बिजनेस स्टैंडर्ड - एसएमई पर मार
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एसएमई पर मार

संपादकीय /  July 18, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के समग्र प्रभाव का अंदाजा लगाने की कोशिश फिलहाल जल्दबाजी होगी। निश्चित रूप से इस कर प्रणाली का क्रियान्वयन उम्मीद के मुताबिक गतिरोध पैदा करने वाला रहा है लेकिन इससे व्यापक स्तर पर अराजकता की स्थिति नहीं पैदा हुई है। इससे सरकार खुश हो सकती है लेकिन उसे सतर्क भी रहना होगा। एक संपूर्ण कर प्रणाली नहीं होते हुए भी जीएसटी एक महत्त्वपूर्ण प्रगति है और इसमें एक वास्तविक रूप से परिवर्तनकारी सुधार साबित होने के बीज विद्यमान हैं। 

 
हालांकि जीएसटी के कुछ प्रभावों पर सरकार को नजर रखनी होगी, खास तौर पर छोटी एवं मझोली इकाइयों (एसएमई) पर जीएसटी के असर पर गौर करना होगा। कई रिपोर्ट में कहा गया है कि जीएसटी के चलते औपचारिक एवं कर भुगतान क्षेत्र का दायरा बढऩे की संभावना है लेकिन इस बदलाव का बोझ असंगत रूप से एसएमई को उठाना पड़ सकता है। एसएमई क्षेत्र को भारत की आर्थिक प्रगति एवं रोजगार का इंजन माना जाता रहा है। वैसे एसएमई के लिए यह साल काफी बुरा रहा है। पिछले नवंबर में नोटबंदी के ऐलान ने नकदी की प्रधानता वाले अनौपचारिक क्षेत्र पर सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई थी। कई एसएमई कंपनियों के पास कामकाजी पूंजी भी नहीं रह गई थी। ऑर्डर में अचानक तीव्र गिरावट आने से अधिक कमजोर कंपनियों को या तो अपना कामकाज समेटना पड़ा या ताला ही लगाना पड़ गया। हालांकि भारत के अनौपचारिक क्षेत्र या उसकीछोटी इकाइयों के बारे में सटीक आंकड़े जुटा पाने में कठिनाई होने से यह नहीं पता चल पाया कि नोटबंदी ने एसएमई को किस हद तक प्रभावित किया था। लेकिन औद्योगिक संगठनों या भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र की तरफ से जारी आंकड़े अधिक उत्साहजनक तस्वीर नहीं पेश करते हैं। 
 
नोटबंदी के एक अच्छे या बुरे विचार होने के साथ ही अपना लक्ष्य हासिल कर पाने में इसकी कामयाबी को लेकर असहमति हो सकती है लेकिन इस पर असहमति नहीं हो सकती है कि इसके लिए भयावह वक्त चुना गया था। सरकार को मालूम था कि एक साल से भी कम समय में जीएसटी लागू होने जा रहा है और यह भी स्पष्ट था कि एसएमई कंपनियों के लिए खुद को उसके हिसाब से खुद को ढाल पाना बेहद मुश्किल होगा। लेकिन इन आशंकाओं से बेअसर नीति-निर्माताओं ने नोटबंदी की राह पर आगे बढऩे का ही फैसला किया। इससे अर्थव्यवस्था की सेहत के प्रति उसके चलताऊ रवैये का भी पता चलता है जो परेशानी में डालने वाला और निराशाजनक है। 
 
अगर नोटबंदी के ऐलान का समय राजनीतिक वजह (उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले अनुकूल माहौल बनाने के मकसद) से तय हुआ था तो उससे उन समस्याओं से कोई राहत नहीं मिली है जिन्हें लक्षित कर इसकी घोषणा की गई थी। असल में इस फैसले से ये मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ ही गईं। यह साफ है कि एसएमई क्षेत्र पर अतिरिक्त ध्यान देने की जरूरत है। एसएमई को तवज्जो देते समय लोकप्रियतावादी नीतियां नहीं अपनाई जानी चाहिए। कर दायरे में शामिल हो चुकी छोटी कंपनियों के लिए कारोबार को सुगम बनाने के अतिरिक्त प्रयास किए जाने चाहिए। ऐसी रिपोर्ट आ रही हैं कि जीएसटी लागू होने के बाद बहुत छोटी कंपनियां आपूर्ति शृंखला से बाहर रह जा रही हैं। इस समस्या का परीक्षण कर उसे दूर करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 
 
सरकार और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने ऐसे संकेत दिए हैं कि अधिक लोगों को रोजगार देने के बजाय उसका जोर एसएमई क्षेत्र में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने पर है। ऐसी स्थिति में सरकार को उन अवरोधों की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए जो उसके कई फैसलों एवं नीतियों के चलते पैदा हुए हैं। साथ ही सरकार को एसएमई क्षेत्र के लिए अनुकूल हालात बनाने पर भी ध्यान देना होगा। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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