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जीएसटी के 15 दिन बाद का हाल-ए-बाजार : छोटी फर्मों की मुश्किल बड़ी

वीणा मणि, दिलाशा सेठ और इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली 07 16, 2017

अरुण जेटली की अध्यक्षता में परिषद की बैठक आज

► छोटी और मझोली इकाइयों को हो रही है ज्यादा परेशानी
कीमतों को लेकर भ्रम की स्थिति में हैं कारोबारी
पंजीकरण, बिल अपलोड करने, रिटर्न दाखिल करने में उलझन

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के 15 दिन बाद भी छोटे और मझोले डीलरों तथा विनिर्माताओं को नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली से जुड़ी मुश्किलों से जूझना पड़ रहा है। इस बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली सोमवार को वीडियो कॉन्फ्रें सिंग के जरिये जीएसटी परिषद की 19वीं बैठक की अध्यक्षता करेंगे। जीएसटी लागू होने के बाद परिषद की यह पहली बैठक है। साथ ही जीएसटी से जुड़ा सूचना प्रौद्योगिकी नेटवर्क जीएसटीएन भी सोमवार से ही जीएसटी सुविधा प्रदाताओं (जीएसपी) को अपने साथ जोडऩे की सुविधा शुरू करेगा। यह सुविधा एक सप्ताह तक उपलब्ध रहेगी जिसके बाद करदाता सीधे अपने बिल अपलोड कर सकेंगे। कारोबारियों को जीएसटी के तहत पंजीकरण, बिल अपलोड करने और रिटर्न दाखिल करने की जानकारी देने के लिए जीएसपी को मोर्चे पर लगाया गया है। उनका कहना है कि बड़ी कंपनियों के बजाय छोटी और मझोली कंपनियों को जीएसटी के तहत समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

जीएसपी का काम कर रहे क्लियरटैक्स के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी अर्चित गुप्ता कहते हैं कि बड़ी कंपनियों ने जीएसटी के लिए पहले से ही पूरी तैयारी कर रखी थी जबकि छोटी कंपनियां इस बात को लेकर भ्रम में हैं कि अपने उत्पादों की कीमत दोबारा कैसे तय की जाए।

गुप्ता ने कहा कि जिन कारोबारियों ने कंपोजिशन स्कीम के विकल्प को चुना है, अगर वे गैर पंजीकृत आपूर्तिकर्ता से माल खरीदती हैं तो उन्हें रिवर्स चार्ज आधार पर कर का भुगतान करना पड़ेगा। इसके उलट अगर वे पंजीकृत आपूर्तिकर्ता से माल खरीदते हैं तो उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलेगा। इतना ही नहीं उन्हें अपने उत्पादों की कीमत भी कुछ इस तरह तय करनी होगी कि कंपोजिशन टैक्स के रूप में वे जो कर अदा करें उसका समायोजन हो सके। यह कीमत इस बात पर निर्भर करेगी कि वे किससे खरीदते हैं और उनका पुनर्मूल्यांकन कैसे होता है।

20 लाख रुपये सालाना कारोबार वाली इकाइयों को जीएसटी के तहत पंजीकरण की जरूरत नहीं है और सालाना 75 लाख रुपये तक बिक्री करने वाले कारोबारी कंपोजिशन स्कीम का विकल्प ले सकते हैं। इस योजना के तहत कारोबारी 1 फीसदी, विनिर्माता 2 फीसदी और रेस्त्रां कारोबारी 5 फीसदी कर दे सकते हैं।

गुप्ता ने कहा कि बड़ी संख्या में कारोबारी ट्रांजिशन फॉर्म दाखिल करने में उनकी कंपनी की मदद ले रहे हैं और अब तक उन्हें यह भी पता नहीं है कि उनके पास जो माल पड़ा है, उससे उनके क्रेडिट ऑफसेट पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा, 'कुछ खुदरा व्यापारी इस बात को लेकर भ्रम में हैं कि मौजूदा एमआरपी पर बिक्री जारी रखनी चाहिए या फिर नई कीमत तय करनी चाहिए। उन्हें इस बारे वितरकों की तरफ से कोई जानकारी नहीं मिली है।'

एक और जीएसपी के साकेत अग्रवाल ने कहा कि कारोबारियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती जानकारी की कमी है। उन्हें पता नहीं है कि रिटर्न कैसे दाखिल करना है और जीएसटीएन को क्या डेटा भेजना है और कब भेजना है। उन्होंने कहा, 'हम कारोबारियों और लघु, छोटी एवं मझोली इकाइयों को जीएसटी से जुड़े मुद्दों को समझने में मदद कर रहे हैं।'

डेलॉयट की सलोनी रॉय कहती हैं कि जीएसटी एक अहम कदम हैं लेकिन जीएसटीएन पोर्टल में अभी कई खामियां हैं। उन्होंने कहा, 'पंजीकरण के लिए दस्तावेज अपलोड करने में समस्या आ रही है। इसी तरह कारोबार के लिए एक अतिरिक्त जगह का विकल्प जोडऩे की सुविधा मौजूद नहीं है। हमें उम्मीद है कि बिल अपलोड करने में इस तरह की समस्या नहीं आएगी।' कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के महासचिव प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में मूल्य वर्धित कर के अधिकारियों ने जीएटीएन प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए करदाताओं को पासवर्ड नहीं दिया है।

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