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दो नगर निगम : शहरी बॉन्ड से रकम जुटाने का उपक्रम

ईशान बख्शी / नई दिल्ली July 13, 2017

पुणे नगर निगम (पीएमसी) की देखा-देखी नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) ने घोषणा की है कि वह भी म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार में संभावनाएं तलाशेगी। पिछले महीने पीएमसी ने 10 साल की अवधि वाले बॉन्ड बेचकर 200 करोड़ रुपये जुटाए। पुणे निगम 14 सालों में बॉन्ड के जरिये पैसे जुटाने वाला पहला नगर निकाय बन गया। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने इन दोनों नगर निकायों के बजट का विश्लेषण किया तो अंदाजा लगा कि ये दोनों अपनी व्यय योजना की पूंजी जरूरत के  लिए आमदनी के अलग-अलग स्रोतों पर निर्भर होते हैं। इस विश्लेषण से चार रुझान उभर कर आए।
 
पहला, पुणे निगम अपने खर्च के लिए मुख्यतौर पर स्थानीय निकाय कर (एलबीटी) पर निर्भर होता है। लेकिन यह कर अब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में शामिल कर लिया गया है। ऐसे में निगम को राजस्व में कमी की भरपाई करने के लिए राज्य सरकार से मिलने वाले मुआवजा अनुदान पर काफी हद तक निर्भर रहना होगा। दूसरा, उपभोक्ता शुल्क से होने वाली आमदनी एनएमडीसी की राजस्व प्राप्तियों के काफी बड़े हिस्से की भरपाई कर लेती है लेकिन पुणे में यह कम रहती है।
 
तीसरा, दोनों नगरपालिका आंतरिक स्रोतों के जरिये पूंजीगत खर्च की फंडिंग करने में सक्षम हैं। पुणे ने पूंजीगत खर्च में एनडीएमसी को पीछे छोड़ दिया है। चौथा, पुणे के मुकाबले नई दिल्ली परिचालन और रख-रखाव पर अपने खर्च का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती है।  राजस्व के मोर्चे पर वित्त वर्ष 2018 में एनडीएमसी के कर संग्रह का लक्ष्य कुल राजस्व प्राप्तियों के 17.6 फीसदी पर तय किया गया। बाकी रकम की भरपाई गैर कर राजस्व मसलन यूजर शुल्क आदि से होती है। तुलना की जाए तो वित्त वर्ष 2016 में कर संग्रह पुणे की कुल राजस्व प्राप्तियों का 63 फीसदी तक रहा। आखिर इस अंतर से क्या जाहिर होता है? नगरपालिका संपत्ति करों के जरिये ज्यादातर कर संग्रह करती है। लेकिन पुणे निगम स्थानीय निकाय कर भी लगाता है। अपने 2017-18 के बजट में एनडीएमसी ने संपत्ति कर संग्रह का लक्ष्य कुल राजस्व प्राप्तियों के 16 फीसदी पर तय किया। इसका मतलब यह हुआ कि दोनों नगरपालिका के कुल कर आंकड़ों में अंतर मुख्यत: पुणे मिग द्वारा लगाए गए एलबीटी की वजह से है। 
 
पुणे ने एलबीटी लगाना शुरू किया लेकिन राज्य सरकार ने अगस्त 2015 में इसे आंशिक रूप से खत्म कर दिया। पुणे के राजस्व घाटे की भरपाई राज्य सरकार के अनुदान के जरिये की गई। लेकिन पुणए निगम ने 50 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार वाले व्यापारियों पर कर लगाने का अपना अधिकार बनाए रखा। इस कर की अहमियत का अंदाजा इस तरह लगाया जा सकता है। मान लीजिए कि वित्त वर्ष 2016 में पुणे निगम ने कर के जरिये 8,88 करोड़ रुपये जुटाए जबकि  इसे राज्य सरकार से मुआवजा अनुदान के रूप में 5,76.7 करोड़ रुपये मिले। दोनों को मिलाकर वित्त वर्ष 2016 में पुणे की राजस्व प्राप्तियां 36 फीसदी तक रहीं। लेकिन अब यह कर जीएसटी में शामिल हो गया है।
 
इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के एसोसिएट डायरेक्टर (पब्लिक फाइनैंस) अनुराधा बासुमतारी का कहना है, '1 जुलाई से जीएसटी लगने के बाद पुणे नगर निगम स्थानीय निकाय कर नहीं लगा सकता क्योंकि इस कर को जीएसटी में शामिल किया गया है।' वह कहती हैं, 'लेकिन राजस्व घाटे की उम्मीद नहीं है क्योंकि स्थानीय निकायों को महाराष्ट्र जीएसटी कानून, 2017 के मुताबिक मुआवजा मिलेगा। स्थानीय प्राधिकार के पास भुगतान की जाने वाली मुआवजे की रकम के लिए वित्त वर्ष 2017 आधार वर्ष होगा और आधार वर्ष की कमाई पर 8 फीसदी वृद्धि होगी। पुणे नगर निगम को उम्मीद है कि राज्य सरकार से उसे जल्द ही मुआवजे से जुड़ा संदेश मिलेगा क्योंकि मुआवजे की प्रक्रिया अगस्त 2017 से शुरू हो जाएगी।' 
 
इसी महीने महाराष्ट्र सरकार ने वाहनों का पंजीकरण शुल्क बढ़ाने का फैसला किया ताकि स्थानीय निकाय कर और चुंगी को जीएसटी में शामिल करने से सालाना 600-700 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे की भरपाई की जा सके। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि केवल इससे ही नगरपालिका राजस्व घाटे की पूरी भरपाई कर पाएगी। इससे यह अंदाजा भी होता है कि पुणे नगर निगम की निर्भरता अब राज्य सरकार पर बढ़ेगी। 
 
गैर कर राजस्व के मोर्चे पर एनएमडीसी की यूजर शुल्क से होने वाली आमदनी सभी राजस्व प्राप्तियों का 45 फीसदी है। पुणे के लिए तुलनात्मक अनुमान वित्त वर्ष 2016 में 18.9 फीसदी था जो वित्त वर्ष 2015 के 25.7 फीसदी से कम है। खर्च के मोर्चे पर आंकड़े इन नगरपालिकाओं में खर्च के तरीके में अंतर का खुलासा करते हैं। पुणे नगर निगम का राजस्व खर्च वित्त वर्ष 2016 में कुल खर्च के प्रतिशत के तौर पर बढ़कर 58.6 फीसदी तक हो गया जो वित्त वर्ष 2012 के 52.2 फीसदी से अधिक है। वर्ष 2017-18 में नई दिल्ली नगर पालिका ने राजस्व खर्च का लक्ष्य कुल खर्च के 84.5 फीसदी के स्तर पर तय किया है। हालांकि वित्त वर्ष 2017 में यह 89.8 फीसदी से कम हो गया। पुणे की तुलना में नई दिल्ली नगर पालिका अब भी राजस्व खर्च ज्यादा करती है। नई दिल्ली ने वित्त वर्ष 2018 में परिचालन और रख-रखाव पर राजस्व खर्च का 41 फीसदी खर्च करना तय किया। इसकी तुलना में पुणे ने इसका एक छोटा हिस्सा ही खर्च किया। 
 
दोनों नगरपालिका अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा वेतन के लिए आवंटित करती हैं। नई दिल्ली नगर पालिका के कुल खर्च में वेतन, लाभ और भत्तों पर खर्च वित्त वर्ष 2018 में बढ़कर 42.5 फीसदी तक हो सकता है जो वित्त वर्ष 2016 के 39 फीसदी से ज्यादा है। वहीं पुणे ने इस पर वित्त वर्ष 2016 में 59.7 फीसदी तक खर्च किया जो वित्त वर्ष 2012 के 39.8 फीसदी से अधिक है। अपेक्षाकृत दोनों ही कर्ज मुक्त हैं और अपने पूंजीगत खर्च के लिए आंतरिक संसाधनों पर खर्च करते हैं। हालांकि पुणे निगम का पूंजीगत खर्च नई दिल्ली नगर पालिका से ज्यादा है। 
 
वित्त वर्ष 2016 में पुणे निगम ने पूंजीगत खर्च पर कुल परिव्यय का 41.38 फीसदी आवंटित किया जो वित्त वर्ष 2012 के 47.8 फीसदी से कम है हालांकि यह अब भी नई दिल्ली नगर पालिका के वित्त वर्ष 2018 के 15.5 फीसदी पूंजी खर्च से ज्यादा है। वित्त वर्ष 2016 में पुणे का पूंजीगत खर्च 1,442 करोड़ रुपये था जबकि वित्त वर्ष 2017 में नई दिल्ली नगर पालिका का पूंजी खर्च 337.68 करोड़ रुपये था।
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