बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि ऋण माफी की राह नहीं है आसान
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, November 23, 2017 07:27 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

कृषि ऋण माफी की राह नहीं है आसान

नीलकंठ मिश्रा /  July 12, 2017

कई राज्यों में कृषि ऋण माफी की घोषणाएं की गई हैं लेकिन इन पर अमल करने की राह में कई चुनौतियां हैं। जमीनी हकीकत से रूबरू करा रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
कृषि ऋण माफ करने के लिए मची चीख-पुकार शांत होने का नाम नहीं ले रही है। वैसे इन दिनों वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर देश भर में मची उथलपुथल ने कर्ज माफी के मसले को पीछे धकेल दिया है। हमारा अब भी यही मानना है कि यह एक  संरचनात्मक समस्या है। दरअसल कृषि उत्पादन बढऩे से आपूर्ति तो सुधरी है लेकिन प्रति व्यक्ति कैलोरी की मांग कम होने और जनसंख्या वृद्धि में गिरावट आने से खाद्य पदार्थों की मांग में वृद्धि भी कम हुई है। हालांकि खाद्य प्रसंस्करण और कृषि निर्यात के जरिये इस क्षेत्र पर बने दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है लेकिन इसमें वक्त लगेगा।
 
हालांकि राजनीतिक संगठनों ने इस पूरे मसले को किसान कर्ज माफी तक ही सीमित कर रखा है लेकिन कृषि क्षेत्र पर व्यापक तनाव को साफ महसूस किया जा सकता है। कृषि आय के विकास में पिछले तीन वर्षों में तीव्र गिरावट आई है जबकि उसके पहले एक दशक तक वृद्धि दर दो अंकों में रही थी। अब हालत यह है कि अच्छे मॉनसून से कृषि क्षेत्र में खुशनुमा अहसास पैदा होना भी कम हो गया है। पिछले साल कृषि उपज की ढीली  कीमतों ने अधिक उत्पादन से मिली बढ़त को बराबर कर दिया था। इस साल भी मॉनसून अभी तक सामान्य से छह फीसदी अधिक सक्रिय दिख रहा है। इसका असर यह हुआ है कि खरीफ सत्र की फसलों की बुआई पिछले साल की तुलना में 19 फीसदी अधिक हुई है। वैसे पिछले साल मॉनसून थोड़ी देरी से सक्रिय हुआ था लिहाजा इस बार बुआई तुलनात्मक रूप से बढ़ी हुई लग रही है। इसके बावजूद ऐसा लगता है कि कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट होने का भी बुआई के रकबे पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
 
हालांकि इस साल भी सामान्य मॉनसून होने से कृषि उपज की आपूर्ति अधिक रहने की समस्या रह सकती है जो कृषि क्षेत्र के समक्ष मौजूद संरचनात्मक मसलों को ही रेखांकित करती है। ऐसे में आने वाले एक साल में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं वहां पर किसानों का कर्ज माफ करने की मांग फिर से उठ सकती है। कृषि ऋण माफी के फैसले पर अब सवाल उठाना तो निरर्थक है लेकिन इसके असर का विश्लेषण करना फायदेमंद हो सकता है।
 
कृषि ऋण माफी के साथ परेशानी यह है कि इनका ऐलान तुलनात्मक रूप से जितना आसान है उस पर अमल कर पाना उतना ही कठिन है। चुनौती केवल राजकोषीय फंड के इंतजाम की ही नहीं है। कुछ राज्यों में किसान कर्ज माफी के फैसले की रुपरेखा पेश की गई है लेकिन इन पर अमल तभी हो सकता है जब बैंकों को हरेक कर्जदार किसान के कर्ज से संबंधित विवरण पहुंचाए जाएं। इसका मतलब है कि कई गैर-मामूली सवालों के जवाब भी देने होंगे, जैसे कि क्या कर्ज माफी किसी खास फसल से संबंधित होनी चाहिए, क्या सिंचाई की सुविधा वाले खेतों के किसानों को कम माफी मिलनी चाहिए, क्या खुद खेती नहीं करने वाले भू-स्वामियों को कोई राहत नहीं मिलनी चाहिए और क्या बंटाई पर खेती करने वाले किसानों को अधिक लाभ मिलना चाहिए? 
 
सवाल यह है कि कर्ज माफी की मात्रा कितनी होनी चाहिए और इस फैसले को किस तरह लागू किया जाए? हमारी समझ है कि किसानों के कर्ज के आंकड़े कुछ खास फसलों से संबंधित नहीं हैं, बंटाई पर खेती करने वाले किसानों की भी सही जानकारी मिल पाना मुश्किल है और सिंचित खेती के आंकड़े भी अद्यतन नहीं हैं। ऐसे में राज्य सरकारों को वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करने और फैसले को अमलीजामा पहनाने में कई महीने लगने की संभावना है। उस समय लाभान्वित होने वाले किसानों की संख्या काफी अलग हो सकती है। 
 
अब वर्ष 2008 में घोषित कृषि ऋण माफी योजना को ही लीजिए। केंद्र सरकार की तरफ से इस आशय का ऐलान फरवरी महीने में किया गया था लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उस पर अपनी मुहर मई महीने में लगाई थी और सात महीने बाद दिसंबर में पहला कर्ज माफ हो पाया था। उस पूरी ऋण माफी योजना को पूरा होने में करीब ढाई साल का लंबा वक्त लग गया था। अंतिम आंकड़ों से पता चला कि वास्तविक तौर पर जो कर्ज राशि माफ हुई वह घोषित रकम से 19,000 करोड़ रुपये यानी करीब 27 फीसदी कम थी।
 
लेकिन कर्ज माफी के फैसले पर अमल में यह देरी प्रभावित किसानों को असरदार राहत दे पाने में बड़ी बाधा पैदा करती है। किसानों को अभी तक पता ही नहीं है कि उनका कितना कर्ज इस फैसले के चलते माफ हो जाएगा। इसके चलते बैंकों का कर्ज लौटाने संबंधी उनकी आदतों पर भी असर पड़ता है। इससे परेशान होकर बैंक उन इलाकों में कर्ज देने में आनाकानी करने लगते हैं। इस साल अप्रैल और मई महीने में ही सरकारी बैंकों से आवंटित कृषि ऋण में क्रमश: एक और सात फीसदी की गिरावट आई है। यह पिछले एक दशक में अप्रैल-मई के दौरान कृषि ऋण आवंटन का सबसे कम स्तर है।
 
तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ने तीन साल पहले जब अपने किसानों का कर्ज माफ किया था, तब भी कृषि ऋण की वृद्धि प्रभावित हुई थी। प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण आवंटन के मामले में भी लक्ष्य हासिल कर पाना मुश्किल हो सकता है क्योंकि ये लक्ष्य पिछले वित्त वर्ष के आंकड़ों के आधार पर तय होते हैं। पिछले साल संस्थागत ऋण वृद्धि केवल 5 फीसदी रही थी। इन अर्थव्यवस्थाओं में नया फंड डालने की रफ्तार धीमी होने से समग्र आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ता है, न कि उपभोग मांग में तेजी आती है।
 
हमारा अनुमान है कि कुल बकाया कृषि ऋण करीब 15 लाख करोड़ रुपये है। इसमें सरकारी बैंकों के अलावा ग्रामीण सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से लिए गए कृषि ऋण भी शामिल हैं। इसमें से 10 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा ही कम ऋण उन सात राज्यों का है जहां पर किसानों का कर्ज माफ करने का ऐलान किया गया है या जहां इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया जा रहा है। अगर हरेक प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के ही अनुपात (सरकारी बैंकों से जारी किसान कर्ज का 30 फीसदी हिस्सा) में कृषि ऋण माफ करते हैं तो 2.1 लाख करोड़ रुपये का ऋण ही माफ होगा। पंजाब और कर्नाटक ने किसान कर्ज माफी का जो ऐलान किया है उसमें तो यह अनुपात केवल 16 फीसदी और 9 फीसदी है। इससे पता चलता है कि वास्तविक ऋण माफी के 1.2 लाख करोड़ रुपये से लेकर 1.5 लाख करोड़ रुपये के बीच में ही रहने के आसार हैं।
 
कर्ज माफी फैसले के क्रियान्वयन की जटिलताओं के साथ ही फंड के प्रबंधन की समस्या भी राज्य सरकारों को यह मसला कई वर्षों तक खींचने के लिए बाध्य कर सकती है। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु पहले से ही ऐसा रवैया अपनाए हुए हैं और पंजाब भी उसी राह पर चलता हुआ नजर आ रहा है। विश्लेषण में शामिल कुछ राज्य कर्ज माफी का आगे चलकर ऐलान कर सकते हैं। अगर इन फैसलों को अगले चार-पांच वर्षों में क्रियान्वित किया जाता है तो कर्ज माफी का सालाना असर 30,000 करोड़ से लेकर 35,000 करोड़ रुपये तक ही होगा। यह भारतीय जीडीपी का महज 0.2 फीसदी हिस्सा ही होगा जो बॉन्ड बाजार के नजरिये से अधिक चिंता का विषय नहीं होना चाहिए।
 
(लेखक क्रेडिट सुइस के इक्विटी रणनीतिकार-भारत हैं)
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण, loan,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 पेमेंट बैंक में प्रतिस्पर्धा होगी ग्राहकों के लिए फायदेमंद?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.