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कतर पर दबाव नाकाम क्या होगा अंजाम?

एम मुनीर /  July 09, 2017

कतर को लेकर मौजूदा संकट और गतिरोध का आतंकवादियों की आर्थिक सहायता करने से कोई लेनादेना नहीं है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं एम मुनीर 

 
सऊदी अरब के कुछ शेखों के निहित स्वार्थ और संयुक्त अरब अमीरात में उनकी जी हुजूरी करने वाले लोगों के चलते कतर अलग-थलग पड़ गया है। यह इस बात का एक और उदाहरण है कि कैसे इस्लामिक समाज दिन पर दिन बंटता जा रहा है। कहा जाता है कि जब इस दुनिया का अंत होगा, उस वक्त तक इस्लाम 72 पंथों में बंट चुका होगा। यही वजह है कि आर्थिक वृद्घि के लिए पश्चिम एशिया संघ का निर्माण करने के बजाय ये देश अहम पर आधारित राजनीति करते हैं और पश्चिमी देशों को खुद पर नियंत्रण कायम करने देते हैं। कतर को सऊदी अरब के नेतृत्व वाले ब्लॉक (जिसमें संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र शामिल हैं) के सामने घुटने टेकने के लिए जो 10 दिन का समय दिया गया था, वह अवधि गत सोमवार को समाप्त हो गई। कतर ने उनके सामने झुकने का कोई संकेत नहीं दर्शाया। सऊदी अरब ने समय सीमा में दो दिन का इजाफा और किया, लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हुआ। 
 
कतर खाड़ी के उन देशों में शुमार है जो सबसे तेज गति से आर्थिक प्रगति कर रहे हैं। वह हमेशा सऊदी दबदबे से दूर रहा। इस बीच सऊदी अरब महाशक्तियों के खिलाफ ईरान की सफलता से पहले ही चिढ़ा बैठा था। ऐसे में कतर के ईरान की ओर झुकाव को चिह्नित करते हुए उसने उसे अपनी अवज्ञा के लिए कतर को सबक सिखाने की ठानी। अगर सऊदी अरब के नेतृत्व वाला धड़ा कतर से यह अपेक्षा रख रहा था कि वह घुटनों पर झुक कर क्षमा प्रार्थना करेगा तो ऐसा होने की कोई संभावना नहीं थी।
 
हालांकि कतर को अस्थायी तौर पर आर्थिक और सामाजिक झटके सहने पड़ सकते हैं। लेकिन उसकी गैस संपदा और उसका वैश्विक निवेश उसे इन चीजों से उबार लेंगे। कतर ने कूटनयिक मोर्चे पर इस बात के लिए अथक प्रयास किए हैं कि अन्य देशों के साथ उसके रिश्ते पहले की तरह सहज-सुगम बने रहें। इस दौरान उसे तुर्की और ईरान का सहयोग तो मिलता ही रहा। इस बीच अगर क्षेत्रीय राजनीति का नए सिरे से संयोजन होता है तो यह एक बड़ी त्रासदी होगी। चूंकि यह पूरा क्षेत्र बंटा हुआ है इसलिए अलग-अलग तरह से दूसरे देशों को इन पर विजय हासिल करने में आसानी होती है। सऊदी अरब की जो भी ताकत है वह अमेरिका और ब्रिटेन की बदौलत है।
 
कतर को तो छोड़ ही दीजिए, मध्य वर्ग का कोई भी व्यक्ति कतर पर थोपी जा रही करीब 13 मांगों को उसे कमजोर करने की कोशिश और एक तरह की नृशंसता मानेगा। इन थोपी जा रही मांगों में बेहद ईमानदार समाचार चैनल अल जजीरा को बंद करना और ईरान के साथ रिश्ते खत्म करना शामिल है। यहां तक कि अमेरिकी विदेश मंत्री तक का मानना है इन शर्तों का पालन बेतुकी बात है। बहरहाल, बुधवार की तय मियाद भी बीत गई और कतर ने मांगों पर किसी भी तरह का विचार करने से साफ इनकार कर दिया। सवाल यह है कि आगे क्या होगा? क्या यमन की तरह यहां भी जंग छिड़ेगी? क्या इसी वजह से सऊदी अरब हथियार खरीद रहा है और ट्रंप की मदद कर रहा है? या फिर उनकी इच्छा है कि तेल कीमतों में गिरावट आए ताकि कतर को भी उसी तरह झटका लगे जैसा सऊदी अरब को लग रहा है।
 
क्या ऐसी कोई आशंका है कि सऊदी अरब इन देशों में कतर के नागरिकों के मालिकाना हक वाले कारोबारों आदि पर भी प्रतिबंध लगााए? इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है और अगर ऐसा हुआ तो यह भी साफ हो जाएगा कि कतर को अलग-थलग करने की वजह आतंकवाद के लिए दिए जाने वाला धन नहीं बल्कि कुछ और है। जैसा कि सऊदी गुट के एक वरिष्ठ कूटनयिक ने कहा कि वे दुनिया भर में अपने कारोबारी साझेदारों पर दबाव बना सकते हैं कि वे कतर के कारोबारों पर प्रतिबंध लगाएं। हो सकता है ऐसा करना व्यावहारिक नहीं हो क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों का उल्लंघन करता है। कतर एयरवेज पहले ही उन देशों से लागत वसूल करने की कोशिश में लगी हुई है जिन्होंने उस पर प्रतिबंध लगाया हुआ है।
 
वे कतर का वीजा या पासपोर्ट रखने वाले किसी भी व्यक्ति की यात्रा पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे इजरायल के वीजा धारकों पर लगा रखा है। कतर में काम करने वाले भारतीयों पर भी इसका असर पड़ेगा। हालांकि कतर भी इजरायल की तरह कागजी वीजा के रूप में इसका रास्ता निकाल लेगा। अग? हो सकता है वे कतर को गल्फ कोऑपरेटिव काउंसिल से बाहर निकाल दें लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जबकि सभी पांच सदस्य सहमत हों। ऐसे में ओमान और कुवैत तथा अन्य दो सदस्यों पर दबाव बनाना शायद संभव न रहे। यह तो स्पष्ट हो चुका है कि मौजूदा संकट और गतिरोध का आतंकवादियों को धन देने से कोई लेनादेना नहीं है। अगर यह सच माना जाए तो दुनिया के कई अन्य देश भी ऐसी प्रतिबंध सूची में आएंगे क्योंकि उनके नागरिक भी आतंकी संगठनों  की मदद करते हैं। 
 
(लेखक मेडिसी इंस्टीट्यूट के सह-संस्थापक हैं। लेख में प्रकट विचार निजी हैं।)
Keyword: कतर सऊदी अरब,
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