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फंसा हुआ कर्ज और गोलमाल का चक्र

देवाशिष बसु /  July 17, 2017

जून के मध्य में आरबीआई ने कहा था कि फंसे हुए कर्ज के 12 चुनिंदा मामलों को एनसीएलटी में फास्ट टै्रक पर चलाया जाए। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु

 
एक वर्ष से कुछ अरसा पहले मई 2016 में मैंने एक आलेख लिखकर फंसे हुए कर्ज से निपटने की नई व्यवस्था की खामियों पर अंगुली उठाई थी। दिवालियापन के लिए एक नई नौकरशाही व्यवस्था कायम की जा रही थी जिससे केवल कानूनी जटिलताएं बढऩे का ही अनुमान लगाया जा सकता था। अब तो यही लग रहा है कि मैंने कुछ ज्यादा ही सहज अनुमान लगा लिए थे जबकि हालात ज्यादा बुरे होने की आशंका करनी चाहिए थी। वित्त मंत्रालय के आला अधिकारियों और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने तदर्थ उपाय अपनाना और समस्या से मामूली छेड़छाड़ करना जारी रखा। 
 
एस्सार स्टील के मामले में गुजरात उच्च न्यायालय ने इस मामले पर कुछ तीखी टिप्पणियां की हैं। जून के मध्य में आरबीआई ने कहा था कि वह चाहता है कि फंसे हुए कर्ज के 12 चुनिंदा मामलों की राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट (एनसीएलटी) में त्वरित सुनवाई कराने की बात कही थी। तीन सप्ताह बाद उन 12 कंपनियों में से एक एस्सार स्टील ने गुजरात उच्च न्यायालय का रुख किया। उसने वहां दलील दी कि आरबीआई का रुख मनमाना और भेदभाव वाला था। कंपनी को स्थगन आदेश हासिल करने में कामयाबी मिली। दो घंटे लंबी सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एस जी शाह ने कथित तौर पर आरबीआई के रुख को लेकर अपनी नाखुशी और आपत्ति जाहिर की। यह आपत्ति आरबीआई के इस रुख पर थी कि एनसीएलटी को दिवालिया मामलों को हल करने के लिए जरूरी अधिकार थे। 
 
उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा कि विभिन्न पक्षकार अदालत जाने को स्वतंत्र थे और अदालत को भी ऐसे मामलों की सुनवाई का पूरा अधिकार था। एक अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक एनसीएलटी की दिवालिया शक्तियों पर सवाल उठाते शाह ने परिहास में कहा था कि हो सकता है पेशेवर डिग्री धारी लोगों के पास यह क्षमता न हो कि वे कंपनियां चला सकें। उनका इशारा दिवालिया कंपनियों के प्रबंधन के लिए पेशेवरों की नियुक्ति से जुड़ा था। इसके बाद आरबीआई ने अप्रत्याशित ढंग से गलती स्वीकार करते हुए अदालत से कहा कि वह अपनी अधिसूचना से जुड़ा एक भूलसुधार जारी करेगी। इस पूरे प्रकरण के दूरगामी परिणाम हैं। 
 
ठ्ठवित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ने फंसे हुए कर्ज वाली 12 कंपनियों के खिलाफ साहसिक कदम उठाया लेकिन वह जल्दबाजी में उठाया गया कदम साबित हुआ। यह सुविचारित नहीं था और इस पर कानूनी प्रश्न उठाए जा सकते थे। ठ्ठहर उच्च न्यायालय देनदारी में चूक करने वालों के लिए एक राह खुली रखता है। दिवालिया प्रक्रिया को लेकर बहुत शेखी बघारी गई थी लेकिन कानून के जानकारों और शैक्षणिक जगत के लोगों द्वारा तैयार किए गए इस खाके में गहरी खामियां नजर आती हैं। 
 
ठ्ठयह इस बात का पहला संकेत है कि कैसे फंसे हुए कर्ज से निपटने की नई व्यवस्था जल्दी ही कानूनी दांवपेच में फंस जाएगी। ऐसे कई मामले तैयार हो जाएंगे और नई व्यवस्था कछुआ चाल चलने को मजबूर हो जाएगी। कम से कम बड़े खातों के मामलों में जहां तेज गति जरूरी है वहां तो ऐसा ही होगा। गत वर्ष जब इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) पारित हुआ था तब कहा गया था कि यह देश को कारोबारी सुगमता की दिशा में आगे ले जाने वाला एक और कदम है। भारत इस मामले में खासा पीछे है। मैंने पहले भी कहा है कि इस अधिनियम के जरिए आधी-अधूरी कार्रवाई ही पूरी हो रही है। नया अधिनियम राज्य की अधिक भागीदारी मांगता है। फंसे हुए कर्ज की बात करें तो यह मुख्य रूप से सरकारी बैंकों की उत्पत्ति है। यहां शीर्ष प्रबंधन की जवाबदेही उनके करियर की संभावनाओं से जुड़ी नहीं होती। न ही उनको कोई कानूनी परिणाम झेलने होते हैं। ऐसे में नए फंसे हुए कर्ज की आवक जारी रहेगी जबकि हम केवल पुराने कर्ज के निपटारे की बात कर रहे हैं।
 
एक ओर फंसा हुआ कर्ज निपटाया जा रहा है तो दूसरी ओर नया कर्ज बढ़ रहा है। देखते हैं कि बीते 30 साल में इस दिशा में क्या प्रयास किए गए हैं? औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (1987), कंपनी लॉ बोर्ड (1991), बैंकों और वित्तीय संस्थानों का कर्ज वसूली अधिनियम (1993) और वित्तीय परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण एवं पुनर्गठन तथा प्रतिभूति ब्याज के प्रवर्तन (सरफेसी) अधिनियम 2002 आदि ऐसे ही प्रयास हैं। 
 
इनके अलावा कथित बैंकिंग नियामक ने भी प्रयास किया लेकिन बिना किसी जवाबदेही के। वर्ष 2001 में कॉर्पोरेट ऋण पुनर्गठन, वर्ष 2014 में ज्वाइंट लेंडर्स फोरम, वर्ष 2015 में स्ट्रैटजिक डेट रिस्ट्रक्चरिंग और वर्ष 2016 में तनावग्रस्त परिसंपत्ति के स्थायी पुनर्गठन की योजना में से कुछ भी कारगर साबित नहीं हुआ। ऐसे में राज्य को दोबारा शामिल करना और एक नई कानून का इस्तेमाल करना सही नहीं प्रतीत होता। इसके अलावा आरबीआई की समिति को सीधे एनसीएलटी को कुछ मामले प्राथमिकता पर संभालने का निर्देश देना उचित नहीं लगता।
 
मैंने पिछले वर्ष कहा था कि नई व्यवस्था जल्दी ही सौदेबाजी, लंबी निष्क्रियता, गतिरोध भरे प्रस्तावों और हजारों अनसुलझे मामलों का सबब बनेगी। इस सबकी शुरुआत हो चुकी है। 
हल क्या है? एक साधारण लेकिन अधिक प्रभावी और सस्ता हल जो फंसे हुए कर्ज के बड़े मामले निपटाने में मदद करे। ऐसा हल बाजार आधारित रुख से ही हासिल किया जा सकता है। अधिकांश सफल और आर्थिक रूप से व्यवहार्य देश ऐसा ही करते हैं। 
 
इसमें न तो पहले ही अतिरिक्त बोझ से दबी न्याय व्यवस्था से कुछ चाहा गया है और न ही यह सही कदम उठाने की मानवीय भावना पर केंद्रित है। हमें केवल बाजार चाहिए जो तनावग्रस्त प्रतिभूतियों और उच्च प्रतिफल बॉन्ड का कारोबार संभाल सके। इससे साधारण मुद्दे एक झटके में हल करने में मदद मिलेगी। मामले का हल खरीदारों और विक्रेताओं पर छोड़ा जा सकता है बजाय कि अधिवक्ताओं और पेशेवरों के। अधिक से अधिक ऋण पत्रों के आकलन का काम रेटिंग एजेंसियों पर छोड़ दिया जाए। एक स्वचालित और बेहतर मूल्यांकन पद्घति हो जो फंसी हुई परिसंपत्तियों का आकलन करे। ओकट्री कैपिटल, जेसी फ्लावर्स, गोल्डमैन सैक्स और केकेआर जैसी फर्म से अरबों डॉलर जुटाए जा सकते हैं और सबसे अहम बात है कि इस प्रक्रिया में अक्षम प्रवर्तक आसानी से और तेजी से बाहर हो जाएंगे। इस प्रक्रिया में लागत कम आएगी और फंसे हुए कर्ज की समस्या का निस्तारण तेजी से होगा। बैंकों के नकदीकरण की प्रक्रिया भी तेज होगी। सवाल यह है कि हमने अब तक यह प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई? अकादमिक जगत के लोगों, अधिवक्ताओं, बैंकरों और अंकेक्षकों के निहित हितों को देखें तो कहा जा सकता है कि भला कौन इस गतिरोध वाली व्यवस्था को ठीक करना चाहेगा? 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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