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प्रासंगिकता को तरजीह

संपादकीय /  July 10, 2017

उच्चतम न्यायालय ने चंडीगढ़ प्रशासन के उस फैसले को सही ठहराया है जिसमें स्थानीय एवं राज्य राजमार्गों को जिला मार्गों के रूप में तब्दील कर दिया गया है। चंडीगढ़ प्रशासन के इस फैसले का असली मकसद उच्चतम न्यायालय के ही दिसंबर 2016 के उस फैसले से राहत पाना था जिसमें राज्य एवं राष्ट्रीय राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में शराब की बिक्री को प्रतिबंधित कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहड़ ने अपने नए आदेश में कहा है कि अधिसूचना से विमुक्त की गई सड़कें दरअसल शहरी सीमा में आती हैं और इस वजह से उन पर गाडिय़ों का आवागमन भी अधिक नहीं होता है। यह ध्यान रखना होगा कि छह महीने पहले ही सड़कों के किनारे शराब बिक्री से संबंधित बैनर एवं साइनबोर्ड लगाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। 

 
उच्चतम न्यायालय का वह फैसला कई कारणों से न्यायोचित नहीं था। पहला, आंकड़ों से पता चलता है कि शराब पीकर गाड़ी चलाना राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के राजमार्गों पर होने वाली दुर्घटनाओं की एक छोटी वजह है। वर्ष 2015 के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 77 फीसदी सड़क हादसों का कारण ड्राइवर की गलती होती है। इस तरह के हादसों में जान गंवाने वाले लोगों में 61 फीसदी लोग तेज रफ्तार के शिकार होते हैं। सड़क हादसों में होने वाली मौतों में शराब या ड्रग का सेवन करने के बाद गाड़ी चलाने वाले लोग महज 6.4 फीसदी थे। इसके साथ ही सड़क हादसों में जान गंवाने वाले लोगों में केवल 4.6 फीसदी लोग ही शराब या ड्रग के नशे में थे। दूसरा, सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से पाबंदी लगने से करीब 65,000 करोड़ रुपये का सालाना नुकसान होने का अनुमान है जबकि सैकड़ों लोगों को रोजगार भी गंवाना पड़ा। सबसे अहम बात, यह साफ तौर पर न्यायिक क्षेत्राधिकार के उल्लंघन का भी मामला था और शुरू से ही यह साफ था कि इस प्रतिबंध को लागू कर पाना आसान नहीं होने वाला था। 
 
जल्द ही विभिन्न राज्यों ने इस पाबंदी से बचने के लिए तिकड़में अपनानी शुरू कर दीं। अपने राजमार्गों को स्थानीय सड़कों के तौर पर अधिसूचित करना ऐसा ही एक तरीका था। इस तरह राजमार्ग संबंधी अधिसूचना को वैध ठहराने के उच्चतम न्यायालय के फैसले से राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने राजमार्गों के किनारे शराब बिक्री पर पाबंदी लगाने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा है कि तेज रफ्तार वाली सड़कों पर ड्राइवर को शराब के असर से दूर रहना चाहिए। लेकिन अधिक प्रासंगिक सवाल यह है कि क्या ऊपरी अदालतों को अपना समय ऐसे फैसले देने में खराब करना चाहिए जो या तो उनके अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते हैं या लागू करने लायक नहीं हैं या उनसे भ्रम ही बढ़ता है। 
 
मसलन, पिछले साल नवंबर में उच्चतम न्यायालय के ही न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजने के समय खड़ा होना अनिवार्य करने का फैसला सुनाया था। उसके बाद कई महीनों तक न्यायमूर्ति मिश्रा और कुछ अन्य न्यायाधीशों को इस फैसले से जुड़े स्पष्टीकरण देने पड़े कि दिव्यांगों को इस आदेश के तहत छूट दी जाए या फिर अदालतों में राष्ट्रगान क्यों नहीं बजाया जाए? इसी तरह दिसंबर 2015 में न्यायालय ने 2000 सीसी से अधिक क्षमता वाले डीजल इंजन वाली गाडिय़ों का पंजीकरण रोकने का आदेश दिया था। इससे ऑटोमोबाइल क्षेत्र में काफी अफरातफरी मच गई थी और टोयोटा ने तो नीतिगत स्पष्टता नहीं होने से भारत में आगे निवेश नहीं करने का ऐलान कर दिया था। आठ महीने बाद जाकर वह प्रतिबंध हटा था।  भारत जैसे देश में अन्याय से पीडि़त लोगों की अपीलें अदालतों में वर्षों तक सुनवाई की राह तकती रहती हैं क्योंकि अदालतों के पास काम का बोझ होने से वक्त ही नहीं रहता है। ऐसी स्थिति में ऊपरी अदालतें निश्चित तौर पर अपनी लड़ाई चुनने के साथ ही सुनवाई लायक मामलों की प्राथमिकता भी तय कर सकती हैं। 
Keyword: supreme court, high court, उच्चतम न्यायालय,
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