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'फैसले के साथ तथ्य एवं वजह भी बताना जरूरी'

एमजे एंटनी /  July 16, 2017

उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता की एक अपील को दोनों पक्षों की गैर-मौजूदगी में ही खारिज करने के लिए बंबई उच्च न्यायालय को कड़ी फटकार लगाई है। उसने अपने एक फैसले में कहा है कि उच्च न्यायालय ने अपील को नकारने के पहले न तो तथ्यात्मक पहलुओं पर सही तरह से विचार नहीं किया और न ही किसी पक्ष के तर्कों को संज्ञान में लिया। यह मामला नवनिर्माण डेवलपमेंट कंसल्टेंट्स बनाम डिस्ट्रिक्ट स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स वाद का है। पुणे में इस खेल परिसर का निर्माण कार्य वर्ष 2005 में ही पूरा हो गया था लेकिन ठेका कंपनी को बिल का भुगतान नहीं किया गया था। ठेकेदार ने इस पर मध्यस्थता की मांग की लेकिन सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। बाद में उच्च न्यायालय ने मध्यस्थ की नियुक्ति की जिसने ठेकेदार के पक्ष में 25 लाख रुपये के भुगतान का आदेश दिया। जिला अदालत में मामला जाने पर उसने इस राशि को घटाकर सात लाख रुपये कर दिया जिसके बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा था। वहां पर जब ठेकेदार की अपील नकार दी गई तो उसने उच्चतम न्यायालय में गुहार लगाई जिसने अपीलीय याचिका के गुण-दोष के आधार पर विचार करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय को यह मामला जल्द निपटाने को भी कहा गया है। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है, 'उच्च न्यायालय से कम-से-कम यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह किसी भी मामले में फैसला देते समय कुछ तथ्य रखें और उसकी वजह बताएं। इससे शीर्ष अदालत उसकी वैधता का परीक्षण कर पाएगी।'

स्टील उत्पादों पर डंपिंग-रोधी शुल्क बरकरार
उच्चतम न्यायालय ने एक डंपिंग-रोधी मामले में उत्पाद, सीमा शुल्क एवं सेवा कर अपीलीय अधिकरण के उस आदेश को निरस्त कर दिया है जिसमें खास आकार के कोल्ड रोल्ड स्टेनलेस स्टील आयातकों को राहत दी गई थी। स्टेनलेस स्टील उद्योग के प्रतिनिधियों ने चीन, जापान, ताइवान और यूरोपीय संघ से आयात किए जाने वाले कोल्ड रोल्ड स्टेनलेस स्टील के बारे में तथ्यों को छिपाने का कुछ फर्मों पर आरोप लगाया था। उनका कहना था कि ये आयातक वर्ष 2010 की अधिसूचना में खामी का फायदा उठाते हुए डंपिंग-रोधी शुल्क से बचने में सफल हो जा रहे हैं। उनकी शिकायत के बाद एक और अधिसूचना जारी कर इस कमी को दूर करने की कोशिश की गई लेकिन आयातकों ने उसे अधिकरण के सामने चुनौती दे दी। अधिकरण ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए एंटी-डंपिंग शुल्क से राहत दे दी। उसके खिलाफ सीमा शुल्क (निर्यात) आयुक्त बनाम मैस्कट इंटरनैशनल वाद में उच्चतम न्यायालय में अपील की गई जिसने अधिकरण के फैसले को पलट दिया। अधिकरण ने वर्ष 2011 की अधिसूचना में शुल्क राहत के बारे में निर्दिष्ट प्रावधानों को ध्यान में नहीं रखा था।

भुगतान के बाद भी मध्यस्थता प्रक्रिया संभव
अगर कोई ठेकेदार भुगतान की रकम से संतुष्ट नहीं है तो वह बिल का भुगतान लेने के बाद भी मध्यस्थता का सहारा ले सकता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में इसे स्पष्ट करते हुए कहा है कि हिल का भुगतान स्वीकार कर लेने का मतलब यह नहीं माना जाना चाहिए कि सारे विवाद खत्म हो गए हैं। न्यायालय ने भारत संघ बनाम बागा ब्रदर्स वाद पर अपना फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की है। न्यायालय ने यह भी कहा है कि अगर भुगतान लेने की जल्दबाजी में ठेकेदार बिल को 'पूर्ण एवं अंतिम समाधान' के रूप में भी स्वीकार कर लेता है तो भी वह बाद में उसे मध्यस्थता के लिए ले जा सकता है। उच्चतम न्यायालय परिसर में कराए गए कार्यों के बाद सरकार की तरफ से जो बिल दिया गया उसे ठेकेदार फर्म ने स्वीकार कर लिया था। लेकिन बाद में इसे गैरवाजिब बताते हुए मध्यस्थता की मांग की। मध्यस्थता अधिकरण ने ठेकेदार के पक्ष में फैसला सुनाया जिसके खिलाफ सरकार ने उच्च न्यायालय में अपील की। न्यायालय ने कहा है कि बिल को सरकार ने तैयार किया था, न कि ठेकेदार ने। इसके अलावा मेलमिलाप एवं मध्यस्थता अधिनियम में मेलमिलाप को बाध्यकारी नहीं घोषित किया गया है।

वेबसाइट पर हर्जाना लगाने का आदेश
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बड़े पैमाने पर विभिन्न कंपनियों का खराब एवं नकली सामान बेचने वाली एक वेबसाइट पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। लग्जरी उत्पादों के डिजाइन, उत्पादन एवं बिक्री करने वाली कंपनी बरबेरी लिमिटेड की तरफ से दर्ज कराई गई शिकायत पर 99लेबल्स डॉट कॉम के खिलाफ जुर्माना लगाने का आदेश पारित किया गया। बरबेरी ने कहा था कि 99लेबल्स वेबसाइट उसके ट्रेडमार्क का इस्तेमाल करते हुए नकली एवं खराब सामान बेच रही है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि वेबसाइट की ऐसी हरकत से बरबेरी की वर्षों की मेहनत से कमाई गई साख पर असर पड़ा है। दोषी कंपनी पर न केवल मुआवजे की देनदारी बनती है बल्कि उसे दंडात्मक भरपाई भी करनी होगी।

नीलामी की रकम पर सरकार का पहला दावा
राजस्थान उच्च न्यायालय ने फिर कहा है कि बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों के सुरक्षित कर्जदाता होते हुए भी अगर किसी संपत्ति को कर्ज बकाया के चलते जब्त किया जाता है तो उससे मिलने वाली रकम पर पहला दावा सरकार का बनता है। जीएमसी इंजीनियर्स ऐंड कॉन्ट्रैक्टर लिमिटेड बनाम राजस्थान मामले में एसआर फॉयल्स ऐंड टिश्यू लिमिटेड को बिक्री कर विभाग ने जब्त कर लिया था। आईसीआईसीआई बैंक ने इस नाकाम कंपनी को कर्ज दिया था जिसकी वसूली के लिए उसने उस संपत्ति की नीलामी की और संपत्ति को सर्वाधिक बोली लगाने वाली कंपनी जीएमसी के सुपुर्द कर दिया। लेकिन सरकार ने उस नीलामी को अमान्य करते हुए अपने बकाये कर की वसूली के लिए उस संपत्ति की बिक्री की पेशकश कर दी। जीएमसी ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि प्रतिभूतिकरण अधिनियम और कर्ज वसूली अधिनियम के तहत सुरक्षित कर्जदाताओं को नीलामी में प्राथमिकता मिली हुई है। लेकिन न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया।

कॉपीराइट उल्लंघन में सुनवाई का अधिकार
बंबई उच्च न्यायालय ने मुंबई में पंजीकृत एक कंपनी के ट्रेडमार्क विवाद पर सुनवाई का अधिकार होने की बात कही है। कल्पतरू प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड और श्री कल्पतरू हाउसिंग प्राइवेट लिमिटेड के बीच ट्रेडमार्क नाम के इस्तेमाल को लेकर विवाद पैदा हो गया था। श्री कल्पतरू कंपनी का कहना था कि उच्च न्यायालय को इस मामले में विचार करने का अधिकार ही नहीं है क्योंकि उसका कार्यालय आंध्र प्रदेश में है लिहाजा केवल वहीं की अदालत इस मामले में सुनवाई कर सकती है। लेकिन न्यायालय ने इस दावे को नकारते हुए कहा कि ट्रेडमार्क अधिनियम और कॉपीराइट अधिनियम के तहत उसके पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार है। फैसले के मुताबिक ट्रेडमार्क या कॉपीराइट उल्लंघन से पीडि़त कंपनी अपने कारोबार की जगह या विरोधी कंपनी की मौजूदगी वाली जगह कहीं पर भी वाद दायर कर सकती है।

Keyword: Supreme court, steel, dumping duty,
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