बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी का स्वरूप और अतीत के प्रयास
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जीएसटी का स्वरूप और अतीत के प्रयास

शंकर आचार्य /  July 19, 2017

देश में अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में सुधार की कोशिशों का दायरा वर्ष 2000 तक सीमित नहीं है। बल्कि यह उससे कहीं पीछे जाता है। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शंकर आचार्य

 
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) निश्चित तौर पर स्वतंत्र भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण और जटिल कर सुधार है। इसके गुण दोषों पर काफी कुछ लिखा जा चुका है और अब इसमें नया जोडऩे को कुछ भी नहीं है। मैं केवल यही कह सकता हूं कि हमें इस नए कानून के आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक लाभ क्या हुए और अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में राष्ट्रव्यापी बदलाव की क्या कीमत चुकानी पड़ी, यह हमें आने वाले महीनों और वर्षों में पता चलेगा। इन बातों के बजाय मैं यहां पर कुछ बातें साझा करना चाहूंगा जो इस कानून के उद्भव के शुरुआती वर्षों से जुड़ी हुई हैं। यह कानून वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यवर्धित कर के समान है। 
 
इस समाचार पत्र समेत कई समाचार पत्रों ने जीएसटी की दास्तान वर्ष 2000 के आसपास शुरू की। इस आकलन में कम से कम 15 वर्ष की चूक है। सन 1970 के दशक में और सन 1985 तक देश के घरेलू अप्रत्यक्ष कर का ढांचा केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर विविध दरों का एक जाल था। उस दौर में सीमा शुल्क भी वैसा ही जटिल और खराब डिजाइन वाला था। अकेले केंद्रीय उत्पाद शुल्क में करीब 25 दरें थीं। सैकड़ों तरह की छूट और रियायतों की व्यवस्था थी और उत्पादन में इस्तेमाल कच्चे माल पर चुकाए गए कर के क्रेडिट जैसे वैट के मूल सिद्घांत पूरी तरह नदारद थे। जाहिर है आर्थिक किफायत, समता, सादगी और स्थिरता की हालत एकदम विचित्र थी। 
 
एल के झा के नेतृत्व वाली अप्रत्यक्ष कराधान जांच समिति की सन 1978 की रिपोर्ट में करों के इस संजाल की समीक्षा की गई। इसकी सबसे अहम अनुशंसाओं में एक थी केंद्रीय उत्पाद शुल्क के स्थान पर विनिर्माण स्तर पर वैट लगाने की। इसे मैनवैट का नाम दिया गया। तमाम अच्छी सरकारी रिपोर्ट की तरह यह भी आठ साल तक धूल फांकती रही। राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में विश्वनाथ प्रताप सिंह के वित्त मंत्री बनने के बाद देश में आधुनिक कर सुधार शुरू हुए। सन 1985 में अपने पहले बजट में उन्होंने प्रत्यक्ष कर से जुड़े बड़े सुधार अपनाए और दीर्घावधि की राजकोषीय नीति संबंधी वक्तव्य (एलटीएफपी)को लेकर प्रतिबद्घता जताई। 
 
यह संयोग ही है कि मैंने फरवरी 1985 में आर्थिक सलाहकार के रूप में वित्त मंत्रालय में प्रवेश किया। मैं नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी से वहां पहुंचा था। कुछ सप्ताह के भीतर तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार बिमल जालान ने मुझे एलटीएफपी दस्तावेज बनाने वाले प्रमुख अधिकारी की भूमिका सौंप दी। मेरे लिए यह एक अवसर था कि मैं अपने अकादमिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय अनुभव को देश की राजकोषीय नीति निर्माण की जमीन पर परखूं। जालान के उत्कृष्टï नेतृत्व और बौद्घिक मार्गदर्शन में हमने राजस्व और व्यय विभाग के अहम साथियों और प्रधानमंत्री कार्यालय में मोंटेक सिंह आहलूवालिया के साथ तालमेल कायम करने में कामयाबी हासिल की। तीन महीने के भीतर हमने एलटीएफपी का मसौदा तैयार कर लिया। हमने तत्कालीन वित्त मंत्री के साथ एक के बाद एक बैठकों में इस पर पन्ना दर पन्ना चर्चा की। इस दौरान तत्कालीन वित्त सचिव एस वेंकटरमणन, राजस्व सचिव विनोद पांडे, प्रधानमंत्री कार्यालय से मोंटेक सिंह आहलूवालिया, खुद बिमल जालान और मैं मौजूद रहते। 
 
एलटीएफपी को दिसंबर 1985 में सदन में पेश किया गया। यह विशिष्टï नीतिगत दस्तावेज था जिसमें मध्यम अवधि के सार्वजनिक वित्त कार्यक्रम को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर नीति सुधार के विस्तृत एजेंडे से मिला दिया गया था। अप्रत्यक्ष कर संबंधी खंड में जिस प्रमुख सुधार का उल्लेख था उसे संशोधित वैट या मोडवैट का नाम दिया जाना था। इसका मुख्य लक्ष्य था प्रगतिशील ढंग से कच्चे माल को उत्पाद शुल्क और अन्य समकक्ष करों से राहत देना। यह काम केंद्रीय उत्पाद शुल्क ढांचे में व्यापक बदलाव की मदद से किया जाना था। दो महीने बाद वी पी सिंह के सन 1986 के बजट में केंद्रीय उत्पाद शुल्क के 37 चैप्टरों में मोडवैट लागू कर दिया गया। इस तरह वैट/जीएसटी की दिशा में देश में पहला कदम बढ़ा। इसके बाद वित्त मंत्रालय में बिताए 15 वर्ष (इसमें आखिरी 8 वर्ष बतौर सीईए) के दौरान मैंने कर नीति सुधार में रुचि बनाए रखी। इस दौरान मुझे अधिकांशत: सहयोगी वित्त मंत्री तथा वित्त एवं राजस्व सचिव ही मिले। जहां तक बात वैट/जीएसटी की है तो चीजें खुद सुसंगत होती गईं। मोडवैट को समूचे केंद्रीय उत्पाद क्षेत्र तक विस्तारित कर दिया गया। सैकड़ों की तादाद में रियायतें समाप्त कर दी गईं। उत्पाद शुल्क की तमाम दरों को कम किया गया। सन 1994 में सेवा कर की शुरुआत की गई और इसका दायरा तेजी से बढ़ाया गया। 
 
वर्ष 2000 तक राज्य बिक्री कर को वैट फॉर्मैट में लाने की बड़ी पहल की शुरुआत कर दी गई। इस लंबे सफर में सन 1999-2000 में यशवंत सिन्हा का बजट तैयार करते वक्त मेरे लिए एक व्यक्तिगत मोड़ आया। हमेशा की तरह बजट समूह की लंबी बैठकें चला करतीं। इसमें वित्त मंत्री, सचिव और सीईए शामिल होते। अप्रत्यक्ष कर नीति से संबंधित ये बैठकें विशेष रूप से बनाए गए कक्ष में होतीं। यहां केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के आयुक्त और उसकी शोध टीम मौजूद होती। उस वक्त इस पद पर टी आर रस्तोगी थे जो सुधारवादी मानसिकता के व्यक्ति थे।
 
हम उत्पाद शुल्क की दरों को कम करने के रास्ते तलाश कर रहे थे। मैं कुछ ऐसे स्वीकार्य नियम तय कराने में कामयाब रहा जिसके चलते इसकी 11 प्रमुख दरों को (जो 5 से 40 फीसदी थीं) कम करके 8, 16 और 24 फीसदी की तीन दरों में परिवर्तित किया जा सका। इसके अलावा कुछ विलासिता की वस्तुओं पर 6 और 16 फीसदी की अतिरिक्त विशिष्ट दर लगाई गई। अगले वर्ष यानी सन 2000 में यशंवत सिन्हा के नेतृत्व वाले बजट समूह ने इन तीनों दरों को 16 फीसदी की एकल सेनवैट दर में शामिल कर दिया। इसके साथ 8, 16 और 24 तीन विशेष दरें भी थीं जिन पर कोई रियायत नहीं थी।
 
निश्चित तौर पर 1 जुलाई 2017 को जीएसटी की मंजिल तक पहुंचने के क्रम में सन 2000 से अब तक कई अन्य कदम उठाए गए। इस दौरान समझौते भी हुए, संसद और राज्य विधानसभाओं में जरूरी कानूनी बदलाव किए गए और सबसे बड़ी बात जीएसटी परिषद में सहमति तैयार की गई। लेकिन इसकी शुरुआत वर्ष 2000 से बहुत पहले हो चुकी थी। मुझे भी इस पूरी दास्तान में एक छोटी सी भूमिका निभाने का श्रेय हासिल है।
 
(लेखक इक्रियर में मानद प्रोफेसर और देश के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं। )
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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