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ट्रक पर रिपोर्टिंग : जीएसटी से आवाजाही का घटा समय, टोल झंझट से राहत नहीं

एन सुंदरेश सुब्रमण्यन और साहिल मक्कड़ / नई दिल्ली/शामलाजी/चंडीगढ़ 07 17, 2017

बिज़नेस स्टैंडर्ड के संवाददाताओं ने जीएसटी लागू होने के बाद जमीन पर इसके असर का जायजा लेने के लिए दिल्ली से दो अहम हाईवे पर ट्रक से किया सफर ...
सीमा पर नाकों का हाल

दिल्ली-हरियाणा (पंजाब की तरफ) : आसानी से प्रवेश और निकासी
हरियाणा-पंजाब : चेकिंग नहीं
पंजाब-चंडीगढ़ : नाका सक्रिय
दिल्ली-हरियाणा : आसानी से प्रवेश और निकासी
हरियाणा-राजस्थान (शाहजहांपुर) : चेकिंग नहीं
राजस्थान-गुजरात : पारगमन पास की पुष्टि के लिए नाका मौजूद

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू होने से सामान की आवाजाही में लगने वाला समय घटा है। लेकिन समय की यह बचत उतनी भी नहीं है जितनी होनी चाहिए थी या फिर जितने का दावा किया जा रहा है। समय बचने का असली वजह लालफीताशाही में कमी नहीं है बल्कि अवैध ट्रांसपोर्टर फिलहाल सड़कों से दूर हैं जिससे यातायात कम हो गया है। सवाल उठता है कि सामान की आवाजाही के समय में 15-20 फीसदी कटौती का वादा क्या कभी पूरा हो पाएगा।

बिज़नेस स्टैंडर्ड के संवाददाताओं ने जीएसटी लागू होने के बाद जमीनी स्तर पर बदलाव की पड़ताल करने के लिए दिल्ली से दो अलग-अलग दिशाओं में ट्रकों में सफर किया और इस दौरान 6 अंतरराज्यीय सीमाओं का हाल जाना। साथ ही हमने दिल्ली के दो व्यस्त प्रवेश बिंदुओं कालिंदी कुंज और बदरपुर बॉर्डर की स्थिति का भी जायजा लिया। उत्तर प्रदेश से आने वाले वाहन कालिंदी कुंज से और फरीदाबाद से आने वाले वाहन बदरपुर बॉर्डर से राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश करते हैं।

दिल्ली से चंडीगढ़ की 250 किलोमीटर लंबी यात्रा 6 घंटे में पूरी हुई। इस दौरान हमने रास्ते में दिल्ली-हरियाणा, हरियाणा-पंजाब और पंजाब-चंडीगढ़ सीमा पर वस्तुस्थिति की पड़ताल की जबकि दिल्ली-मुंबई मार्ग पर यात्रा के दौरान रजोकरी में दिल्ली-हरियाणा सीमा, शाहजहांपुर में हरियाणा-राजस्थान सीमा और शामलाजी में राजस्थान-गुजरात सीमा का हाल देखा। दिल्ली-मुंबई मार्ग का सफर दिल्ली-चंडीगढ़ से करीब तीन गुना ज्यादा यानी 793 किमी था लेकिन इसमें 6 गुना ज्यादा समय यानी 36 घंटे लग गए।

इन 6 सीमा नाकों में से गुजरात और पंजाब में दो नाके अब भी काम कर रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जीएसटी के लागू होने से सामान की आवाजाही में मामूली फर्क पड़ा। लेकिन जीएसटी का असर अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई दिया। दर्जनों ट्रक चालकों, ढाबा मालिकों, दुकानदारों और सहायक सेवा प्रदाताओं से बातचीत से पता चला कि जीएसटी से कारोबार की रफ्तार को भारी झटका लगा है। अवैध कारोबार थमने से यातायात में 40 से 70 फीसदी तक की कमी आई है जिससे ट्रकों की आवाजाही तेज हो गई है। लेकिन विभिन्न अंतराज्यीय सीमाओं पर नाकों के खत्म होने से होने वाले अनुमानित फायदा सभी को समान रूप से नहीं मिल रहा है। टोल प्लाजा पर डिजिटल भुगतान प्रणाली और ड्राइवर की जेब जैसे गैर जीएसटी कारकों से आवाजाही का समय अब भी प्रभावित हो रहा है। नाकों और बिक्री कर निगरानी में लगने वाला समय बहुत कम है और कभी-कभी तो नगण्य भी है। अलबत्ता ट्रक चालकों, उनके सुपरवाइजरों और कर्मचारियों का कहना है कि नई व्यवस्था के बारे में जानकारी के अभाव और यातायात में कमी के कारण आवाजाही के समय में कटौती हुई है।

सड़कों से दूर है अवैध कारोबार

हमें ट्रक से चंडीगढ़ ले जाने वाले चालक मोहम्मद ने कहा, 'पिछले 15 दिनों में दो चीजें बदली हैं। बिना बिल के सामान की अवैध आवाजाही पूरी तरह रुक गई है और नाकों पर कोई कतार नहीं है।' दिल्ली-मुंबई मार्ग पर ट्रक चलाने वाले रघु ने कहा कि मुंबई में सामान उतारने के बाद ट्रकों को 3 से 8 दिन इंतजार करना पड़ रहा है क्योंकि वापसी के लिए उनके पास सामान नहीं है। इस रूट पर चलने वाले नगेंदर ने कहा कि लोग केवल चावल और नमक जैसा सामान भेज रहे हैं जो जीएसटी के असर से अछूते हैं। पंजाबी बाग की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के ट्रैफिक मैनेजर ने बताया कि जीएसटी लागू होने के बाद पहले दो हफ्ते 90 फीसदी लोगों ने सामान ही नहीं भेजा। वे अभी देखो और इंतजार करो की नीति अपना रहे हैं। 

पंजाबी बाग ट्रांसपोर्ट सेंटर की कंपनी ओकरा रोडलाइंस के मालिक जिज्ञासु वाधवा ने कहा, 'आवाजाही का समय इसलिए कम हुआ है क्योंकि यातायात कम है। लेकिन ट्रकों के खड़े रहने का समय बढ़ा है क्योंकि बुकिंग बहुत कम हो रही है। इससे मालभाड़ा बेहद प्रभावित हुआ है।' विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रकों का किराया 10 से 15 फीसदी कम हो गया है। इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग में सीनियर फेलो एस पी सिंह ने कहा कि ई-वे बिल के बिना जीएसटी को लागू करने से इसकी आत्मा निकल गई है। कागज पर जीएसटी को लागू कर दिया गया है लेकिन जमीनी स्तर पर यह अब भी पुरानी व्यवस्था पर काम कर रहा है। ई-वे बिल व्यवस्था के लागू होने के बाद कानून का पालन कराने वाली एजेंसियों के पास डिजिटल टूल होने चाहिए ताकि वे 50,000 रुपये से अधिक के सामान की मौके पर ही जांच कर सकें।

सिंह ने कहा कि देश में करीब 45 लाख ट्रक हैं। अगर पुराने वाहनों और छोटे व्यावसायिक वाहनों को भी मिला लिया जाए तो यह संख्या 60 लाख तक हो सकती है। इनमें से 13 लाख के पास पूरे देश में चलाने का परमिट है जबकि 10 लाख के पास दो राज्यों में चलाने का परमिट है। उन्होंने कहा कि ट्रांसपोर्ट का एक उल्लेखनीय हिस्सा अवैध कारोबार है। जीएसटी लागू होने के बाद ऐसे वाहन सड़कों से दूर हैं। करीब 40 लाख वाहन एक ही राज्य के भीतर चलते हैं। सिंह ने कहा कि राज्यों के भीतर अवैध कारोबार फिर से शुरू हो गया है क्योंकि एक ही राज्य के भीतर चलने में जीएसटी का कोई असर नहीं है। राज्यों के भीतर करीब 80 फीसदी अवैध कारोबार बहाल हो चुका है पर करीब 40 फीसदी अवैध कारोबार सड़कों से दूर है। 

कालिंदी कुंज में प्रवेश शुल्क वसूलने का काम देख रहे बी एन तिवारी ने कहा कि यातायात में काफी कमी आई है। नोएडा से आ रहे एक ट्रक के ड्राइवर जावेद ने कहा कि उनकी कंपनी के पास 100 ट्रक हैं लेकिन उनमें से केवल 30 को ही काम मिला है। कम यातायात के बावजूद कालिंदी कुंज और बदरपुर बॉर्डर से दिल्ली में प्रवेश करने पर अब भी 30 से 45 मिनट लगते हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के टोल के अलावा ट्रकों को दिल्ली नगर निगम का निगम कर और उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर हरित कर भी चुकाना पड़ता है। हाइवे टोल और निगम कर बदरपुर मेंं प्लाजा पर लिया जाता है जबकि ग्रीन टैक्स करीब 100 मीटर की दूरी पर खड़े कर्मचारी वसूलते हैं।

दिल्ली-मुंबई मार्ग पर करीब दो दर्जन हाइवे टोल प्लाजा हैं। ट्रक करीब 8,000 रुपये हाइवे टोल के रूप में देते हैं। जिस ट्रक में हमने सफर किया, उसकी कंपनी ने अपने ट्रकों पर फास्टैग लगाए हैं। ये टैग ट्रक के अगले शीशे पर लगाया गया है जिससे टोल का कैशलेस भुगतान होता है। दिल्ली से गुजरात सीमा के 36 घंटे के सफर में हमें करीब 15 टोल प्लाजा मिले लेकिन उनमें से केवल दो के पास ही टैग से टोल वसूलने की स्वचालित सुविधा थी। ट्रकों पर फास्टैग लगाया गया है लेकिन अधिकांश प्लाजा ऐसे ट्रकों की बढ़ती संख्या से निपटने में लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। कुछ टोल प्लाजा पर ऐसे ट्रकों के लिए समर्पित लेन है लेकिन अक्सर नकद भुगतान करने वाले ट्रक इनमें घुस जाते हैं जिससे यातायात बाधित होता है। अगर एक से अधिक फास्टैग लेन है तो अक्सर एक ही मशीन को अलग-अलग लेन में ले जाया जाता है। उदयपुर और खेरवाड़ा के बीच पडूना टोल प्लाजा पर मौजूदा कर्मचारी टैग को पढ़ नहीं पाए और हमारे ड्राइवर नगेंदर को 405 रुपये नकद चुकाने पड़े। 

मनाली ट्रांसपोर्ट कंपनी के मालिक धीरज गुप्ता ने कहते हैं कि दिल्ली पंजाब हाइवे पर उत्पाद कर के लिए पहला नाका अंबाला के निकट लालरू में है। उन्होंने कहा, 'अभी इसे हटाया नहीं गया है। अब भी वहां जांच हो रही है। अगर नाके नहीं हटाए गए तो फिर जीएसटी का मकसद ही नाकाम हो जाएगा।  हिमाचल प्रदेश में भी नाकों को नहीं हटाया गया है। हिमाचल प्रदेश में दूसरी समस्या यह है कि राज्य सरकार अब भी राज्य में प्रवेश के लिए फॉर्म 26ए दाखिल करने को कह रही है। अलग-अलग फॉर्म भरने की समस्या अब भी बरकरार है।' जब बिज़नेस स्टैंडर्ड ने लालरू का दौरा किया तो वहां नाका मौजूद था और राज्य सरकार के कर्मचारी ट्रांसपोर्टरों के बिलों पर स्टांप लगा रहे थे।

राज्य सरकार के एक कर्मचारी रमन सिंह ने कहा, 'हम इसलिए बिलों पर स्टांप लगा रहे हैं कि कारोबारी जब जीएसटीएन प्लेटफॉर्म पर रिटर्न दाखिल करें तो उन्हें कोई परेशानी न हो। इससे ड्राइवरों को दिक्कत नहीं होगी। मौजूदा व्यवस्था सितंबर तक जारी रहेगी। तब तक पूरा सॉफ्टवेयर और दूसरी चीजें काम करना शुरू कर देंगी।' गुजरात वैट कानून के तहत बहेती या पारगमन पास अनिवार्य था जो जीएसटी के तहत भी जारी है। गुजरात सीमा के करीब हर ढाबे पर बहेती काउंटर है। गुजरात-राजस्थान सीमा से करीब 50 किमी दूर परसाड में बहेती काउंटर चलाने वाले कृष्ण पाल सिंह के पास एक लैपटॉप और प्रिंटर है। उन्होंने कहा, 'नया फॉर्मेट पुराने फॉर्मेट की ही तरह है। इसमें हमें सीएसटी टिन नंबर के बजाय जीएसटी नंबर डालना होता है। बाकी चीजें वैसी ही हैं।'

उन्होंने कहा कि कुछ ड्राइवर इसे ले रहे हैं जबकि बाकी इसके बिना ही जा रहे हैं। इस कारोबार से उन्हें रोजाना 1,000 रुपये की कमाई होती थी लेकिन अब यह जल्द खत्म हो जाएगा। शमलाजी में गुजरात सरकार का नाका अब भी काम कर रहा है। कर अधिकारी ने हमें फॉर्म 405 दिखाया जिस पर बहेती बनाई गई है। पिछले फॉर्म में गुजरात वैट कानून का हवाला दिया गया था जबकि नए फॉर्म में गुजरात वस्तु एवं सेवा कर कानून, 2017 की धारा 68 का उल्लेख है।

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