बिजनेस स्टैंडर्ड - समय के साथ दूर हो सकता है जीएसटी का अधूरापन
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समय के साथ दूर हो सकता है जीएसटी का अधूरापन

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  July 12, 2017

सरकार को इस बात से काफी राहत महसूस हो रही होगी कि देश भर में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के शुरुआती दिनों में आर्थिक गतिविधियां अधिक प्रभावित नहीं हुई हैं। हां, इतना जरूर है कि कुछ शहरों और कस्बों में कारोबारी जीएसटी के विरोध में हड़ताल पर चले गए लेकिन यह एक-दो दिनों से अधिक नहीं चला। वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है लेकिन कुछ खरीदारों ने कुछ उत्पादों की अनुपलब्धता की शिकायत की है। वैसे इतना तो तय है कि जीएसटी लागू होने पर जिस तरह के व्यवधान की आशंका जताई जा रही थी, वैसा नहीं हुआ है।

 
आखिर ऐसा होने की क्या वजह है? पहले के 17 करों और 23 उपकरों को हटाकर उनके स्थान पर एक कर जीएसटी लगाना अपने आप में बहुत बड़ा बदलाव था। माना जा रहा था कि इससे बड़े पैमाने पर अराजकता और गतिरोध पैदा हो सकता है। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। वैसे जीएसटी के अभी शुरुआती दिन हैं और संभव है कि सितंबर के बाद आर्थिक गतिरोध के हालात बनें। गौरतलब है कि कारोबारियों को अपना पहला रिटर्न सितंबर तक ही जमा करना है। फिर भी यह मानना होगा कि कारोबारी और उद्योग जगत दोनों ने ही नई कर प्रणाली के प्रति गंभीर आपत्तियों के बावजूद इसे कोई बड़ा अवरोध खड़ा किए बगैर स्वीकार कर लिया है। 
 
हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि गंभीर व्यवधान खड़ा करने की आशंकाओं के बावजूद जीएसटी को लेकर मनाए जा रहे जश्न पर कोई असर क्यों नहीं पड़ा? पहला, लोग इस बात को लेकर आशंकित थे कि कहीं जीएसटी से भी उसी तरह का भारी व्यवधान न पैदा हो जैसा इस सरकार के पिछले कदम नोटबंदी ने किया था। कई विशेषज्ञों ने जीएसटी की तुलना नोटबंदी से की थी जिससे व्यापक आर्थिक गतिरोध की आशंकाओं को बल मिला था। लेकिन सच तो यह है कि जीएसटी के असर को देखा जाए तो उसकी तुलना नोटबंदी से नहीं की जा सकती है। दोनों के बीच कई असमानताएं हैं।
 
जीएसटी को लागू करने के लिए कई महीने पहले से ही तैयारी की जा रही थी। वहीं नोटबंदी करने के पहले ऐसी कोई तैयारी नहीं की गई थी। जीएसटी को लेकर किसी तरह की गोपनीयता नहीं बरती गई जबकि नोटबंदी के मामले में क्रियान्वयन की योजना को कई कारणों से छुपाकर रखा गया था। इसके अलावा जीएसटी का असर व्यापक तौर पर वस्तुओं एवं सेवाओं की बिक्री और आपूर्ति से जुड़े करीब 80 लाख प्रतिष्ठानों पर ही पडऩा है जबकि नोटबंदी ने देश के हरेक नागरिक को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया था। इस तरह नोटबंदी से जीएसटी की तुलना करना सही नहीं था और इसकी वजह से एक अतार्किक एवं अनुचित डर का माहौल बना जिसमें नोटबंदी के शुरुआती दिनों की तरह जीएसटी लागू होने पर भी व्यापक गतिरोध पैदा होने की बात कही गई। बहरहाल जीएसटी से अभी तक कोई खास दिक्कत नहीं होने की एक वजह यह भी है कि इसका पूरा ढांचा जीएसटी परिषद ने तैयार किया और नई कर प्रणाली के लिए जरूरी प्रक्रियागत बदलावों को भी आत्मसात किया गया। इन दोनों कारणों से जीएसटी के शुुरुआती दिनों में व्यवधान टालने में मदद मिली है। हालांकि यह सच है कि इन फैसलों ने जीएसटी को अपूर्ण बना दिया लेकिन इससे गतिरोध टालने में भी काफी हद तक मदद मिली है। जरा इस पहलू पर गौर कीजिए कि जीएसटी परिषद ने इस नई कर प्रणाली को 1 जुलाई से क्रियान्वित करने का लक्ष्य हासिल करने के लिए किन मुद्दों पर सहमति जताई है। 
 
शुद्धतावादी और सामान्य अर्थशास्त्र ऐसा हो पाने को लेकर पूरी आशंका जता रहे थे लेकिन जीएसटी परिषद सभी अहम मुद्दों पर सहमति बनाने में सफल रही। सरकारी राजस्व का बड़ा स्रोत माने जाने वाले पेट्रोल, डीजल एवं शराब को जीएसटी के दायरे से बाहर रख दिया गया है। इसके अलावा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 49 फीसदी का भारांक रखने वाले उत्पादों को भी कर से छूट मिली है। मौलिक तौर पर जीएसटी की अधिकतम तीन दरें ही रखी जानी थीं। जीएसटी के तहत सामान्य दर, विलासिता वाले उत्पादों के लिए उच्च दर और आवश्यक उत्पादों के लिए रियायती दर की ही चर्चा थी। लेकिन जीएसटी से कीमतों में अधिक उतार-चढ़ाव की आशंका को कम करने के लिए पुरानी कर दरों के आसपास ही नई दरें रखने की अनिवार्यता थी। इसके अलावा आर्थिक नुकसान होने की सूरत में केंद्र से राज्यों को मुआवजा देने की बाध्यता के चलते जीएसटी परिषद अलग उत्पादों एवं सेवाओं के लिए छह-सात दरों पर सहमति बनी। 
 
जीएसटी लागू करते समय प्रक्रियागत रियायतें भी भरपूर दी गई हैं। शुरुआती दौर में कारोबारियों को मासिक आधार पर रिटर्न जमा करने के बजाय जुलाई महीने का रिटर्न सितंबर तक जमा करने की छूट दी गई है। एक संघटन योजना का भी ऐलान किया गया है जिसमें 75 लाख रुपये से अधिक टर्नओवर वाले कारोबारियों, रेस्टोरेंट संचालकों और विनिर्माताओं को जीएसटी से बाहर रहने और तीन महीने में एक बार अपने टर्नओवर के 1-5 फीसदी के हिसाब से शुल्क देने का प्रावधान है। खुदरा कारोबारियों को जीएसटी के बाद अपने उत्पादों पर नई कीमतें अंकित करने के लिए भी समय दिया गया है। इस पूरी कवायद का मकसद यह है कि उद्योग एवं कारोबार जगत जीएसटी प्रणाली में खुद को ढाल ले और उत्पादों की कीमतों में तात्कालिक तौर पर अधिक तेजी न आए, आर्थिक गतिरोध सीमित रहे और सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की उपलब्धता बनी रहे। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आर्थिक गतिविधियों पर व्यवधान को कम रखने के चक्कर में जीएसटी एक अपूर्ण प्रणाली की नजर आने लगा है जिसमें क्रियान्वयन संबंधी मानकों में कई तरह की रियायतें दी गई हैं। उम्मीद है कि यह अधूरापन समय के साथ दूर हो जाएगा और करदाताओं के जीएसटी से अवगत होने के साथ प्रक्रियागत खामियों को भी दुरुस्त कर लिया जाएगा।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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