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अचल संपत्ति का असर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  July 14, 2017

बीते कुछ वर्ष के दौरान देश की अर्थव्यवस्था बैलेंस शीट के दोहरे संकट से जूझती रही है। यह संकट बैंकों और कंपनियों की बैलेंस शीट से ताल्लुक रखता है। पर्यवेक्षकों ने जिस एक बात को स्पष्टï रूप से नहीं माना है, वह है एक तीसरी बैलेंस शीट जो दबाव बना रही है। यह तीसरी बैलेंस शीट अमीर लोगों से जुड़ी हुई है। उनमें से कई लोगों ने अचल संपत्ति में निवेश किया है और इस क्षेत्र में मंदी, आधी-अधूरी परियोजनाओं और निर्माणाधीन परिसंपत्तियों का मूल्य लगातार गिरने के कारण वे अधर में हैं। कीमतें अब अपने उच्चतम स्तर से 25 फीसदी तक गिर चुकी हैं। दक्षिणी दिल्ली में तो कीमतों में अधिकतम मूल्य की तुलना में 40 फीसदी तक गिरावट आ चुकी है। जो अवांछित परिसंपत्ति से निजात पाने के लिए भारी कटौती करने के इच्छुक हैं, उनको भी कहीं कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। अचल संपत्ति क्षेत्र की कंपनियों के पास इतनी अधिशेष इमारतें हैं कि उनको बेचने में सामान्य बाजार परिस्थितियों में बहुत अधिक वक्त लग जाएगा। 

 
इसके दो परिणाम हुए हैं। पहला तो यह कि जिन लोगों की जेब में अतिरिक्त पैसा था, वे अचल संपत्ति बाजार से दूर चले गए और उन्होंने प्रत्यक्ष या म्युचुअल फंड के जरिये शेयर बाजारों में निवेश शुरू कर दिया। यही वजह है कि विभिन्न फंडों द्वारा प्रबंधित परिसंपत्तियों के मूल्य में 20 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली। यह भी एक वजह है जिसके चलते शेयर कीमतों में तेजी से इजाफा हो रहा है। बाजार सूचकांक ऐसे स्तर पर पहुंच चुके हैं जो कीमत आय अनुपात के ऐतिहासिक औसत से भी करीब 20 फीसदी बेहतर है। ऐसे मूल्यांकन को तभी उचित ठहराया जा सकता है जबकि कंपनी जगत में फिर से रफ्तार पकडऩे की संभावना हो। ऐसी स्थिति में ही आय बेहतर हो सकती है। परंतु ऐसी राय रखने वाले टीकाकारों की तादाद तेजी से कम हो रही है। बाजार के जानकारों का जोर इस बात पर है कि शेयर बाजार में कोई छद्म उछाल नहीं है लेकिन दिक्कत यह है कि बाजार के पंडित ऐसा आकलन करने में हमेशा विफल रहे हैं। 
 
बैलेंस शीट की इस तीसरी समस्या का दूसरा परिणाम है निर्माण गतिविधियों में तेज गिरावट। गौरतलब है कि कृषि क्षेत्र के बाद यह दूसरा सबसे अधिक रोजगार  देने वाला क्षेत्र है। अचल संपत्ति बाजार में एक दशक पहले आई कीमतों में अवास्तविक तेजी का असर अभी कुछ और वक्त तक बरकरार रहेगा। ठीक वैसे ही जैसे बैलेंस शीट की दो अन्य समस्याएं हैं। आंशिक तौर पर ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अचल संपत्ति की कीमतें तेज बनी हुई हैं। खासतौर पर महंगे श्रेणी वर्ग में कीमतें ज्यादा हैं और उनमें कमी आनी चाहिए। कीमतों के सही होने का मानक यह है कि आखिर एक आम परिवार की कितने वर्षों की आय एक मकान खरीदने के लिए जरूरी है। एक वक्त था जब तीन या चार साल की आय में मकान खरीदा जा सकता था। लेकिन कीमतों का वह स्तर अब इतिहास हो चुका है। दुनिया भर में अचल संपत्ति की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई और यह आय में वृद्घि के स्तर को पार कर गई। कई देशों में आज भी यही हालत है। 
 
भारत में कीमतों में बीते पांच साल से सुधार का क्रम चल रहा है या शायद और अधिक समय से। इतना ही नहीं ब्याज दरों में भी कमी आई है। आवासों की मासिक किस्त में भी कमी आई है। दूरदराज के उपनगरीय इलाकों में सस्ते मकानों के बिल्ट अप एरिया की कीमत 5,000-6,000 रुपये प्रति वर्ग फुट है। ऐसे में दिल्ली के आसपास यानी सोनीपत या अधूरे पड़े द्वारका एक्सप्रेसवे जैसे इलाके में 1,200 वर्ग फुट का अपार्टमेंट करीब 60 से 70 लाख रुपये में मिलेगा। लेकिन ये इलाके अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हैं और वहां रहना ठीक नहीं है। ऐसे में अगर आप और करीब आते हैं तो कीमतें बढ़ जाती हैं। 
 
कीमतों की तार्किकता की दूसरी परीक्षा का संबंध किराये से होने वाली आय से है। एक दशक पहले आई उछाल से पहले निवेशक किसी मकान के किराये में 3-4 फीसदी रिटर्न की अपेक्षा करते थे। लेकिन यह घटते-घटते पहले दो और फिर एक फीसदी तक आ गया। अब भी यह दो फीसदी से अधिक नहीं है। इसके लिए बाजार में अत्यधिक आवास की उपलब्धता जिम्मेदार है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आवास बाजार में सुधार होगा, बशर्ते कि कीमतों में बहुत अधिक गिरावट आए और ब्याज दर और अधिक कम हो जाए। इसके अतिरिक्त आय और किराये में बढ़ोतरी होने, मेट्रो के दूरदराज इलाकों में पहुंचने और शेयर कीमतों में भी गिरावट से भी ऐसा हो सकता है।
Keyword: india, economy,,
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