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जी-20 समूह और विश्व व्यवस्था में विखंडन

श्याम सरन /  July 18, 2017

वैश्विक नेताओं ने अन्य सम्मेलनों की तरह जी-20 सम्मेलन में भी  'सशक्त, संतुलित एवं समावेशी विकास' के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई पर उसे हासिल कर पाना मुश्किल नजर आ रहा है। बता रहे हैं श्याम सरन

 
एक विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय मंच के तौर पर जी-20 की भूमिका एक ऐसी दुनिया में लगातार कम हो रही है जो भूमंडलीकरण के दुष्प्रभावों का सामना कर रही है। आर्थिक ठहराव, चौतरफा बेरोजगारी, बढ़ती असमानता और संघर्षपूर्ण इलाकों से बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापन की वजह से इस दुनिया में राजनीतिक एवं सामाजिक तनाव की स्थिति देखी जा रही है। ऐसे में जी-20 सम्मेलन के आयोजक शहर हैम्बर्ग की सड़कों पर विरोध के नजारे भी देखने को मिले। इस विरोध का हिंसा और आगजनी के स्तर तक पहुंचना वैश्विक नेताओं के जमावड़े के खिलाफ उनके प्रतिपक्ष को बयां कर रहा था। ये नेता 'अंतर-संबद्ध विश्व को आकार देने' पर चर्चा के लिए इक_ïा हुए थे। हैम्बर्ग की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे लोग चाहते थे कि दुनिया की अंतर-संबद्धता में कमी आए, न कि बढ़े। 
 
बहरहाल भूमंडलीकरण अपनी चमक खो चुका है और जी-20 के नेता भी लोगों को यह आश्वस्त करने में नाकाम रहे कि यह संगठन विभिन्न देशों के समक्ष मौजूद चुनौतियों से निपट पाने का अब भी सबसे सशक्त मंच बना हुआ है? यह बहुराष्ट्रीय सम्मेलन मौजूदा विश्व की चुनौतियों से निपटने की दिशा में उठाए गए समन्वित कदमों के लिए सुर्खियों में नहीं आया। इसके स्थान पर सम्मेलन में पहुंचे कुछ शीर्ष नेताओं की एक-दूसरे के साथ हुई मुलाकातों ने इसे सुर्खियां दिलाईं। रूस के  राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन की अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के साथ हुई मुलाकात हो या ट्रंप की चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ मुलाकात रही हो, उन्हें कहीं अधिक तवज्जो मिली। इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स नेताओं की एक बैठक में चिनफिंग से हाथ मिलाना भी यह उम्मीद जगा गया कि इससे भारत एवं चीन के बीच डोकलाम मुद्दे पर बना गतिरोध दूर करने में मदद मिलेगी।
 
पुतिन और ट्रंप की यह पहली बैठक थी और करीब दो घंटे तक चली। इससे यह उम्मीद जगी कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका के साथ रूस के रिश्ते सकारात्मक दिशा में बढ़ेंगे। सीरिया में संघर्ष-विराम पर हुआ समझौता इस दिशा में उठाया गया उत्साहवद्र्धक कदम है। हालांकि अमेरिकी प्रशासन लगातार रूस के प्रति विरोधी रवैया अपनाए हुए है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की जीत सुनिश्चित करने के लिए रूस के दखल देने की जानकारी सार्वजनिक होने से भी खटास बढऩे की आशंका थी। यह साफ है कि ट्रंप ने रूस के साथ रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता कायम रखी है और भारत के नजरिये से यह काफी अच्छी खबर है। रूस के चीन की तरफ कम झुकाव रखने से भू-राजनीति का पलड़ा हमारी तरफ झुक सकता है।
 
लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो रूस और चीन की जुगलबंदी और भी मजबूत होगी। जी-20 सम्मेलन में जाने के पहले चिनफिंग मॉस्को में थे जहां उन्होंने कहा कि रूस-चीन संबंध इतिहास के अपने सर्वश्रेष्ठ दौर से गुजर रहे हैं। रूस के साइबेरिया इलाके से प्राकृतिक गैस लाने वाली 'पावर ऑफ सर्बिया' पाइपलाइन के जरिये चीन को दिसंबर 2019 से गैस आपूर्ति किए जाने की घोषणा ने इस बयान पर एक तरह से मुहर लगा दी। इसके अलावा दूसरी 'पावर ऑफ सर्बिया' पाइपलाइन बिछाने पर भी दोनों देशों ने सहमति जताई है। रूस और चीन ने वन बेल्ट वन रोड अभियान के तहत कई परियोजनाओं के लिए 10 अरब डॉलर का एक साझा निवेश कोष भी बनाने का ऐलान किया है। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भी ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता संपन्न करने के बाद हैम्बर्ग पहुंचे थे। इससे पता चलता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और कारोबार में अमेरिका और ब्रिटेन (ब्रेक्सिट के बाद) किस हद तक पराये हो चुके हैं?
 
ट्रंप-चिनफिंग मुलाकात भी इस मायने में अहम थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति की नजर में उत्तर कोरिया को काबू में रखने के लिए चीन पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है। अमेरिका की मिसाइल-रोधी सुरक्षा प्रणाली 'थाड' पहले ही दक्षिण कोरिया में तैनात की जा चुकी है लेकिन चिनफिंग और पुतिन दोनों ही इस पर गहरा एतराज जता चुके हैं। ट्रंप ने साफ कहा कि अगर चीन उत्तर कोरिया पर रोक लगा पाने में नाकाम रहा तो कोरिया के परमाणु एवं मिसाइल खतरे को दूर करने के लिए अमेरिका एकतरफा कार्रवार्ई कर सकता है। ट्रंप की इस घोषणा के तत्काल बाद दक्षिण कोरिया में तैनात अमेरिकी बमवर्षक विमान तैयारी करते हुए दिखे। पूरी संभावना है कि कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव बढऩे की स्थिति में चीन-अमेरिका के रिश्तों में तीव्र गिरावट आ सकती है। उस स्थिति में डोकलाम पर बनी गरमागर्मी शांत हो सकती है। वैसे यह महज एक सुकूनदायक सोच भी साबित हो सकती है। 
 
ऐसे मुद्दों के दबदबे वाले सम्मेलन में आखिर उसके घोषित एजेंडा को किस हद तक हासिल किया जा सका? वैश्विक नेताओं ने अन्य सम्मेलनों की तरह यहां भी  'सशक्त, संतुलित एवं समावेशी विकास' के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई लेकिन उसे हासिल कर पाना खासा मुश्किल नजर आ रहा है। मसलन, हैम्बर्ग कार्य योजना में यह स्वीकार किया गया है कि 2014 में ब्रिसबेन में हुए सम्मेलन के वर्ष 2018 तक दौरान वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2 फीसदी बढ़ोतरी का जो लक्ष्य घोषित किया गया था, उसे आर्थिक प्रगति एवं रोजगार संभावनाएं बढऩे के बावजूद हासिल कर पाना मुमकिन नहीं है। कमजोर उत्पादकता बढ़ोतरी, आय असमानता और बूढ़ी होती जनसंख्या के चलते लंबी अवधि में आर्थिक प्रगति में गिरावट का गंभीर खतरा बना हुआ है।
 
दुनिया के शीर्ष नेताओं ने प्रतिस्पद्र्धी अवमूल्यन की दिशा में आगे नहीं बढऩे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहरायी और विनिमय दरों में बदलाव से परहेज करने की भी बात कही। आम तौर पर हरेक जी-20 सम्मेलन में यह पक्ष दोहराया जाता रहा है और इस बार भी यही हुआ। हालांकि व्यापार और जलवायु परिवर्तन के मामले में यह संगठन पिछड़ता हुआ नजर आ रहा है। मसलन, लगातार कई सम्मेलनों से संरक्षणवाद से लडऩे की बात कही जाती रही है और वर्ष 2018 के अंत तक संरक्षणवादी तौर-तरीकों को खत्म करने का भी स्पष्ट जिक्र होता रहा है। लेकिन हैम्बर्ग सम्मेलन के बाद जारी विज्ञप्ति में इस घोषणा को दोहराया नहीं गया। इसके बजाय संरक्षणवाद के खिलाफ संघर्ष को यह कहते हुए कमतर किया गया है कि कारोबार सुरक्षा के वैध तरीकों की भूमिका को स्वीकार किया गया है। इसका मतलब है कि ट्रंप इस अहम मसले पर अपनी बात मनवाने में सफल रहे।
 
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर हैम्बर्ग कार्य योजना में यह स्वीकार किया गया है कि अमेरिका पेरिस समझौते से अलग हो रहा है लेकिन बाकी देश इस समझौते पर अमल के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह पहला मौका है जब किसी सम्मेलन में उभरे मतभेद के स्वरों को भी अंतिम वक्तव्य में अलग-अलग रेखांकित किया गया है। यह वैश्विक शासन ढांचे में उभर रहे विखंडन का एक और संकेत है। भारत इस बात से राहत महसूस कर सकता है कि आतंकवाद के खिलाफ उसके कड़े रवैये को अन्य देशों का भी समर्थन मिला और अंतिम ïवक्तव्य में भी उसे पूरी तवज्जो दी गई। हालांकि इसके अलावा किसी अन्य मोर्चे पर भारत को खास कामयाबी नहीं मिली।
 
विभिन्न देशों को घरेलू स्तर पर सुधारात्मक उपायों को लागू करने के मोर्चे पर हुई प्रगति का अगर आकलन किया जाए तो आश्चर्य होता है कि जीएसटी को भारत की महत्त्वपूर्ण आर्थिक उपलब्धि के तौर पर मान्यता क्यों नहीं दी गई? केवल कारोबारी सुगमता की दिशा में किए गए प्रयासों और वित्तीय बाजार सुधार के लिए किए गए कुछ वित्तीय उपायों पर अमल का ही सांकेतिक तौर पर जिक्र किया गया। जी-20 के कामकाज का बड़ा हिस्सा अब भी तकनीकी समूहों में संचालित होता है और मुख्य रूप से ओईसीडी सचिवालय से निर्देशित होता है। यह साफ नहीं है कि ओईसीडी देशों के लिए विकसित मानकों के भारत पर असर का सही तरह से आकलन हुआ है या नहीं। इससे यह भी साफ हो जाएगा कि क्या ओईसीडी के साथ भारत के निकट संपर्क का वक्त आ चुका है?
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं और फिलहाल सीपीआर के वरिष्ठ अध्येता एवं निदेशक मंडल सदस्य हैं) 
Keyword: G20, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी20 शिखर सम्मेलन,
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