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बॉयबैक का मौका क्या हो तरीका

संजय कुमार सिंह /  July 11, 2017

अप्रैल 2016 की शुरुआत से 69 कंपनियों ने 58,592 करोड़ रुपये के शेयरों की पुनर्खरीद (बायबैक) का प्रस्ताव रखा या इसे अंजाम दिया। कुछ दिन पहले इंजीनियर्स इंडिया ने 658.8 करोड़ रुपये की शेयर पुनर्खरीद योजना की घोषणा की थी। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), विप्रो और एचसीएल टेक्नोलॉजीज जैसी सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियां भी इस मोर्चे पर आगे रही हैं। वर्ष 2016 के आम बजट में सरकार ने लाभांश पर कराधान के मानकों में बदलाव किया था। तब से पुनर्खरीद एक ऐसा पसंदीदा विकल्प बन गई है जिसके जरिए कंपनियां अपने शेयरधारकों को लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में निवेशकों को यह जानने की जरूरत है कि शेयर पुनर्खरीद में हिस्सा लें या न लें, इसका फैसला कैसे किया जाए।

 
खास बात: पुनर्खरीद एक ऐसा तरीका जिसके जरिये कोई कंपनी शेयरधारकों को अपने मुनाफे का एक हिस्सा लौटाती है। पुनर्खरीद कीमत को मौजूदा बाजार भाव से कम रखा जाता है जिससे कि शेयरधारकों कको कुछ अतिरिक्त रकम मिले। पुनर्खरीद से उन शेयरधारकों को भी फायदा होता है जो इसमें शामिल नहीं होते हैं। जब कोई कंपनी शेयरों को फिर से खरीदती है तो बाजार में उसके शेयरों की उसकी कुल संख्या घट जाती है। कुल आय को समान मान लें और अगर शेयरों की संख्या घट जाती है तो कंपनी प्रति शेयर अधिक आय (ईपीएस) सृजित करती है। ईपीएस अधिक होने का मतलब है शेयर की कीमत भी ऊंची होना। और अगर पीई मूल्यांकन की रेटिंग फिर से तय हो जाए और वह भी बढ़ी हुई तो फिर शेयरधारकों की पांचों उंगलियां घी में हो जाती हैं।
 
पुनर्खरीद के पसंदीदा विकल्प बनने की एक अहम वजह है वर्ष 2016 का आम बजट जिसमें लाभांश पर कराधान के नियमों में बदलाव किया गया। अगर किसी वित्त वर्ष में अमीर निवेशक को मिलने वाले लाभांश की राशि 10 लाख रुपये को पार कर जाती है तो 10 लाख रुपये से अधिक की रकम पर कर देना होगा। लाभांश पर कराधान की दर 10 फीसदी है, जिस पर अधिभार और उपकर भी लगेंगे। यह कंपनियों (प्रभावी 20.93 प्रतिशत, डीडीटी 15 प्रतिशत, अधिभार 12 प्रतिशत और उपकर 3 प्रतिशत) द्वारा चुकाए जाने वाले लाभांश वितरण कर (डीडीटी) के अलावा है। क्रिस रिसर्च के संस्थापक अरुण केजरीवाल कहते हैं, 'अमीर निवेशकों के लिए लाभांश विकल्प बहुत फायदे का सौदा नहीं रह गया है।' 
 
दूसरी तरफ पुनर्खरीद में कराधान की दर काफी कम है। बीडीओ इंडिया में कर एवं नियामकीय पार्टनर राजेश ठक्कर कहते हैं, 'जब लाभ अल्पावधि हो और ऐसे लेनदेन पर प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) लागू हो तो लाभ 15 फीसदी के कर (इस पर अधिभार और उपकर भी) दायरे में आएगा। जब लाभ दीर्घावधि हो तो पुनर्खरीद को उस स्थिति में कर छूट हासिल होगी जब एसटीटी लगा हो और ऐसे शेयरों की खरीद आयकर अधिनियम की धारा 10(38) के तहत अयोग्य नहीं घोषित की गई हो।' प्रवर्तक उस स्थिति में भी पुनर्खरीद का रास्ता अपनाते हैं जब वे यह महसूस करते हैं कि कंपनी का शेयर आंतरिक मूल्य से नीचे कारोबार कर रहा है। रिलायंस सिक्योरिटीज में शोध प्रमुख राकेश तार्वे कहते हैं, 'शेयर में गिरावट पर खरीदारी करके प्रवर्तक कम लागत पर शेयरधारिता बढ़ाने में सक्षम होते हैं।'
 
टेंडर ऑफर (शेयर सौंपना) बनाम खुले बाजार में खरीदारी: कंपनियां या तो टेंडर ऑफर या खुले बाजार में खरीद के जरिये पुनर्खरीद की पेशकश करती हैं। टेंडर ऑफर में कंपनियां आमतौर पर उन निवेशकों से प्रीमियम पर शेयरों की पुनर्खरीद की पेशकश करती हैं जो इन्हें बेचना चाहते हैं। खुले बाजार की खरीदारी में कंपनी सबसे अच्छे उपलब्ध भाव पर बाजार से शेयर खरीदती हैं। शेयरधारकों के लिए अपने शेयर सौंपना सबसे अच्छा सौदा होता है क्योंकि उनको यह पता होता है कि बाजार भाव के मुकाबले उनको कितना प्रीमियम मिलने वाला है? खुले बाजार की पेशकश के दौरान कंपनी तभी खरीदती है जब शेयर कीमत गिरती है। अप्रैल 2016 से हुई (या अभी हो रही) 69 पुनर्खरीद में से सिर्फ आठ ने ही खुले बाजार से खरीद का रास्ता चुना जबकि बाकी बायबैक शेयर सौंपने के जरिए हुए।
 
क्या इनमें हिस्सा लेना चाहिए? किसी पुनर्खरीद में भाग लेने का निर्णय विभिन्न बातों पर निर्भर होना चाहिए। मसलन, यह इस पर निर्भर करेगा कि निवेशक किस प्रकृति का है? जैसे क्या वह फंडामेंटल पर ध्यान देने वाला है, लंबी अवधि वाला है या खरीद के अपने पास रखने वाला है या फिर सक्रिय कारोबारी है। फंडामेंटल देखने वाले निवेशक को कंपनी की दीर्घावधि संभावना को समझने की कोशिश करनी चाहिए। सैंक्टम वेल्थ मैनेजमेंट के मुख्य निवेश अधिकारी सुनील शर्मा कहते हैं, 'यदि परिदृश्य स्पष्टï और मजबूत है और कंपनी अतिरिक्त नकदी अपने निवेशकों को फिर से सौंप रही है तो फिर इससे अच्छा कुछ भी नही है। उस स्थिति में, निवेशक को बने रहना चाहिए। लेकिन अगर दीर्घावधि परिदृश्य मजबूत नहीं है और कंपनी के पास अपना व्यवसाय बढ़ाने के अवसर नहीं हैं और वह पुनर्खरीद के जरिए अपने  शेयरधारकों को पैसा लौटा रही है तो हम पुनर्खरीद को तरजीह दे सकते हैं।' प्रभुदास लीलाधर में इक्विटीज के सह प्रमुख आर श्रीशंकर कहते हैं कि बॉयबैक में मिल रहा प्रीमियम ही एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए। मान लीजिए कि आज आप बॉयबैक में शेयर दे देते हैं और कल को कंपनी अच्छा करती है तो उसका शेयर बढ़ेगा। ऐसी सूरत में आप आज बॉयबैक में अपना शेयर सस्ता बेच रहे होंगे।
 
किस अनुपात में शेयर लिए जाएंगे, यह भी एक अहम आधार है। कंपनी आमतौर पर यह निर्धारित करके चलती है कि पुनर्खरीद में वह आपके शेयरों का एक खास प्रतिशत ही स्वीकार करेगी। अरुण केजरीवाल कहते हैं, 'प्रीमियम और अनुपात दोनों ही बातों पर विचार कीजिए। इसी से तय होगा कि आपको कितनी रकम मिलेगी। अगर प्रीमियम कम है और थोड़े से ही शेयर लिए जा रहे हैं तो फिर बॉयबैक के झमेले में फंसा ही क्यों जाए? ' और अंत में सेबी के नियमों के तहत टेंडर रूट यानी शेयर सौंपने का बॉयबैक तरीका अपनाने वाली कंपनियों को 15 प्रतिशत शेयर (कुल पुनर्खरीद में से) छोटे शेयरधारकों के लिए आरक्षित रखने होते हैं। छोटे शेेयरधारक वे कहलाते हैं जिनके शेयरों का बाजार मूल्य किसी कंपनी में 2 लाख रुपये से कम है। 
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर, पुनर्खरीद,
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