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सामाजिक निरंकुशता की हो सकती है बड़ी कीमत

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  July 11, 2017

पिछले तीन वर्षों से एक पुराना शब्द 'निरंकुशता' दोबारा इस्तेमाल होने लगा है।  'असहिष्णुता' का भी खूब प्रयोग हो रहा है। भारत पर ब्रिटिश आधिपत्य (1757-1947) के बारे में चर्चा करते समय इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने निरंकुशता पर बहुत कुछ कहा है। मेरी राय है कि ब्रिटिश हुक्मरानों ने जब भारत की 99.9 फीसदी आबादी को 99.9 फीसदी समय असहाय ही बनाकर रखा तो वे निरंकुश नहीं हो सकते थे। वे लालची, लोभी, पाखंडी और नस्लभेदी तो हो सकते थे लेकिन उन्हें निरंकुश कहना मुश्किल है। निरंकुशता का जन्म तो उस समय होता है जब सरकार लोगों की जिंदगी में दखल देती है और उनकी जिंदगी के हरेक पहलू को नियंत्रित करने की कोशिश करती है।

 
ऐसे में हमें निरंकुशता और असहिष्णुता को 1947 के बाद की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में ही देखना होगा। भारत में निरंकुशता तीन स्वरूपों में नजर आती है। यह किसी समय इकलौते स्वरूप या दोहरे स्वरूप में दिख सकती है तो कभी तीनों स्वरूप एक साथ नजर आ सकते हैं। हमने भारत में इन स्वरूपों को देखा है। निरंकुशता के राजनीतिक स्वरूप के बारे में चर्चा करना हर किसी को पसंद है। इसका ताल्लुक पुलिस के साथ लोगों के संबंधों से है जो कभी भी सहज नहीं रहा है। हमने 1975-77 के दौरान लगे आपातकाल में निरंकुशता के इसी स्वरूप को देखा था। 
 
दूसरा स्वरूप आर्थिक निरंकुशता का है। यह 1950 के दशक के मध्य से ही वजूद में है। इसका मतलब है कि अगर आप कारोबारी हैं तो सरकार की मंजूरी के बगैर अपना पैर भी नहीं हिला सकते हैं। यह निरंकुशता का कम-तीव्र स्वरूप है क्योंकि चारों तरफ फैली घूसखोरी इसके असर को काफी हद तक कम कर देती है। निरंकुशता का तीसरा स्वरूप सामाजिक है। भारत में सामाजिक निरंकुशता पिछले 2,000 वर्षों से जाति व्यवस्था के सघन होने से चलती आ रही है। आजादी के बाद हमने इसका एक नया स्वरूप सांप्रदायिक निरंकुशता भी जोड़ दिया है। वर्ष 2014 के बाद से सांप्रदायिक निरंकुशता उभार पर है। पहली दो तरह की निरंकुशता में सरकार सक्रिय भूमिका में होती है क्योंकि पुलिस, प्रशासन और/या मंत्री भी उसमें शामिल होते हैं। लेकिन तीसरी तरह की निरंकुशता में यह एक निष्क्रिय एजेंट होता है। सरकार में शामिल दल सारी गड़बडिय़ां करते हैं लेकिन सरकार सब कुछ सामान्य होने का दिखावा करती है। उस मायने में सरकारें एक तरह से उत्प्रेरक होती हैं। 
 
इस तरह अगर 1970 के दशक में द्रमुक ने तमिलनाडु में जातिगत निरंकुशता कायम की थी तो आज के समय भाजपा सरकार सांप्रदायिक निरंकुशता की इजाजत दे रही है। वैसे द्रमुक ने जातिगत निरंकुशता के दौर में भी कभी ब्राह्मणों के खिलाफ हिंसा की बात नहीं की। हिंसा उत्तर भारत की ही खासियत है। लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस आर्थिक और राजनीतिक निरंकुशता को प्रश्रय देने में काफी आगे रही है। ऐसे में आज जब कांग्रेस निरंकुशता की बात करती है तो वह केवल उसके एक खास स्वरूप की चर्चा कर रही होती है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा समाज के एक खास तबके के प्रति अत्याचार और भीड़ की हिंसा को अपनी सहमति देती रही है। कांग्रेस के मुताबिक इस तबके का इकलौता दोष यह है कि वे मुस्लिम हैं। जहां तक आर्थिक निरंकुशता का संबंध है तो कांग्रेस ने ही समाजवाद के नाम पर देश की आर्थिक प्रगति को रोक रखा था। केंद्रीयकरण वाली इस विरासत के साथ हम अब भी जी रहे हैं जिसे शायद भाजपा भी पसंद करती है लेकिन उसे न चाहते हुए भी यह छोडऩा पड़ रहा है।
 
कांग्रेस ने एक समय राजनीतिक निरंकुशता को एकदम नए मुकाम तक पहुंचाया था। वर्ष 1975 में संविधान में किए गए 38वें संशोधन ने सरकार को नागरिकों के मौलिक अधिकार भी खत्म करने की इजाजत दे दी। उसी साल किए गए 39वें संविधान संशोधन ने राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष को लगभग हर तरह के मामलों में अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया। और संविधान में किया गया 42वें संशोधन तो 'इंदिरा संविधान' के रूप में ही जाना गया। उस संशोधन ने कानूनों कीसंवैधानिक वैधता से जुड़े पहलू पर विचार करने की अदालतों की शक्तियां ही सीमित कर दी थीं। उसमें नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की भी सूची पेश की गई थी। इस तरह के संवैधानिक बदलावों को अमलीजामा पहनाने वाली वही पार्टी कांग्रेस आज एक देश के तौर पर भारत की अवधारणा की बात करती है।
 
निरंकुशता के इस स्वरूप से निपट पाना निश्चित रूप से सबसे मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि इसमें सरकार नहीं बल्कि हिंसक भीड़ नागरिकों से कुछ खास तरह की मांगें रखती है। सरकार भी इस पूरी कवायद में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाकर इसे उत्प्रेरित करने का काम करती है। यह वैसा ही है जब कोई पक्षपाती अभिभावक आपके टीवी को नुकसान पहुंचा रही अपनी हुड़दंगी संतान की हरकत को भी नजरअंदाज कर देता है।
 
वर्ष 2014 के बाद पिछले तीन साल में यह एक गंभीर समस्या बन चुका है। सरकार ने इस तरह की निरंकुशता को कभी-कभार लताड़ लगाई है लेकिन उत्तर भारत में मौजूद उसके समर्थकों पर शायद ही कोई असर पड़ता है। सरकार के कुछ अधिक बुद्धिजीवी समर्थकों ने आंकड़े पेश करते हुए इस आरोप को ही नकारने की कोशिश की है। लेकिन सवाल आंकड़ों का नहीं है। इसका ताल्लुक अपने युग की चेतना से है जिसे जर्मन दार्शनिकों ने 'जिटगिस्ट' कहकर पुकारा है। भीड़ की हिंसा के बाद गिरफ्तारियां होने से भी इस युगचेतना में बदलाव नहीं होने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी सरकार के तीन साल के कार्यकाल पर लगे इस बदनुमा धब्बे का वजूद स्वीकार करना होगा। इसकी राजनीतिक कीमत काफी बड़ी हो सकती है। आखिर उसे अपना बहुमत खोने के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में केवल 12 सीटें ही गंवानी होंगी।
Keyword: india, intolerance,,
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