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स्पष्टता जरूरी

संपादकीय /  July 11, 2017

देश भर में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुए ग्यारह दिन हो चुके हैं। यह दिखने लगा है कि इसमें एक रूपांतरकारी नीति साबित होने की पूरी क्षमता है। हालांकि कुछ आर्थिक व्यवधान देखे गए हैं जो या तो तेजी से कम होंगे या फिर तेजी से बढ़ेंगे। काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार कितनी फुर्ती दिखाते हुए समस्या दूर कर पाती है। पहला बड़ा इम्तिहान उस समय होगा जब नई कर प्रणाली के डिजिटल आधार जीएसटी नेटवर्क पर आंकड़ों का भारी बोझ पड़ेगा। जीएसटी से होने वाले फायदे दिखने शुरू भी हो गए हैं। पहला, खबरें बता रही हैं कि माल आवाजाही की लागत में कमी आ सकती है। विभिन्न राज्यों के नाकों पर अक्सर ट्रकों की लंबी कतारें लग जाती थीं लेकिन जीएसटी के बाद वे अप्रासंगिक हो चुके हैं। 22 राज्यों ने अपनी सीमाओं पर चुंगी नाके खत्म कर दिए हैं जिससे समय और धन दोनों की बचत हो रही है। इसका असर पूरे आर्थिक ढांचे पर भी पडऩा चाहिए ताकि उत्पाद सस्ते हों और कारोबार के नए अवसर पैदा हो सकें।

 
इसकी स्थायी कामयाबी इस पर निर्भर करेगी कि जीएसटी का प्रशासन किस तरह होता है और राज्यों की सीमाओं पर बने चेकप्वाइंट कैसा काम करते हैं? मान लीजिए, अगर महाराष्ट्र और गुजरात के बीच आने-जाने वाले सभी ट्रकों की शराब के लिए चेकप्वाइंट पर तलाशी ली जाती है तो फिर से सीमा पर ट्रकों की लंबी कतार लगनी शुरू हो जाएगी और जीएसटी से हो रहा लाभ गायब हो जाएगा। राज्य सरकारों को भी कोशिश करनी होगी कि वे समान दरें बनाए रखें क्योंकि अगर राज्य अपने स्तर पर चुंगी लगाते हैं तो देश भर में एकसमान कर प्रणाली लागू करने का लाभ गंवा बैठेंगे। राज्य सरकारों को अपनी नौकरशाही पर भी लगाम लगानी होगी जिनमें परिवहन विभाग के अधिकारी भी शामिल हैं। फायदा उठाने के लिए परिवहन अधिकारी चेकप्वाइंट पर पुराने नियमों की फेहरिस्त लेकर हाजिर हो सकते हैं।  कुछ नगर निकायों की तरफ से लगाए गए प्रवेश कर के सवाल पर भी विचार करने की जरूरत है क्योंकि इससे वस्तुओं की निर्बाध आवाजाही पर असर पडऩे की पूरी आशंका है। 
 
सरकार को जीएसटी की राह में खड़ी होने वाली किसी भी बाधा को दूर करने के लिए तैयार रहना चाहिए। खासकर अनौपचारिक क्षेत्र पर इसकी सबसे ज्यादा मार पड़ सकती है। वैसे अभी तक किसी खास दिक्कत के सुराग तो नहीं दिखे हैं। लेकिन छोटे से उन बड़े आपूर्तिकर्ताओं का रुख किया जाना संभव है जो जीएसटी के लिए तैयार हैं। इससे अर्थव्यवस्था के एक तबके को औपचारिक ढांचे में लाने में मदद मिलेगी। रोजगार और उद्यमशीलता पर पडऩे वाले इसके मध्यम अवधि के नकारात्मक प्रभावों को दूर करने के लिए सरकार को समाधान करना होगा। कपड़ा जैसे कुछ श्रम-बाहुल्य क्षेत्रों से असहमति और नाराजगी के स्वर सुनने को मिले हैं। यह याद रखना होगा कि जीएसटी के पीछे असली मकसद छोटी कंपनियों को भी कर चुकाने के लिए प्रोत्साहित करना है, न कि उन्हें आर्थिक ढांचे से बाहर कर देना। अगर ऐसा हो तो सरकार को कदम उठाने होंगे।
 
सरकार को इस मामले में भ्रम बढ़ाने का काम नहीं करना चाहिए। एक तरीका यह हो सकता है कि जीएसटी से संबंधित सभी सूचनाओं के लिए एक ही स्रोत सुनिश्चित किया जाए और उसे ही इस बारे में उठने वाले सवालों के जवाब देने को कहा जाए। विभिन्न मंत्रालयों से जीएसटी को लेकर जटिल एवं विरोधाभासी सलाहें जारी होने से कारोबारी जगत की चिंताएं बढ़ी हैं। जीएसटी के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर भी भ्रमित करने वाली सूचनाएं देने के आरोप लग रहे हैं। सरकार इस समस्या को तो आसानी से हल कर सकती है। पहले से ही अस्त-व्यस्त माहौल में सरकार के स्तर पर स्पष्टता होना तो निहायत ही जरूरी है।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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