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दुग्ध क्रांति में निहित कृषि क्षेत्र के सबक

अशोक लाहिड़ी /  July 11, 2017

श्वेत क्रांति दूध के वितरण और प्रसंस्करण में सुधार पर आधारित थी। बागवानी क्षेत्र इससे कई सबक ले सकता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अशोक लाहिड़ी 

 
हाल ही में देश के अलग-अलग राज्यों में कृषि ऋण की माफी की गई। इसकी कुल राशि वर्ष 2017-18 के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब 1.0-1.5 फीसदी के बराबर होगी। यह बात जाहिर करती है कि हमारी कृषि के साथ कहीं न कहीं कुछ तो गलत है। इस प्रकरण ने कृषि सुधार के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। ऋण माफी को घोषणा के बाद वापस नहीं लिया जा सकता है। लेकिन इनकी बदौलत कृषि क्षेत्र की दिशा और सुधारों की गति पर अवश्य चर्चा हो सकती है। इनकी मदद से ही इसे स्थायी विकास की राह पर लाया जा सकता है। दूध से जुड़ी श्वेत क्रांति से जुड़े तीन सबक इस संदर्भ में प्रासंगिक हैं। 
 
वर्ष 1951-52 से 1971-72 तक दो दशक में देश में दूध का उत्पादन 1.7 करोड़ टन से बढ़कर महज 2.2 करोड़ टन तक पहुंचा था। दूध सस्ता था लेकिन सन 1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक के आरंभ तक वह शहरों में सरकारी दुकानों में आसानी से मिलता नहीं था। श्वेत क्रांति के आगमन के साथ ही अगले दशक में हर बार दूध का उत्पादन दोगुना बढ़ा। सन 1991-92 में यह 5.6 करोड़ टन हुआ तो वर्ष 2011-12 में 12.8 करोड़ टन। 
 
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) की स्थापना सन 1965 में की गई थी। उसने यूरोपीय संघ द्वारा विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत दिए गए दूध पाउडर और बटर ऑयल की बिक्री के साथ ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत की। इस दुग्ध क्रांति के तीन उद्देश्य थे। पहला, ग्रामीण आय में सुधार करना, दूध उत्पादन में स्थायित्व लाना और ग्राहकों तथा उत्पादकों के लिए उचित मूल्य की व्यवस्था करना। इस कार्यक्रम के मूल में आणंद शैली थी। यानी देश के अलग-अलग हिस्सों में सहकारी दूध उत्पादकों से दूध खरीदना। गुजरात के सहकारी दूध वितरण संघ लिमिटेड को अमूल का ब्रांड नाम दिया गया। इसके पास गुजरात के 35 लाख से अधिक दूध उत्पादकों का स्वामित्व था। यह देश भर में जाना पहचाना नाम बन गया। समय बीतता गया और सरकारी संस्थाओं मसलन दिल्ली दुग्ध योजना (डीएमएस) अथवा बिहार स्टेट डेयरी कॉर्पोरेशन को एनडीडीबी के हवाले कर दिया गया। 
 
आमतौर पर कृषि क्षेत्र की सफलता दूध तक सीमित रही। यह भी सच है कि दूध में कुछ ऐसी विशिष्टïताएं होती हैं जो उसे अन्य कृषि उत्पादों से अलग करती हैं। उदाहरण के लिए दूध उत्पादन अन्य कृषि कार्यों के तुलना में आसान है। उसकी खरीद, परिवहन और भंडारण आसान हैं। चावल की बात करें तो वह बासमती, गोविंदभोग और सोना मसूरी जैसी कई किस्मों में आता है। दूध के साथ ऐसा नहीं है। दूध हर मौसम में हर रोज खरीदा जाता है। जबकि आम जैसी मौसमी जिंसों के साथ ऐसा नहीं है। इन तमाम विशेषताओं के बावजूद दूध से तीन अहम सबक सीखे जा सकते हैं। इनमें सबसे अहम है सरकारी हस्तक्षेप की एकदम सहज प्रकृति। 
 
पहली बात तो यह है कि दूध उत्पादन-खरीद की प्रक्रिया में सरकारी कंपनियां नहीं बल्कि सहकारी समितियां शामिल होती हैं। यह तरीका न्यूजीलैंड, नीदरलैंड और डेनमार्क में 19वीं सदी से ही आजमाया जा रहा है। दूध में प्रवेश बाधाएं बहुत कम हैं क्योंकि कोई बड़ा सरकारी प्रतिष्ठान इससे नहीं जुड़ा हुआ है। इसके चलते खरीद, परिवहन, भंडारण और वितरण के काम में बेहतरीन प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुई। सन 1991 में दूध को लाइसेंस व्यवस्था से बाहर कर उसे मिल्क ऐंड मिल्क प्रोडक्ट ऑर्डर (एमएमपीओ) 1992 के अधीन कर दिया गया। यह व्यवस्था अनिवार्य जिंस अधिनियम 1955 के तहत की गई। वर्ष 2011 में समापन से पहले एमएमपीओ बड़ी डेयरियों से दूध की आपूर्ति सुनिश्चित करने का काम करता रहा।
 
गेहूं और चावल जैसी फसलों में सरकारी हस्तक्षेप अलग किस्म का रहा। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की स्थापना एनडीडीबी से एक साल पहले सन 1964 में की गई थी। एफसीआई का काम था किसानों के हितों की रक्षा के लिए मूल्य समर्थन नीतियों का इस्तेमाल, देश भर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये खाद्यान्न वितरण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज का भंडारण। अप्रैल 1973 में तो इंदिरा गांधी के शासनकाल में गेहूं के थोक कारोबार का राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास भी किया गया। अनाज की खरीद बिक्री-न्यूनतम समर्थन मूल्य, एफसीआई का बिल बोझ एक बड़े पीएसयू पर पड़ा जिसने इसे राजनीतिक दबाव की दृष्टिï से संवेदनशील बना दिया। फरवरी 2014 में पंजाब चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि एफसीआई को तीन हिस्सों में बांट देना चाहिए। जो क्रमश: खरीद, भंडारण और वितरण का काम करें।
 
जनवरी 2015 में शांता कुमार की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति ने एफसीआई के पुनर्गठन संबंधी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में अनुशंसा की गई कि आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पंजाब में गेहूं खरीद का काम राज्य सरकार करें। कहा गया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में एफसीआई को इस काम में मदद दी जाए। यह वह इलाका है जहां छोटी जोत के किसान ज्यादा हैं और फसल एमएसपी से कम दाम पर बिकती है। अब वक्त आ गया है कि या तो प्रधानमंत्री के सुझाव या शांता कुमार समिति की सिफारिश पर काम किया जाए। 
 
दूसरी बात, दूध के लिए कभी कोई एमएसपी नहीं रहा। उसकी वजह से कम से कम 23 फसलों के दाम में विसंगति आती है यह बात खुद समिति ने मानी। इसके अलावा एफसीआई की खरीद गेहूं और चावल की एमएसपी खरीद पर निर्भर है। सरकार को एमएसपी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। तीसरा, बागवानी में देश ने काफी प्रगति की है। 26.9 करोड़ टन के उत्पादन के साथ वर्ष 2012-13 में यह खाद्यान्न से ऊपर निकल गई। लेकिन इस क्षेत्र में अभी काफी कुछ किया जा सकता है। इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। फलों और सब्जियों के क्षेत्र में श्रम को प्रोत्साहन रहता है और मूल्य भी अच्छा मिलता है। इनका उत्पादन छोटे किसानों को भी समृद्घ बना सकता है। इसके लिए शीत गृहों की जरूरत होगी और ढुलाई की समुचित व्यवस्था की भी। देश में कन्वेयर बेल्ट व्यवस्था की काफी कमी है जिसका असर उत्पादों को धोने, सुखाने, छांटने, पैक करने आदि में होता है। इसके अलावा सामग्री को अच्छी स्थिति में रखने के लिए रेफ्रिजरेशन वाहनों की आवश्यकता भी है। 
 
श्वेत क्रांति में दूध प्रसंस्करण और वितरण के बुनियादी ढांचे के विकास की अहम भूमिका रही है। इसके तहत स्वचालित दुग्ध संग्रहण केंद्र स्थापित किए गए। ग्रामीण स्तर पर ठंडा करने के संयंत्र, प्रसंस्करण और पैकेजिंग की स्थापना की गई। दूध को 4 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ढोने के लिए टैंकर तैयार किए गए। दूध क्षेत्र से बागवानी को यह सबक मिलता है कि निजी क्षेत्र की पहल के जरिये समुचित बुनियादी ढांचा विकसित किया जाए।
Keyword: milk, dairy,,
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