बिजनेस स्टैंडर्ड - सौर ऊर्जा विकास से से समझौता नहीं
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सौर ऊर्जा विकास से से समझौता नहीं

सप्तक घोष /  July 13, 2017

अगर सौर ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाता है तो ऊर्जा सुरक्षा में स्थायित्व ही नहीं आएगा बल्कि प्रदूषण कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मदद मिलेगी। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं सप्तक घोष 

 
विशेषज्ञों के विचारों और उनके अनुमानों के उलट, देश में सौर ऊर्जा लगातार नए रिकॉर्ड कायम कर रही है। राजस्थान स्थित भादला सोलर पार्क में उत्पादित बिजली की 2.44 रुपये प्रति किलोवॉट की कीमत अप्रत्याशित रूप से कम है। ग्रिड से इसकी समता अपेक्षा और अनुमान से बहुत पहले हो गई है। समान क्षमता में उत्पादित सौर ऊर्जा अब कोयला आधारित संयंत्र से उत्पादित बिजली की तुलना में 18 फीसदी सस्ती है। इसकी बदौलत ताप बिजली घरों में चिंता पैदा हो गई है। इस क्षेत्र का प्लांट लोड फैक्टर (पीएलएफ) सन 2011 के 76 फीसदी से कम होकर फिलहाल 58 फीसदी रह गया है। 
 
अभी हाल ही में कुछ पर्यवेक्षकों ने दलील दी है कि देश में सौर ऊर्जा क्षेत्र की आक्रामक प्रगति से ताप बिजली घरों के पीएलएफ में और कमी आएगी तथा वह 50 फीसदी से नीचे जा सकता है। इससे इन परियोजनाओं का कर्ज काफी बढ़ जाने की आशंका पैदा हो गई है। वित्तीय संस्थानों और देश की अर्थव्यवस्था पर इसके ऐसे नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए उनका सुझाव है कि सौर ऊर्जा क्षेत्र की प्रगति को थोड़ा थामा जाए ताकि ताप बिजली घर बेहतर पीएलएफ पर परिचालित हो सकें। 
 
इन पर्यवेक्षकों का यह कहना भी सही है कि मौजूदा नियमों के अधीन इस क्षेत्र को तमाम तरह की सब्सिडी दी जा रही है और मांग की तुलना में आपूर्ति ज्यादा होने पर इसे वरीयता दी जाती है। बहरहाल वर्तमान में अगर बिना किसी सब्सिडी के भी सौर ऊर्जा की वास्तविक लागत निकाली जाए तो वह 4 रुपये प्रति किलोवॉट होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन संयंत्रों को अत्यंत सस्ती दर पर अंतरराष्टï्रीय पूंजी उपलब्ध है और इनके उत्पादन अनुमान सटीक बैठते हैं। यह आमतौर पर उल्लिखित 6 रुपये प्रति किलोवॉट की दर से बहुत कम है। इसके अलावा ऐसे दावों से यह कठोर सच्चाई भी सामने नहीं आ पाती है कि कोयला आधारित बिजली उत्पादन संयंत्रों की क्या स्थिति है। यह सब करने के बजाय ऐसे अनचाहे और अप्रमाणित अनुमान लगाए जाते हैं कि अगर भारत सौर ऊर्जा की तलाश और इस दिशा में प्रयास धीमे करता है तो इसकी कीमतों में आगे और कमी आएगी। 
 
सन 1760 में औद्योगिक क्रांति की अवधारणा के साथ ही कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन को जलाया जा रहा है ताकि 'विकास' किया जा सके। इसकी वजह से पर्यावरण को बहुत अधिक और अपूरणीय क्षति पहुंची। अध्ययनों से पता चलता है कि ताप बिजली घरों ने वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को बहुत अधिक प्रभावित किया है। कोयला खनन ने भी पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाया है। इसकी वजह से स्थानीय पर्यावास को बहुत नुकसान पहुंचा है। इन बाहरी कारकों को देखते हुए और कोयला आधारित बिजली की लागत का आकलन करते हुए किए गए शोध बताते हैं कि इसकी प्रति यूनिट लागत उल्लिखित 1.77 रुपये प्रति किलोवॉट की तुलना में दोगुनी से भी अधिक है।
 
सदियों से कोयला उद्योग ने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके लाभ कमाया है जबकि इस पूरी अवधि के दौरान वह कार्बन उत्सर्जन करते हुए प्रकृति को नुकसान पहुंचाता रहा। आखिरकार अब दुनिया जाग रही है और इस संबंध में समुचित उपाय करने के लिए प्रयत्नशील है। भारत ने इस दिशा में ही सौर ऊर्जा को अपनाया है। सरकार नवीकरणीय ऊर्जा की मदद से मांग को पूरा करने की दिशा में ठोस प्रयास कर रही है। सरकार को यह समझ आ गया है कि सौर ऊर्जा को बढ़ावा न देने की अवसर लागत कोयला संबंधी कारकों से अधिक है। सौर ऊर्जा को जो प्रोत्साहन दिया जा रहा है वह इसकी भरपाई है और इसी के आधार पर कोयला आधारित बिजली की सही लागत निकाली जा सकती है। 
 
देश में कुल 243 गीगावॉट की कोयला आधारित बिजली बनाने की योजना है, इसमें से 50 गीगावॉट से ज्यादा क्षमता की कटौती कर दी गई है। इससे न केवल प्रदूषण संबंधी जोखिम में कमी आएगी बल्कि हमारे देश ने स्थायी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर जो लक्ष्य तय किए हैं उसे हासिल करने में भी इससे मदद मिलेगी और अंतरराष्टï्रीय मंचों पर इसे लेकर कोई सवाल नहीं उठाया जाएगा। जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रतिबद्घता की दृष्टिï से भी यह उचित होगा। 
 
बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा विकसित करने से जुड़ी वास्तविक चुनौती ताप बिजली घरों को होने वाले वित्तीय नुकसान से संबंधित नहीं हैं। फिलहाल चुनौतियों की प्रकृति एकदम तकनीकी है। भारत ने सौर ऊर्जा को लेकर जो आक्रामक रुख अख्तियार किया है उसमें असली समस्या विश्वसनीयता और ग्रिड के साथ एकीकरण की है। सूरज के विकिरण का स्तर अलग-अलग हो सकता है और सूर्यास्त के बाद यह पूरी तरह गायब हो जाता है। ऐसे में देश की बिजली संबंधी जरूरत को केवल सौर ऊर्जा से पूरा कर पाना नामुमकिन नजर आता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकांश राज्यों का लोड प्रोफाइल बताता है कि उच्च मांग सूर्यास्त के बाद ही उत्पन्न होती है। इतना ही नहीं दिन में जब उद्योगों में भारी मशीनरी चलती है तो आपूर्ति का स्थिर रहना जरूरी है। सौर ऊर्जा का विकिरण बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने पर उतार-चढ़ाव के कारण दिक्कत पैदा कर सकता है।
 
इस समस्या को हल करने का एकमात्र तरीका यही है कि संतुलनकारी व्यवस्था कायम की जाए और ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए ताकि ग्रिड अतिरिक्त उत्पादन का समायोजन कर सके और तेजी से गति पकड़ रहे अन्य बिजली उत्पादन विकल्पों का मुकाबला कर सके। भंडारण की तकनीक, बैटरी आदि अभी तक गीगावॉट स्तर पर सफल घोषित नहीं हो सकी हैं। पंप्ड हाइड्रो सैद्घांतिक तौर पर आकर्षक विकल्प है लेकिन व्यावहारिक स्तर पर देखा जाए तो देश में पानी की कमी के चलते यह तकनीक भी शायद कारगर साबित न हो सके। 
 
जब तक भंडारण समस्या का ठोस हल नहीं निकलता है तब तक हमें स्थायी रूप से बिजली हासिल करने के लिए कोयले की जरूरत पड़ेगी। लेकिन वैकल्पिक बिजली की सुविधा के साथ हम चरणबद्घ ढंग से कोयले से निजात पा सकते हैं। सौर ऊर्जा को दोष देने के बजाय मौजूदा ताप बिजली घरों में सुधार लाना होगा। प्लांट लोड फैक्टर को बढ़ाने के लिए परिचालन बेहतर किया जा सकता है। खुली पहुंच श्रेणी के अधीन नए बिजली खरीद समझौते करने होंगे। इस बीच देश में सौर क्रांति अबाध जारी रहनी चाहिए। सदियों से कोयला आधारित बिजली पर काम चला रहे ब्रिटेन ने इस साल 21 अप्रैल को कोयला मुक्त दिवस मनाया। भारत में तो सूर्य की रोशनी और हवा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। ऐसे में हमें पीछे नहीं रहना चाहिए। 
 
(लेखक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नीतिगत अध्ययन केंद्र में शोध विज्ञानी हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: power, solar, ऊर्जा,
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