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नई विश्व व्यवस्था

संपादकीय /  July 09, 2017

जी 20 समूह के देशों के नेताओं की इस सप्ताहांत जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में बैठक हुई। हालांकि इसमें भी कूटनयिक स्तर की बातचीत का वही पुराना माहौल देखने को मिला लेकिन साथ ही एक नई और अस्वाभाविक विश्व व्यवस्था उभरती नजर आई। मोटे तौर पर विभिन्न नेता अपने घोषित रुख पर टिके रहे। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टरीजा मे ब्रेक्सिट के बाद के व्यापार समझौतों के बारे में बात करती दिखीं तो चीन के राष्ट्राध्यक्ष शी चिनफिंग अपने देश की बड़ी कंपनियों द्वारा दुनिया भर में स्टील की डंपिंग के लिए की जा रही आलोचना से बचने की कवायद में नजर आए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस संभावना पर ध्यान केंद्रित किया कि तकनीकी बदलाव खासतौर पर डिजिटल युग में हो रहे बदलाव संचार, कौशल और रोजगार के लिए क्या कुछ ला सकते हैं। शायद सबसे अधिक घरेलू ध्यान जी 20 बैठक से इतर होने वाली द्विपक्षीय चर्चाओं पर केंद्रित था। प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि टरीजा मे के साथ बातचीत में 'आर्थिक अपराधियों की वापसी' को लेकर चर्चा हुई। यह शब्द शायद राजनीतिक रूप से संवेदनशील विजय माल्या मामले के लिए इस्तेमाल हुआ जो लंदन के उपनगरीय इलाके में महीनों से रह रहे हैं। हालांकि शी चिनफिंग और मोदी के बीच कोई औपचारिक द्विपक्षीय बैठक नहीं होनी थी लेकिन फिर भी दोनों नेताओं की बातचीत करती तस्वीर सामने आने से शायद उस तनाव में कुछ राहत मिले जो भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच सिक्किम सीमा के बीच उपजा है। दोनों नेताओं ने अपने-अपने भाषण में एक दूसरे का जिक्र किया। 
 
परंतु इस शिखर बैठक से एक संदेश ऐसा भी उभरा जिस पर पूरी दुनिया का ध्यान रहा। वह था डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका का अलग-थलग पड़ जाना। ट्रंप ने कुछ ही महीने पहले अमेरिका को नाटकीय ढंग से जलवायु परिवर्तन संबंधी पेरिस समझौते से अलग कर लिया था। उन्होंने यह सोच कमोबेश उजागर ही कर दी कि उनका निर्वाचन शेष विश्व के साथ समझौते करने के लिए नहीं हुआ है। रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के साथ उनकी बातचीत में सद्भाव झलका, उनके बीच सीरिया में युद्घविराम को लेकर भी चर्चा हुई। परंतु इसके बावजूद ट्रंप ने खुद को बड़े नेताओं के समर्थन से विरत पाया। हैम्बर्ग में जो घोषणापत्र जारी किया गया, वह भी काफी कुछ कहता है, 'हम अमेरिका के पेरिस समझौते से अलग होने के निर्णय को ध्यान में रख रहे हैं।' इतना ही नहीं, घोषणापत्र में आगे कहा गया, 'जी 20 के अन्य सदस्य देशों के नेताओं का कहना है कि पेरिस समझौते में बदलाव संभव नहीं है।' यहां तक कि ट्रंप के साथ गया प्रतिनिधिमंडल घोषणापत्र में 'ध्यान देना' शब्द तक को नहीं बदलवा पाया। न ही ऐसा कुछ कहलवा पाया कि समूह जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका के नए रुख को स्वीकार करता है। हां, वह यह कहलवाने में अवश्य कामयाब रहा कि विभिन्न देशों को अपेक्षाकृत स्वच्छ जीवाश्म ईंधन इस्तेमाल करना चाहिए। बहरहाल, यह भी भारत के लिए कोई बुरी खबर नहीं है क्योंकि हमारे यहां कई ऐसे ताप बिजलीघर हैं जिनको उन्नत बनाने की आवश्यकता है। इनको  उन्नत करके हम कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की राष्ट्रीय प्रतिबद्घता निभा पाएंगे। 
 
पूरी दुनिया संरक्षणवाद और जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर दो खतरों से लड़ रही है और इसमें अमेरिका की नई हैसियत कुछ खास नहीं है। बल्कि इसे असहज करने वाली स्थिति कहा जा सकता है। अमेरिका ने बहुत लंबे समय तक इन मामलों मे नेतृत्व किया है। ऐसे में ट्रंप के कदमों को परेशान करने वाला ही कहा जा सकता है। इसके बावजूद जी 20 बैठक ने बताया कि दुनिया अमेरिकी नेतृत्व के बिना भी बखूबी चल सकती है। नई विश्व व्यवस्था ऐसी ही होनी भी चाहिए। 
Keyword: G20, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी20 शिखर सम्मेलन,
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