पहलुओं को बेहतर किया जा सकता है। इस दिशा में कुछ कदम उठाए जा रहे हैं लेकिन किराये में कटौती या छूट जैसे तरीकों से अधिक सीटें भरने पर ध्यान केंद्रित होना चिंतनीय है। रेलवे को पहले अपनी सेवाओं में सुधार करने के बारे में सोचना चाहिए और फिर किराया बढ़ाना चाहिए। इससे यात्री किराये पर दी जाने वाली सब्सिडी की भरपाई के लिए मालभाड़े की दरें ऊंचा रखने की पुरानी समस्या का भी समाधान निकाला जा सकता है।
Keyword: railway, रेल,
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