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दिवालिया सुधार प्रक्रिया में बिक्री क्षेत्र की स्थिति

अजय शाह /  July 14, 2017

राजनीतिक नेतृत्व को एक ऐसी टीम तैयार करनी चाहिए जो दिवालिया सुधार पर काम करे और आने वाले वर्षों में बेहतर रिकवरी दर हासिल कर सके। इस विषय में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
देश में दिवालिया सुधार में मुख्य तौर पर बिक्री पर ध्यान केंद्रित रहा है। यानी ऐसी परिस्थितियां निर्मित करना जहां कर्ज देने वाले शेयर धारकों को बाहर करके फर्म को बेचने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं। हमें इस बात पर भी विचार करना होगा कि ऐसी कंपनी को खरीदेगा कौन। प्रमुख तौर पर इनके दो तरह के खरीदार होते हैं। उसी उद्योग की बड़ी फर्म और निजी इक्विटी फंड। शुरुआती कुछ वर्ष के दौरान तीन समस्याएं सामने आती हैं: देनदारी में पुरानी चूक, सीमित खरीदार और दिवालिया सुधार को लेकर शंका। इसकी वजह से कीमत कम मिलती है। यह खरीदार के लिए अच्छा और कर्जदार के लिए बुरा होता है। 
 
अतीत में अंशधारक कर्ज चुकाने में चूक करना पसंद करते थे और नियामक भी कर्जदाताओं को देनदारी में चूक छिपाने में मदद करते थे। नया कानून आने के बाद कर्जदारों को अधिकार मिल गया है कि वे अंशधारकों को परे हटा सकें। यह देश के ऋण बाजार में एक बड़ा कदम है। एक बड़ी बाधा यह है कि कई बार कर्जदार समझदारी का परिचय नहीं देते। इसका संबंध बैंकों और बीमा कंपनियों के तकनीकी रूप से दक्ष नियमन से है ताकि देनदारी में पहली चूक के एक साल में परिसंपत्ति मूल्य शून्य हो जाए। उसके बाद कर्जदार तत्काल घाटा दिखाना शुरू कर देते हैं। जबकि अभी दिवालियापन की प्रक्रिया पूरी होनी बाकी होती है। ऐसे में रिकवरी भविष्य की किसी तारीख में विशुद्घ लाभ के रूप में सामने आती है। इससे ऋणदाताओं को यह प्रोत्साहन मिलता है कि वे देनदारी में चूक के मौकों पर समझदारी का परिचय दें। आरबीआई और आईआरडीए इस समस्या से जूझ रहे हैं। 
 
एक बार दिवालिया प्रक्रिया का तंत्र काम करने लगे और कर्जदारों का नियमन सही हो जाए तो कई मामले सामने आने शुरू हो जाएंगे। लेकिन खरीदारों का क्या? दिवालिया प्रक्रिया दरअसल एक बाजार है जहां खरीदार और विक्रेता दोनों हैं। बाजार सही ढंग से काम करे इसके लिए आवश्यक है कि दोनों पक्ष काम करें। दो तरह के खरीदार हमारे सामने हैं: पहले वेे जो तत्कालीन समस्या के बीच ही फर्म को खरीदते हैं और दूसरे वे जो नकदीकरण की प्रक्रिया में इसे खरीदते हैं। 
 
अगर कोई कंपनी तत्काल देनदारी में चूकी हो तो उसे मौजूदा चिंता माना जाता है। इसमें संस्थागत पूंजी शामिल होती है जिसका मूल्य भौतिक परिसंपत्तियों की तुलना में कहीं अधिक होता है। अधिकांश मौजूदा चिंताओं के बीच भी कुछ हद तक नकदी बहाल करने में मदद मिल जाती है। इस नकदी की वजह होता है वह मूल्य जो कोई संभावित ग्राहक चुकता कर सकता है। सरकार कर्ज चुकाए जाने के बाद खरीदार 100 फीसदी नियंत्रण के बदले नकदी की पेशकश करता है। 
 
देनदारी में पहली चूक के बाद अगर समय बीत जाता है तो वित्तीय तनाव संस्थागत पूंजी को नष्टï कर देता है। फर्म का मूल्य तेजी से कम होने लगता है क्योंकि वित्तीय तनाव उत्पन्न हो जाता है और अंशधारकों को हासिल प्रोत्साहन फर्म को चलाए रखने के हालात नहीं रहने देता। जब देनदारी में पहली चूक के बाद देरी होना शुरू होती है तो संगठनात्मक पूंजी नष्टï हो जाती है। तब फर्म केवल चुनिंदा भौतिक परिसंपत्ति का जमावड़ा भर बनकर रह जाती है जिसका नकदीकरण कर दिया जाता है। यहां खरीदार परिसंपत्ति के बदले नकदी देने की पेशकश रखता है। 
 
कोई निजी इक्विटी फंड ही तात्कालिक संकट से जूझ रही फर्म का सही खरीदार होता है। खरीदार रियायती दर पर संकटग्रस्त फर्म को सही समय पर खरीदता है और संसाधनों के जरिये उसकी तकदीर सुधारने का प्रयास करता है। निजी इक्विटी फंड उस कारोबार को मुनाफे वाला बनाने का प्रयास करते हैं। शीर्ष 2000 सूचीबद्घ कंपनियां भी भी अपने-अपने क्षेत्र की संभावित खरीदार तो हैं ही। खरीदार ग्राहक आधार जुटाने, कुशल कर्मचारी और ब्रांड आदि मिलने पर ध्यान देता है। अगर आईबीसी लागू होती तो किंगफिशर 2009 में ही बिक जाती। उस वक्त जेट एयरवेज जैसे खरीदार उसकी कीमत लगा सकते थे। ऐसे खरीदार संगठनात्मक पूंजी को अलग तरह से देखते हैं। वे कई क्षेत्रों में अपनी आंतरिक प्रक्रिया लगाना चाहते हैं। 
 
दूसरा मामला है नकदीकरण का। यहां संगठनात्मक पूंजी समाप्त हो चुकी होती है और जो कुछ बेचा जाता है वह केवल भौतिक संपत्ति के लिए। यहां भी बढिय़ा खरीदार उक्त 2000 में  से ही होगा। उदाहरण के लिए अगर ब्रिटानिया किसी बेकरी की मशीन और जमीन सस्ते दाम पर खरीदे तो इसे समझा जा सकता है। यह उसके उत्पादन तंत्र का हिस्सा बन सकता है। 
शुरुआती वर्षों में मूल्यांकन कमजोर होगा। इसकी तीन वजह हो सकती हैं। पहली बाधा आईबीसी की कार्यप्रणाली से संबद्घ है। खरीदार आईबीसी को लेकर चिंतित हैं। क्या यह तंत्र उस तरह काम करेगा जैसे सोचा गया था? क्या लेनदेन सही ढंग से होगा? कहीं बाद में कानूनी अड़चन तो नहीं आएगी? ये अनिश्चितताएं खरीदार को बहुत नियंत्रित बोली लगाने पर विवश करती हैं। यह तभी दूर होगा जबकि दिवालिया सुधार से जुड़ी टीम विश्वसनीयता नहीं हासिल कर लेती। दूसरी बाधा खरीदार की क्षमता से ताल्लुक रखती है। देश में कई निजी पूंजी फंड हैं। इनको बड़ा होने में लंबा समय लगेगा। इसी तरह 200 सूचीबद्घ कंपनियों को भी फर्म खरीदने का ढांचा विकसित करने में लंबी अवधि लगेगी। तीसरी समस्या डिफॉल्ट कर रही फर्म से जुड़ी है। उसके डिफॉल्ट में जितना समय लगेगा मूल्यांकन उतना ही कम होगा। भारत में ऐसी ढेर सारी फर्म हैं जो अतीत में डिफॉल्ट कर चुकी हैं। मसलन सीएमआईई के डाटा बेस में मौजूद 15,000 गैर वित्तीय फर्म के आंकड़ों की बात करें तो 1000 का ब्याज भुगतान, ब्याज पूर्व लाभ से ज्यादा है। देनदारी में पुरानी चूक के मामले में नकदीकरण के अलावा कोई विकल्प नहीं। 
 
भारतीय दिवालिया सुधार की सफलता के आकलन का सबसे अहम तरीका है रिकवरी की दर। शुरुआती वर्षों में रिकवरी की दर कमजोर होगी। इसके लिए उपरोक्त वजह ही जिम्मेदार हैं। राजनीतिक नेतृत्व को एक टीम बनानी चाहिए जो दिवालिया सुधार पर काम करे ताकि आने वाले सालों में इस दर को बेहतर बनाया जा सके। 
पूर्ववर्ती प्रवर्तकों को भी निपटान प्रक्रिया में बोली लगाने का अवसर दिया जा सकता है। अगर कोई प्रवर्तक किसी डिफॉल्टिंग कंपनी का ऋण खत्म किए जाने के बाद उसमें 100 फीसदी हिस्सेदारी खरीदता है तो असहजता स्वाभाविक है। परंतु अगर प्रकिया खुली और निष्पक्ष हो तथा कई दलों को अवसर मिला हो तो इसमें कोई समस्या नहीं है। हमें इस प्रक्रिया के साफ-सुथरा होने की चिंता करनी चाहिए। लेकिन नतीजों को लेकर भावुक होने की आवश्यकता नहीं।
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